प्र1.
“उन दिनों में मैं, पंजाब रेजिमेंट की ओर से खेला करता था।” इस वाक्य को पढ़कर ऐसा लगता है मानो लेखक आपसे यानी पाठक से अपनी यादों को साझा कर रहा है। ध्यान देंगे तो इस पाठ में ऐसी और भी अनेक विशेष बातें आपको दिखाई देंगी। इस पाठ को एक बार फिर से पढ़िए। (क) अपने-अपने समूह में मिलकर इस संस्मरण की विशेषताओं की सूची बनाइए।
उत्तर
ध्यान से पढ़ने पर ‘गोल’ में संस्मरण की ये विशेषताएँ दिखाई देती हैं—
| विशेषता | पाठ से उदाहरण | इससे क्या होता है |
|---|---|---|
| 1. ‘मैं’ शैली (उत्तम पुरुष) | “मैं पंजाब रेजिमेंट की ओर से खेला करता था।” | लेखक स्वयं अपनी बात कहता है, इसलिए बात सच्ची और अपनी-सी लगती है। |
| 2. बीती हुई सच्ची घटनाएँ | सिर पर स्टिक लगना, छह गोल करना, कप्तान बनना | संस्मरण कल्पना नहीं होता; इसमें वही लिखा जाता है जो सचमुच घटा हो। |
| 3. समय और स्थान का उल्लेख | सन् 1933, सन् 1905, प्रयाग, झाँसी, सन् 1936, बर्लिन | तिथियाँ और जगहें घटना को वास्तविक बना देती हैं। |
| 4. असली नाम | पंजाब रेजिमेंट, सैंपर्स एंड माइनर्स टीम, सूबेदार मेजर तिवारी | पात्र गढ़े हुए नहीं, सच्चे व्यक्ति और संस्थाएँ हैं। |
| 5. पाठक से सीधी बात | “तो देखा आपने मेरा बदला लेने का ढंग?”, “सच मानो…” | ऐसा लगता है मानो लेखक सामने बैठकर बातें कर रहा हो। |
| 6. संवाद | “तुम चिंता मत करो, इसका बदला मैं ज़रूर लूँगा।” | बातचीत ज्यों-की-त्यों देने से दृश्य आँखों के सामने खिंच जाता है। |
| 7. भूतकाल की क्रियाएँ | खेला करता था, चलता था, दे मारी, कर दिए | पूरी रचना यादों की है, इसलिए क्रियाएँ बीते समय की हैं। |
| 8. सरल, बोलचाल की भाषा | धक्का-मुक्की, नोंक-झोंक, झटपट, नौसिखिया, तरक्की | भाषा भारी नहीं है; सिपाही की सीधी-सादी ज़बान है। |
| 9. घटनाओं का क्रम | 1933 का मैच → जन्म और भर्ती → 1936 का ओलंपिक | लेखक पहले एक रोचक घटना सुनाता है, फिर पीछे लौटकर पूरा जीवन बताता है — इससे पाठक बँधा रहता है। |
| 10. अंत में सीख | “हार या जीत मेरी नहीं, बल्कि पूरे देश की है।” | संस्मरण केवल घटना नहीं सुनाता, जीवन का एक अनुभव भी दे जाता है। |
| 11. विनम्रता | “मेरे पास सफलता का कोई गुरु-मंत्र तो है नहीं।” | लेखक अपनी बड़ाई नहीं करता — यही अच्छे संस्मरण की पहचान है। |
संस्मरण किसे कहते हैं: ‘सम् + स्मरण’ यानी अच्छी तरह याद करना। जब लेखक अपने जीवन की किसी सच्ची घटना या किसी व्यक्ति की याद को अपने शब्दों में लिखता है, तो वह संस्मरण कहलाता है। पूरा जीवन लिखा जाए तो वह आत्मकथा बन जाती है — यह पाठ ध्यानचंद की आत्मकथा ‘गोल’ का ही एक अंश है।