मल्हार अध्याय 2 झरोखे से

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
आपने हॉकी के बारे में बहुत-कुछ बात की होगी। अब हम हॉकी जैसे ही अनोखे खेल के बारे में पढ़ेंगे जिसे आप जैसे लाखों बच्चे अपने गली-मुहल्लों में खेलते हैं। इस खेल का नाम है— डाँडी या गोथा। (‘डाँडी या गोथा’ पढ़िए और समझिए कि यह खेल कैसे खेला जाता है और यह हॉकी से किन बातों में अलग है।)
उत्तर

यह खेल क्या है: ‘डाँडी या गोथा’ भील-भिलाला बच्चों का खेल है। ‘डाँडी’ और ‘गोथा’ — दोनों शब्दों का एक ही अर्थ है, खेलने की हाथ-लकड़ी। यह खेल काफ़ी-कुछ हॉकी जैसा ही है, पर इसमें न महँगा सामान चाहिए, न बना-बनाया मैदान।

खेल सामग्री (तीन ही चीज़ें):

  1. बाँस के गुट्ठे की गेंद, जिसे ‘दुईत’ कहते हैं;
  2. गोथा’ — अंग्रेज़ी के ‘L’ अक्षर की तरह नीचे से मुड़ी हुई बाँस की डंडियाँ;
  3. राख — जिससे मैदान का सीमांकन किया जाता है और घेरे के भीतर एक छोटा वृत्त बनाया जाता है।

कैसे खेलें (संक्षेप में): टॉस जीतने वाला दल खेल शुरू करता है। गेंद बीच के छोटे वृत्त में रखी जाती है। हमला करने वाले दल के खिलाड़ी गेंद को पीटते हुए बचाव दल के दायरे में दूर तक ले जाना चाहते हैं, और दोनों दलों का एक-एक खिलाड़ी अपनी-अपनी ‘डी’ में खड़ा रहकर गेंद को रेखा पार करने से रोकता है। खिलाड़ी दोनों दलों में कम-से-कम दो-दो होने चाहिए।

दो विशेष नियम: (1) गेंद को शरीर के किसी भी अंग से न छूना, न रोकना। (2) गेंद को हवाई शॉट न मारना और न हवा में शॉट खेलकर साथी को पास देना। लकड़ी से गेंद रोकना या हिट करना पूरी तरह ठीक है।

हार-जीत का फ़ैसला: इसमें गोलपोस्ट नहीं होते, इसलिए गोल गिने ही नहीं जाते। जो दल गेंद को अधिक-से-अधिक बार विरोधी के पाले में ढकेलता है, वही बलवान और विजयी माना जाता है।

तुलना का बिंदुहॉकीडाँडी या गोथा
गोलपोस्टहोते हैं, गोल गिने जाते हैंनहीं होते; गोल का मामला ही नहीं बनता
गेंदविशेष रूप से बनी हुई हॉकी बॉलबाँस के गुट्ठे की साधारण गेंद — ‘दुईत’
स्टिकबनी-बनाई हॉकी स्टिक‘L’ की तरह मुड़ी बाँस की डंडी — ‘गोथा’
स्टिक का प्रयोगकेवल एक ओर से खेल सकते हैंदोनों ओर से खेल सकते हैं
खिलाड़ियों की संख्याप्रत्येक दल में ग्यारहचाहे जितने; कम-से-कम दो-दो
मैदानबना-बनाया मैदान, खिंची हुई रेखाएँराख से बनाया गया घेरा और बीच में छोटा वृत्त
जीत का आधारअधिक गोल करने वाला दलविरोधी के पाले में गेंद अधिक बार ढकेलने वाला दल
कब खेला जाता हैवर्ष भरहोली से कुछ दिन पहले से; होलिका जलने के दिन दुइत और गोथे आग में डाल दिए जाते हैं
सोचने की बात: हॉकी के लिए महँगा सामान चाहिए, पर ‘डाँडी या गोथा’ बाँस और राख से खेला जा सकता है। यही हमारे स्वदेशी खेलों की सबसे बड़ी खूबी है — वे उसी सामान से बन जाते हैं जो आस-पास पहले से मौजूद है, इसलिए हर बच्चा खेल सकता है।
‘झरोखे से’ का अर्थ: झरोखा यानी खिड़की। जैसे खिड़की से बाहर की दुनिया की एक झलक दिखती है, वैसे ही इस भाग में पाठ से जुड़ी कोई और रचना या जानकारी की झलक दी जाती है। यहाँ हॉकी वाले पाठ के बाद हमें भारत के एक लोक-खेल की झलक मिली।
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