नया शीर्षक सोचते समय दो बातें देखिए — (1) नाम कविता की सबसे केंद्रीय बात को पकड़े, और (2) वह नाम कविता के भीतर से ही निकला हुआ लगे, बाहर से चिपकाया हुआ नहीं। इस कविता की केंद्रीय बात है — चेतक की बिजली-सी गति, उसकी निडरता और अपने स्वामी से उसका मौन तालमेल।
| संभावित शीर्षक | यह नाम क्यों | कविता का आधार |
|---|---|---|
| हवा से पाला | कविता की सबसे अनोखी कल्पना यही है — घोड़े का मुक़ाबला हवा से। | “पड़ गया हवा को पाला था।” |
| आसमान पर घोड़ा | एक ही चित्र में गति भी है और कल्पना भी; पढ़ते ही जिज्ञासा जागती है। | “या आसमान पर घोड़ा था।” |
| राणा का चेतक | घोड़े और स्वामी का रिश्ता ही कविता की जान है। | “राणा की पुतली फिरी नहीं / तब तक चेतक मुड़ जाता था।” |
| रण का निराला घोड़ा | कवि ने ख़ुद उसे ‘निराला’ कहा है — शीर्षक कविता के अपने शब्द से बनता है। | “रण-बीच चौकड़ी भर-भरकर / चेतक बन गया निराला था।” |
| बज्र-मय बादल | कविता का सबसे प्रभावशाली दृश्य, जिसमें चेतक शत्रु-सेना पर टूट पड़ता है। | “विकराल बज्र-मय बादल-सा / अरि की सेना पर घहर गया।” |
| वैरी रह गया दंग | वीरता की प्रशंसा शत्रु के मुँह से हो — यह सबसे बड़ी प्रशंसा है। | “वैरी-समाज रह गया दंग / घोड़े का ऐसा देख रंग।” |
नमूना उत्तर: “मैं इस कविता का शीर्षक ‘आसमान पर घोड़ा’ रखना चाहूँगा। कारण यह है कि पूरी कविता में कवि बार-बार यही जताता है कि चेतक ज़मीन का घोड़ा लगता ही नहीं — कभी वह हवा से मुक़ाबला करता है, कभी शत्रु के सिरों के ऊपर से निकल जाता है, कभी वह ‘यहीं है, अब यहाँ नहीं’ हो जाता है। ‘आसमान पर घोड़ा’ इन सब बातों को एक ही चित्र में समेट लेता है। साथ ही यह पंक्ति कविता की अपनी है, इसलिए शीर्षक कविता के भीतर से निकला हुआ लगता है, और पढ़ने से पहले ही मन में जिज्ञासा जगा देता है कि आसमान पर घोड़ा भला कैसे?”