भावार्थ: जो व्यक्ति किसी के साथ बुरा करता है, उसका अपना मन ही उसे चैन नहीं लेने देता। उसे लगता रहता है कि जैसा उसने किया है, वैसा ही कभी उसके साथ भी होगा। इस तरह उसकी सबसे बड़ी सज़ा बाहर से नहीं मिलती — वह अपने भीतर के डर से ही मिलती रहती है।
पाठ से प्रमाण: जिस खिलाड़ी ने ध्यानचंद के सिर पर हॉकी स्टिक मारी थी, ध्यानचंद ने उससे केवल इतना कहा — “तुम चिंता मत करो, इसका बदला मैं ज़रूर लूँगा।” बस इतना सुनते ही “वह खिलाड़ी घबरा गया। अब हर समय मुझे ही देखता रहता कि मैं कब उसके सिर पर हॉकी स्टिक मारने वाला हूँ।” ध्यानचंद ने उसे छुआ तक नहीं, फिर भी वह पूरे मैच में डरा रहा — यही इस पंक्ति का जीता-जागता उदाहरण है।