मल्हार अध्याय 4 दिनचर्या

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
(क) कहानी पढ़कर आप बाबा भारती के जीवन के विषय में बहुत कुछ जान चुके हैं। अब आप कहानी के आधार पर बाबा भारती की दिनचर्या लिखिए। वे सुबह उठने से लेकर रात को सोने तक क्या-क्या करते होंगे, लिखिए। इस काम में आप थोड़ा-बहुत अपनी कल्पना का सहारा भी ले सकते हैं।
उत्तर

पहले देखिए कि दिनचर्या के कितने हिस्से कहानी में ही दिए हैं — बाक़ी में ही कल्पना जोड़नी है। अच्छा उत्तर वही है जिसमें कहानी वाली बातें ज़रूर आएँ।

समयकामयह कहाँ से मिला
रात्रि का चौथा पहर (लगभग 3–6 बजे)कुटिया से बाहर निकलकर ठंडे जल से स्नानकहानी से — “चौथा पहर आरंभ होते ही बाबा भारती ने अपनी कुटिया से बाहर निकल ठंडे जल से स्नान किया।”
प्रातःकालसीधे अस्तबल जाकर सुलतान को देखना, खरहरा करना, अपने हाथ से दाना-पानी देनाकहानी से — “अपने हाथ से खरहरा करते, खुद दाना खिलाते”; “उनके पाँव अस्तबल की ओर मुड़े।”
दिन का पूर्वार्धमंदिर में भगवान का भजन-पूजनकहानी से — “गाँव से बाहर एक छोटे-से मंदिर में रहते और भगवान का भजन करते थे।”
दोपहरसादा भोजन, मंदिर की सफ़ाई, दर्शन को आए गाँव वालों से भेंट — जैसे उस दिन खड़्गसिंह आया थाकहानी + थोड़ी कल्पना (“एक दिन वह दोपहर के समय बाबा भारती के पास पहुँचा”)
तीसरा पहरपुनः भजन; घोड़े के पास बैठकर उसे देखते रहना — “देख-देखकर प्रसन्न होते थे”कहानी से
संध्यासुलतान पर सवार होकर आठ-दस मील का चक्कर — इसके बिना उन्हें चैन न पड़ता थाकहानी से — “जब तक संध्या समय सुलतान पर चढ़कर आठ-दस मील का चक्कर न लगा लेते, उन्हें चैन न आता।”
रातसंध्या-भजन, थोड़ा-सा भोजन और विश्राम; डर वाले दिनों में लाठी लेकर अस्तबल का पहराकहानी से — “सारी रात अस्तबल की रखवाली में कटने लगी”; “बाबा भारती स्वयं लाठी लेकर पहरा देते थे।”
नमूना उत्तर:
“बाबा भारती की दिनचर्या बहुत सादी थी। रात का चौथा पहर आरंभ होते ही, जब आकाश में तारे मंद पड़ने लगते, वे अपनी कुटिया से बाहर निकल आते और ठंडे जल से स्नान करते। इसके बाद उनके पाँव अपने आप अस्तबल की ओर मुड़ जाते। वहाँ वे सुलतान के गले पर हाथ फेरते, अपने हाथ से उसका खरहरा करते और खुद दाना-पानी देते। फिर मंदिर में जाकर दीपक जलाते और देर तक भगवान का भजन करते। दोपहर में वे थोड़ा-सा सादा भोजन करते, मंदिर की सफ़ाई करते और जो गाँव वाला मिलने आता, उससे कुशल-क्षेम पूछते। दिन ढलने पर वे फिर भजन में बैठ जाते, और भजन से जो समय बचता, वह पूरा घोड़े को अर्पण हो जाता। संध्या होते ही वे सुलतान पर सवार होकर आठ-दस मील का चक्कर लगाने निकल पड़ते — यह उनके दिन का सबसे प्रिय समय था। लौटकर संध्या-भजन करते और रात होते ही सो जाते। पर जिन दिनों खड़्गसिंह की धमकी का भय था, उन दिनों वे सोते नहीं थे — सारी रात लाठी लेकर अस्तबल के फाटक पर पहरा देते रहते।”
दिनचर्या लिखने का ढंग: समय के क्रम से लिखिए — सुबह, दोपहर, शाम, रात। हर काम के साथ एक छोटा-सा ब्योरा जोड़िए (केवल “भजन करते थे” नहीं, बल्कि “दीपक जलाकर देर तक भजन करते थे”)। और जहाँ कहानी में कोई पंक्ति मिलती है, उसे अपने शब्दों में उतार दीजिए — इससे उत्तर पाठ पर टिका हुआ लगता है, हवा में नहीं।
प्र2.
(ख) अब आप अपनी दिनचर्या भी लिखिए।
उत्तर

यह आपके अपने दिन का प्रश्न है, इसलिए उत्तर हर विद्यार्थी का अलग होगा। पर अच्छा उत्तर बनता कैसे है, यह तय है।

ध्यान रखने योग्य चार बातें —

  • समय के क्रम से लिखिए — उठने से सोने तक, बीच में कुछ छूटे नहीं।
  • समय भी लिखिए — “सुबह जल्दी उठता हूँ” से बेहतर है “सुबह छह बजे उठता हूँ”।
  • अपनी एक ख़ास बात ज़रूर डालिए — कोई ऐसा काम जो सिर्फ़ आप करते हैं (दादी को अख़बार पढ़कर सुनाना, गमलों में पानी देना, छोटी बहन को तैयार करना)।
  • अंत में एक वाक्य अपने बारे में — दिनचर्या का कौन-सा हिस्सा आपको सबसे अच्छा लगता है, और कौन-सा सुधारना चाहते हैं।
नमूना उत्तर:
“मैं सुबह छह बजे उठ जाता हूँ। सबसे पहले बिस्तर ठीक करता हूँ, फिर मुँह-हाथ धोकर आधे घंटे पढ़ने बैठता हूँ, क्योंकि सुबह पढ़ा हुआ मुझे देर तक याद रहता है। सात बजे नहा-धोकर तैयार होता हूँ और माँ के साथ नाश्ता करता हूँ। साढ़े सात बजे साइकिल से विद्यालय जाता हूँ। दोपहर दो बजे लौटकर भोजन करता हूँ और थोड़ी देर आराम करता हूँ। चार बजे मैं छत पर रखे गमलों में पानी देता हूँ — तुलसी और गुड़हल के पौधे मैंने ख़ुद लगाए हैं। साढ़े चार से छह बजे तक मैदान में दोस्तों के साथ क्रिकेट खेलता हूँ। शाम को गृहकार्य पूरा करता हूँ और दादी को अख़बार की मुख्य ख़बरें पढ़कर सुनाता हूँ। रात आठ बजे सब साथ बैठकर भोजन करते हैं, फिर थोड़ी देर बातचीत होती है और साढ़े नौ बजे मैं सो जाता हूँ। मुझे अपनी दिनचर्या का सबसे अच्छा हिस्सा शाम का खेल लगता है, और सुधारना यह चाहता हूँ कि मैं टेलीविज़न पर कम समय बिताऊँ।”
एक तुलना ज़रूर सोचिए: बाबा भारती की दिनचर्या में एक बात बहुत साफ़ थी — वह हर दिन एक-सी थी और उसमें एक काम ऐसा था जिसे वे सबसे अधिक चाहते थे (संध्या की सवारी)। आपकी दिनचर्या में वह काम कौन-सा है? उसे पहचानना ही अपने आपको जानने की शुरुआत है।
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