प्र1.
आप जानते ही हैं कि लेखक सुदर्शन ने अनेक कविताएँ भी लिखी हैं। आइए, उनकी लिखी एक कविता पढ़ते हैं— “वह चली हवा / वह चली हवा, वह चली हवा। / ना तू देखे / ना मैं देखूँ / पर पत्तों ने तो देख लिया / वरना वे खुशी मनाते क्यों? / वह चली हवा, वह चली हवा।” — सुदर्शन ● साझी समझ — आपको इस कविता में क्या अच्छा लगा? आपस में चर्चा कीजिए और अपनी लेखन-पुस्तिका में लिखिए।
उत्तर
पहले कविता का भावार्थ: हवा चल पड़ी है। हवा दिखाई नहीं देती — न तुम उसे देख सकते हो, न मैं। फिर भी पेड़ के पत्ते हिलने और खड़खड़ाने लगे हैं। कवि कहता है — लगता है पत्तों ने तो हवा को देख लिया है, वरना वे इस तरह ख़ुशी क्यों मनाते?
| कविता की पंक्ति | उसका अर्थ | ख़ास बात |
|---|---|---|
| “वह चली हवा, वह चली हवा।” | हवा बहने लगी | पुनरुक्ति — एक ही पंक्ति दोहराने से हवा के लगातार बहने की लय बन जाती है; यही कविता की टेक है, जो आरंभ और अंत दोनों में आती है। |
| “ना तू देखे, ना मैं देखूँ” | हवा किसी को दिखाई नहीं देती | कवि पहले यह मान लेता है कि हवा अदृश्य है — इसीलिए आगे वाली बात चौंकाती है। |
| “पर पत्तों ने तो देख लिया” | पत्ते हिल रहे हैं, इसलिए लगता है उन्होंने हवा देख ली | मानवीकरण — पत्तों को आँखें दे दी गईं, वे ‘देखने’ लगे। |
| “वरना वे खुशी मनाते क्यों?” | पत्तों का हिलना-खड़खड़ाना मानो उनका उत्सव है | मानवीकरण के साथ एक चतुर तर्क — कवि प्रमाण देकर अपनी बात मनवा लेता है। |
कविता की सबसे सुंदर बात: कवि सीधे यह नहीं कहता कि “हवा चल रही है, इसलिए पत्ते हिल रहे हैं।” वह उलटकर कहता है — “पत्ते ख़ुश हैं, इसलिए ज़रूर उन्होंने हवा देख ली होगी।” यानी वह परिणाम से कारण की ओर जाता है, और उसी में कविता का सारा आनंद है। जो चीज़ें आँख से नहीं दिखतीं (हवा, स्नेह, ख़ुशबू), उनका पता उनके असर से चलता है — यही इस छोटी-सी कविता का बड़ा संदेश है।
नमूना उत्तर (साझी समझ):
“मुझे इस कविता में सबसे अच्छी बात यह लगी कि यह बहुत छोटी है, पर एक बड़ी बात कह जाती है। हवा को कोई नहीं देख सकता, फिर भी कवि ने कह दिया कि पत्तों ने उसे देख लिया — क्योंकि वे ख़ुशी मना रहे हैं। मुझे यह कल्पना बहुत सुंदर लगी कि पत्तों का हिलना उनका नाचना है। दूसरी बात मुझे यह अच्छी लगी कि ‘वह चली हवा’ पंक्ति बार-बार आती है; उसे पढ़ते समय सचमुच ऐसा लगता है जैसे हवा के झोंके आ-जा रहे हों। इसे पढ़कर मुझे लगा कि कविता के लिए बड़े-बड़े शब्दों की ज़रूरत नहीं होती, बस देखने का नया ढंग चाहिए।”
“मुझे इस कविता में सबसे अच्छी बात यह लगी कि यह बहुत छोटी है, पर एक बड़ी बात कह जाती है। हवा को कोई नहीं देख सकता, फिर भी कवि ने कह दिया कि पत्तों ने उसे देख लिया — क्योंकि वे ख़ुशी मना रहे हैं। मुझे यह कल्पना बहुत सुंदर लगी कि पत्तों का हिलना उनका नाचना है। दूसरी बात मुझे यह अच्छी लगी कि ‘वह चली हवा’ पंक्ति बार-बार आती है; उसे पढ़ते समय सचमुच ऐसा लगता है जैसे हवा के झोंके आ-जा रहे हों। इसे पढ़कर मुझे लगा कि कविता के लिए बड़े-बड़े शब्दों की ज़रूरत नहीं होती, बस देखने का नया ढंग चाहिए।”
जोड़कर देखिए: ‘हार की जीत’ लिखने वाले सुदर्शन ही इस कविता के भी रचयिता हैं। दोनों रचनाओं में एक बात समान है — दोनों में असली बात सीधे नहीं कही जाती। कहानी में बाबा भारती की महानता किसी उपदेश से नहीं, दो आँसुओं से बताई जाती है; और कविता में हवा का होना हवा से नहीं, पत्तों की ख़ुशी से बताया जाता है।