प्र1.
(क) कहानी में से चुनकर कुछ शब्द नीचे दिए गए हैं। बताइए, कहानी में कौन, कब, ऐसा अनुभव कर रहा था— • चकित • अधीर • डर • प्रसन्नता • करुणा • निराशा
उत्तर
हर भाव के साथ नीचे कौन और कब दोनों दिए गए हैं, और साथ में कहानी की वह पंक्ति भी जो उसे सिद्ध करती है।
| भाव | कौन | कब | कहानी की पंक्ति |
|---|---|---|---|
| चकित | खड़्गसिंह | (1) जब उसने पहली बार सुलतान को देखा; (2) जब बाबा भारती ने घोड़ा वापस माँगने के बजाय केवल इतना कहा कि घटना किसी को न बताना | “खड़्गसिंह ने घोड़ा देखा आश्चर्य से।” / “खड़्गसिंह का मुँह आश्चर्य से खुला रह गया।” |
| अधीर | खड़्गसिंह — और एक बार बाबा भारती भी | खड़्गसिंह: सुलतान की कीर्ति सुनकर उसे देखने के लिए, और फिर उसकी चाल देखने के लिए। बाबा भारती: अपने घोड़े की प्रशंसा दूसरे के मुँह से सुनने के लिए | “उसका हृदय उसे देखने के लिए अधीर हो उठा।” / “बालकों की-सी अधीरता से बोला।” / “अपनी चीज़ की प्रशंसा दूसरे के मुख से सुनने के लिए उनका हृदय भी अधीर हो गया।” |
| डर | बाबा भारती | जब खड़्गसिंह धमकी देकर गया — “मैं यह घोड़ा आपके पास न रहने दूँगा।” उसके बाद कई महीनों तक | “बाबा भारती डर गए। अब उन्हें रात को नींद न आती। सारी रात अस्तबल की रखवाली में कटने लगी। प्रतिक्षण खड़्गसिंह का भय लगा रहता।” |
| प्रसन्नता | बाबा भारती | (1) रोज़ घोड़े को देख-देखकर; (2) संध्या की सवारी के समय; (3) सबसे अधिक तब, जब सुलतान लौटा हुआ मिला | “देख-देखकर प्रसन्न होते थे।” / “इस समय उनकी आँखों में चमक थी, मुख पर प्रसन्नता।” / “बाबा भारती आश्चर्य और प्रसन्नता से दौड़ते हुए अंदर घुसे।” |
| करुणा | बाबा भारती (और वेश बदले खड़्गसिंह की आवाज़ में) | जब मार्ग में पड़े अपाहिज ने पुकारा — “ओ बाबा, इस कंगले की सुनते जाना।” उसकी आवाज़ सुनकर बाबा का मन दया से भर गया और उन्होंने घोड़ा रोक लिया | “आवाज़ में करुणा थी। बाबा ने घोड़े को रोक लिया।” |
| निराशा | बाबा भारती | (1) जिस क्षण अपाहिज घोड़ा दौड़ाकर ले भागा; (2) अगली सुबह, जब आदतवश अस्तबल पहुँचकर याद आया कि घोड़ा है ही नहीं | “उनके मुख से भय, विस्मय और निराशा से मिली हुई चीख निकल गई।” / “घोर निराशा ने पाँव को मन-मन-भर का भारी बना दिया।” |
एक बात ध्यान देने की: इनमें से चार भाव (डर, प्रसन्नता, करुणा, निराशा) बाबा भारती के हैं और दो (चकित, अधीर) मुख्यतः खड़्गसिंह के। इससे पता चलता है कि लेखक ने कहानी को बाबा भारती के मन के भीतर से कहा है — हम घटनाएँ अधिकतर उन्हीं की आँखों से देखते हैं। खड़्गसिंह के मन में हम केवल दो बार झाँकते हैं, और दोनों बार वह चौंका हुआ है।