मल्हार अध्याय 2 सोच-विचार के लिए

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
संस्मरण को एक बार फिर से पढ़िए और निम्नलिखित के बारे में पता लगाकर अपनी लेखन पुस्तिका में लिखिए— (क) ध्यानचंद की सफलता का क्या रहस्य था?
उत्तर

ध्यानचंद के अनुसार उनकी सफलता का कोई जादू या गुरु-मंत्र नहीं था। वे स्वयं कहते हैं — “मेरे पास सफलता का कोई गुरु-मंत्र तो है नहीं। हर किसी से यही कहता कि लगन, साधना और खेल भावना ही सफलता के सबसे बड़े मंत्र हैं।”

मंत्रइसका अर्थध्यानचंद के जीवन में यह कैसे दिखा
लगनकिसी काम में मन का पूरी तरह लग जाना, धुनछावनी में हॉकी का कोई निश्चित समय नहीं था — “सैनिक जब चाहे मैदान में पहुँच जाते और अभ्यास शुरू कर देते।” जिसमें लगन हो, वही ऐसे समय निकालता है।
साधनालगातार, बिना ऊबे किया गया अभ्यासवे शुरू में “एक नौसिखिया खिलाड़ी” थे। लगातार अभ्यास से ही “मेरे खेल में निखार आता गया” और वे कप्तान तक पहुँचे।
खेल भावनाखेल को सही भाव से खेलना — न गुस्सा, न ईर्ष्या, न अकेले नाम कमाने की चाहचोट मारने वाले खिलाड़ी को ‘दोस्त’ कहना, गोल का श्रेय साथी को देना, और जीत को देश की जीत मानना।
ध्यान दीजिए: तीनों में से पहले दो मेहनत से जुड़े हैं और तीसरा स्वभाव से। ध्यानचंद का कहना यही है कि अच्छा खिलाड़ी बनने के लिए अच्छा इनसान होना भी ज़रूरी है।
प्र2.
(ख) किन बातों से ऐसा लगता है कि ध्यानचंद स्वयं से पहले दूसरों को रखते थे?
उत्तर

पूरे संस्मरण में कम से कम चार जगह ऐसी हैं जहाँ ध्यानचंद अपने से पहले दूसरों को रखते दिखाई देते हैं—

  1. गोल का श्रेय साथी को देना। “मेरी तो हमेशा यह कोशिश रहती कि मैं गेंद को गोल के पास ले जाकर अपने किसी साथी खिलाड़ी को दे दूँ ताकि उसे गोल करने का श्रेय मिल जाए।” गोल वे स्वयं कर सकते थे, पर यश साथी को देते थे।
  2. ‘सारे गोल मैं ही करता था’ — इस भ्रम को स्वयं तोड़ना। ‘हॉकी का जादूगर’ कहलाने के बाद भी वे साफ़ कहते हैं — “इसका यह मतलब नहीं कि सारे गोल मैं ही करता था।” यह पूरी टीम को बराबर का हिस्सेदार मानना है।
  3. जीत को देश के नाम करना। “खेलते समय मैं हमेशा इस बात का ध्यान रखता था कि हार या जीत मेरी नहीं, बल्कि पूरे देश की है।” अपने से बड़ा उन्होंने देश को माना।
  4. चोट पहुँचाने वाले को भी क्षमा कर देना। सिर पर स्टिक लगने के बाद भी वे उसी खिलाड़ी की पीठ पर हाथ रखते हैं, फिर मैच के बाद पीठ थपथपाकर उसे ‘दोस्त’ कहते हैं। अपने अपमान से बड़ा उन्होंने खेल और खिलाड़ी के रिश्ते को माना।
निष्कर्ष: ध्यानचंद के लिए ‘मैं’ छोटा था और ‘हम’ बड़ा — चाहे वह ‘हम’ टीम हो, विरोधी खिलाड़ी हो या पूरा देश। इसीलिए वे केवल बड़े खिलाड़ी नहीं, बड़े इनसान भी माने जाते हैं।
क्या आप जानते हैं? इसी महानता के कारण भारत उनके जन्मदिन 29 अगस्त को ‘राष्ट्रीय खेल दिवस’ के रूप में मनाता है और देश का सर्वोच्च खेल पुरस्कार ‘मेजर ध्यानचंद खेल रत्न पुरस्कार’ उन्हीं के नाम पर दिया जाता है।
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