प्र1.
“चेतक बन गया निराला था।” “पड़ गया हवा को पाला था।” “राणा प्रताप का कोड़ा था।” “या आसमान पर घोड़ा था।” — रेखांकित शब्दों पर ध्यान दीजिए। ये शब्द बोलने-लिखने में थोड़े मिलते-जुलते हैं। इस तरह की तुकांत शैली प्रायः कविता में आती है। कभी-कभी कविता अतुकांत भी होती है। इस कविता में आए तुकांत शब्दों की सूची बनाइए।
उत्तर
रेखांकित शब्द हैं — निराला, पाला, कोड़ा, घोड़ा। ‘निराला’ और ‘पाला’ का अंत एक ही ध्वनि -आला पर होता है, और ‘कोड़ा’ तथा ‘घोड़ा’ का अंत -ोड़ा पर। पंक्तियों के अंत में आने वाले ऐसे मिलते-जुलते शब्दों को तुकांत शब्द कहते हैं, और जिस कविता में ये मिलते हैं उसे तुकांत कविता कहते हैं। जिस कविता में पंक्तियों के अंत नहीं मिलते, वह अतुकांत कहलाती है।
‘चेतक की वीरता’ के तुकांत शब्दों की पूरी सूची —
| छंद | तुकांत शब्द | मिलती हुई ध्वनि |
|---|---|---|
| 1 | निराला – पाला | -आला |
| 2 | कोड़ा – घोड़ा | -ोड़ा |
| 3 | उड़ (जाता था) – मुड़ (जाता था) | -उड़ … जाता था |
| 4 | चालों – भालों – ढालों – करवालों | -आलों (चारों पंक्तियाँ एक साथ) |
| 5 | यहाँ – वहाँ – जहाँ – कहाँ | -अहाँ (चारों पंक्तियाँ एक साथ) |
| 6 | लहर – ठहर – घहर | -अहर |
| 7 | निषंग – अंग – दंग – रंग | -अंग (चारों पंक्तियाँ एक साथ) |
तुक का असर क्या होता है: तुक कविता को लय और गति देती है। इस कविता में तो तुक ख़ुद विषय के साथ चलती है — ‘चालों–भालों–ढालों–करवालों’ और ‘यहाँ–वहाँ–जहाँ–कहाँ’ जैसे लगातार मिलते हुए अंत पढ़ते समय ऐसा लगता है मानो घोड़े की टापें एक के बाद एक पड़ रही हों। इसीलिए वीर रस की कविताएँ प्रायः कसी हुई तुक में लिखी जाती हैं — वे गाने और सुनाने में जोश पैदा करती हैं।
ख़ुद करके देखिए: ‘यहाँ – वहाँ – जहाँ – कहाँ’ वाला छंद ज़ोर से पढ़िए और हर पंक्ति के अंत पर मेज़ पर हल्की थाप दीजिए। आपको ख़ुद सुनाई देगा कि तुक कैसे ताल बन जाती है। फिर कोई अतुकांत कविता पढ़िए — वहाँ यह थाप नहीं बनेगी, पर भाव उतना ही गहरा हो सकता है।