प्र1.
(क) कहानी पढ़कर आप बाबा भारती के जीवन के विषय में बहुत कुछ जान चुके हैं। अब आप कहानी के आधार पर बाबा भारती की दिनचर्या लिखिए। वे सुबह उठने से लेकर रात को सोने तक क्या-क्या करते होंगे, लिखिए। इस काम में आप थोड़ा-बहुत अपनी कल्पना का सहारा भी ले सकते हैं।
उत्तर
पहले देखिए कि दिनचर्या के कितने हिस्से कहानी में ही दिए हैं — बाक़ी में ही कल्पना जोड़नी है। अच्छा उत्तर वही है जिसमें कहानी वाली बातें ज़रूर आएँ।
| समय | काम | यह कहाँ से मिला |
|---|---|---|
| रात्रि का चौथा पहर (लगभग 3–6 बजे) | कुटिया से बाहर निकलकर ठंडे जल से स्नान | कहानी से — “चौथा पहर आरंभ होते ही बाबा भारती ने अपनी कुटिया से बाहर निकल ठंडे जल से स्नान किया।” |
| प्रातःकाल | सीधे अस्तबल जाकर सुलतान को देखना, खरहरा करना, अपने हाथ से दाना-पानी देना | कहानी से — “अपने हाथ से खरहरा करते, खुद दाना खिलाते”; “उनके पाँव अस्तबल की ओर मुड़े।” |
| दिन का पूर्वार्ध | मंदिर में भगवान का भजन-पूजन | कहानी से — “गाँव से बाहर एक छोटे-से मंदिर में रहते और भगवान का भजन करते थे।” |
| दोपहर | सादा भोजन, मंदिर की सफ़ाई, दर्शन को आए गाँव वालों से भेंट — जैसे उस दिन खड़्गसिंह आया था | कहानी + थोड़ी कल्पना (“एक दिन वह दोपहर के समय बाबा भारती के पास पहुँचा”) |
| तीसरा पहर | पुनः भजन; घोड़े के पास बैठकर उसे देखते रहना — “देख-देखकर प्रसन्न होते थे” | कहानी से |
| संध्या | सुलतान पर सवार होकर आठ-दस मील का चक्कर — इसके बिना उन्हें चैन न पड़ता था | कहानी से — “जब तक संध्या समय सुलतान पर चढ़कर आठ-दस मील का चक्कर न लगा लेते, उन्हें चैन न आता।” |
| रात | संध्या-भजन, थोड़ा-सा भोजन और विश्राम; डर वाले दिनों में लाठी लेकर अस्तबल का पहरा | कहानी से — “सारी रात अस्तबल की रखवाली में कटने लगी”; “बाबा भारती स्वयं लाठी लेकर पहरा देते थे।” |
नमूना उत्तर:
“बाबा भारती की दिनचर्या बहुत सादी थी। रात का चौथा पहर आरंभ होते ही, जब आकाश में तारे मंद पड़ने लगते, वे अपनी कुटिया से बाहर निकल आते और ठंडे जल से स्नान करते। इसके बाद उनके पाँव अपने आप अस्तबल की ओर मुड़ जाते। वहाँ वे सुलतान के गले पर हाथ फेरते, अपने हाथ से उसका खरहरा करते और खुद दाना-पानी देते। फिर मंदिर में जाकर दीपक जलाते और देर तक भगवान का भजन करते। दोपहर में वे थोड़ा-सा सादा भोजन करते, मंदिर की सफ़ाई करते और जो गाँव वाला मिलने आता, उससे कुशल-क्षेम पूछते। दिन ढलने पर वे फिर भजन में बैठ जाते, और भजन से जो समय बचता, वह पूरा घोड़े को अर्पण हो जाता। संध्या होते ही वे सुलतान पर सवार होकर आठ-दस मील का चक्कर लगाने निकल पड़ते — यह उनके दिन का सबसे प्रिय समय था। लौटकर संध्या-भजन करते और रात होते ही सो जाते। पर जिन दिनों खड़्गसिंह की धमकी का भय था, उन दिनों वे सोते नहीं थे — सारी रात लाठी लेकर अस्तबल के फाटक पर पहरा देते रहते।”
“बाबा भारती की दिनचर्या बहुत सादी थी। रात का चौथा पहर आरंभ होते ही, जब आकाश में तारे मंद पड़ने लगते, वे अपनी कुटिया से बाहर निकल आते और ठंडे जल से स्नान करते। इसके बाद उनके पाँव अपने आप अस्तबल की ओर मुड़ जाते। वहाँ वे सुलतान के गले पर हाथ फेरते, अपने हाथ से उसका खरहरा करते और खुद दाना-पानी देते। फिर मंदिर में जाकर दीपक जलाते और देर तक भगवान का भजन करते। दोपहर में वे थोड़ा-सा सादा भोजन करते, मंदिर की सफ़ाई करते और जो गाँव वाला मिलने आता, उससे कुशल-क्षेम पूछते। दिन ढलने पर वे फिर भजन में बैठ जाते, और भजन से जो समय बचता, वह पूरा घोड़े को अर्पण हो जाता। संध्या होते ही वे सुलतान पर सवार होकर आठ-दस मील का चक्कर लगाने निकल पड़ते — यह उनके दिन का सबसे प्रिय समय था। लौटकर संध्या-भजन करते और रात होते ही सो जाते। पर जिन दिनों खड़्गसिंह की धमकी का भय था, उन दिनों वे सोते नहीं थे — सारी रात लाठी लेकर अस्तबल के फाटक पर पहरा देते रहते।”
दिनचर्या लिखने का ढंग: समय के क्रम से लिखिए — सुबह, दोपहर, शाम, रात। हर काम के साथ एक छोटा-सा ब्योरा जोड़िए (केवल “भजन करते थे” नहीं, बल्कि “दीपक जलाकर देर तक भजन करते थे”)। और जहाँ कहानी में कोई पंक्ति मिलती है, उसे अपने शब्दों में उतार दीजिए — इससे उत्तर पाठ पर टिका हुआ लगता है, हवा में नहीं।