यह खेल क्या है: ‘डाँडी या गोथा’ भील-भिलाला बच्चों का खेल है। ‘डाँडी’ और ‘गोथा’ — दोनों शब्दों का एक ही अर्थ है, खेलने की हाथ-लकड़ी। यह खेल काफ़ी-कुछ हॉकी जैसा ही है, पर इसमें न महँगा सामान चाहिए, न बना-बनाया मैदान।
खेल सामग्री (तीन ही चीज़ें):
- बाँस के गुट्ठे की गेंद, जिसे ‘दुईत’ कहते हैं;
- ‘गोथा’ — अंग्रेज़ी के ‘L’ अक्षर की तरह नीचे से मुड़ी हुई बाँस की डंडियाँ;
- राख — जिससे मैदान का सीमांकन किया जाता है और घेरे के भीतर एक छोटा वृत्त बनाया जाता है।
कैसे खेलें (संक्षेप में): टॉस जीतने वाला दल खेल शुरू करता है। गेंद बीच के छोटे वृत्त में रखी जाती है। हमला करने वाले दल के खिलाड़ी गेंद को पीटते हुए बचाव दल के दायरे में दूर तक ले जाना चाहते हैं, और दोनों दलों का एक-एक खिलाड़ी अपनी-अपनी ‘डी’ में खड़ा रहकर गेंद को रेखा पार करने से रोकता है। खिलाड़ी दोनों दलों में कम-से-कम दो-दो होने चाहिए।
दो विशेष नियम: (1) गेंद को शरीर के किसी भी अंग से न छूना, न रोकना। (2) गेंद को हवाई शॉट न मारना और न हवा में शॉट खेलकर साथी को पास देना। लकड़ी से गेंद रोकना या हिट करना पूरी तरह ठीक है।
हार-जीत का फ़ैसला: इसमें गोलपोस्ट नहीं होते, इसलिए गोल गिने ही नहीं जाते। जो दल गेंद को अधिक-से-अधिक बार विरोधी के पाले में ढकेलता है, वही बलवान और विजयी माना जाता है।
| तुलना का बिंदु | हॉकी | डाँडी या गोथा |
|---|---|---|
| गोलपोस्ट | होते हैं, गोल गिने जाते हैं | नहीं होते; गोल का मामला ही नहीं बनता |
| गेंद | विशेष रूप से बनी हुई हॉकी बॉल | बाँस के गुट्ठे की साधारण गेंद — ‘दुईत’ |
| स्टिक | बनी-बनाई हॉकी स्टिक | ‘L’ की तरह मुड़ी बाँस की डंडी — ‘गोथा’ |
| स्टिक का प्रयोग | केवल एक ओर से खेल सकते हैं | दोनों ओर से खेल सकते हैं |
| खिलाड़ियों की संख्या | प्रत्येक दल में ग्यारह | चाहे जितने; कम-से-कम दो-दो |
| मैदान | बना-बनाया मैदान, खिंची हुई रेखाएँ | राख से बनाया गया घेरा और बीच में छोटा वृत्त |
| जीत का आधार | अधिक गोल करने वाला दल | विरोधी के पाले में गेंद अधिक बार ढकेलने वाला दल |
| कब खेला जाता है | वर्ष भर | होली से कुछ दिन पहले से; होलिका जलने के दिन दुइत और गोथे आग में डाल दिए जाते हैं |