मल्हार अध्याय 2 पंक्तियों पर चर्चा

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
पाठ में से चुनकर कुछ पंक्तियाँ नीचे दी गई हैं। इन्हें ध्यान से पढ़िए और इन पर विचार कीजिए। आपको इनका क्या अर्थ समझ में आया? अपने विचार कक्षा में अपने समूह में साझा कीजिए और अपनी लेखन पुस्तिका में लिखिए— (क) “बुरा काम करने वाला आदमी हर समय इस बात से डरता रहता है कि उसके साथ भी बुराई की जाएगी।”
उत्तर

भावार्थ: जो व्यक्ति किसी के साथ बुरा करता है, उसका अपना मन ही उसे चैन नहीं लेने देता। उसे लगता रहता है कि जैसा उसने किया है, वैसा ही कभी उसके साथ भी होगा। इस तरह उसकी सबसे बड़ी सज़ा बाहर से नहीं मिलती — वह अपने भीतर के डर से ही मिलती रहती है।

पाठ से प्रमाण: जिस खिलाड़ी ने ध्यानचंद के सिर पर हॉकी स्टिक मारी थी, ध्यानचंद ने उससे केवल इतना कहा — “तुम चिंता मत करो, इसका बदला मैं ज़रूर लूँगा।” बस इतना सुनते ही “वह खिलाड़ी घबरा गया। अब हर समय मुझे ही देखता रहता कि मैं कब उसके सिर पर हॉकी स्टिक मारने वाला हूँ।” ध्यानचंद ने उसे छुआ तक नहीं, फिर भी वह पूरे मैच में डरा रहा — यही इस पंक्ति का जीता-जागता उदाहरण है।

गहरी बात: उस खिलाड़ी का डर ही उसकी हार का कारण बना। जब उसका ध्यान गेंद पर होना चाहिए था, तब वह ध्यानचंद पर टिका था। इसीलिए ध्यानचंद छह गोल कर सके और अंत में कह सके — “अगर तुम मुझे हॉकी नहीं मारते तो शायद मैं तुम्हें दो ही गोल से हराता।”
चर्चा के लिए: अपने समूह से पूछिए — क्या यह बात केवल खेल के मैदान की है? कक्षा में किसी की चीज़ छिपा देने वाला या झूठ बोलकर बच निकलने वाला विद्यार्थी भी तो हर समय पकड़े जाने के डर में ही जीता है। इसी भाव को कहावत में कहते हैं — “चोर की दाढ़ी में तिनका।”
प्र2.
(ख) “मेरी तो हमेशा यह कोशिश रहती कि मैं गेंद को गोल के पास ले जाकर अपने किसी साथी खिलाड़ी को दे दूँ ताकि उसे गोल करने का श्रेय मिल जाए। अपनी इसी खेल भावना के कारण मैंने दुनिया के खेल प्रेमियों का दिल जीत लिया।”
उत्तर

भावार्थ: ध्यानचंद गेंद को अकेले गोल तक ले जाने की क्षमता रखते थे, फिर भी वे गोलपोस्ट के पास पहुँचकर गेंद अपने साथी को थमा देते थे, ताकि गोल का यश उस साथी के नाम लिखा जाए। उनके लिए अपना नाम बड़ा नहीं था — टीम की जीत बड़ी थी।

इससे उनके बारे में क्या पता चलता है:

  • वे निस्वार्थ थे। ‘श्रेय’ यानी किसी काम का सेहरा। जो व्यक्ति अपनी मेहनत का सेहरा दूसरे के सिर बाँध दे, वह सचमुच बड़ा होता है।
  • वे टीम-भावना में विश्वास करते थे। वे स्वयं कहते हैं — “इसका यह मतलब नहीं कि सारे गोल मैं ही करता था।” हॉकी ग्यारह खिलाड़ियों का खेल है, एक का नहीं।
  • यही उनकी असली जीत थी। पदक तो एक बार मिलता है; उन्होंने “दुनिया के खेल प्रेमियों का दिल जीत लिया” — और वह जीत हमेशा के लिए रही।
जोड़कर देखिए: पाठ के अंत की पंक्ति इसी बात को पूरा करती है — “हार या जीत मेरी नहीं, बल्कि पूरे देश की है।” साथी को श्रेय देना और जीत को देश के नाम कर देना — दोनों एक ही स्वभाव के दो रूप हैं।
चर्चा के लिए: अपने समूह में सोचिए — क्या ऐसा केवल खेल में होता है? समूह-कार्य में जब कोई साथी अपना काम पूरा करके दूसरे की भी सहायता करता है और तारीफ़ पूरे समूह को मिलती है, तो वह भी यही खेल भावना दिखा रहा होता है।
क्या यह उपयोगी रहा? त्रुटि बताएँ