मल्हार अध्याय 4 मन के भाव

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
(क) कहानी में से चुनकर कुछ शब्द नीचे दिए गए हैं। बताइए, कहानी में कौन, कब, ऐसा अनुभव कर रहा था— • चकित • अधीर • डर • प्रसन्नता • करुणा • निराशा
उत्तर

हर भाव के साथ नीचे कौन और कब दोनों दिए गए हैं, और साथ में कहानी की वह पंक्ति भी जो उसे सिद्ध करती है।

भावकौनकबकहानी की पंक्ति
चकितखड़्गसिंह(1) जब उसने पहली बार सुलतान को देखा; (2) जब बाबा भारती ने घोड़ा वापस माँगने के बजाय केवल इतना कहा कि घटना किसी को न बताना“खड़्गसिंह ने घोड़ा देखा आश्चर्य से।” / “खड़्गसिंह का मुँह आश्चर्य से खुला रह गया।”
अधीरखड़्गसिंह — और एक बार बाबा भारती भीखड़्गसिंह: सुलतान की कीर्ति सुनकर उसे देखने के लिए, और फिर उसकी चाल देखने के लिए। बाबा भारती: अपने घोड़े की प्रशंसा दूसरे के मुँह से सुनने के लिए“उसका हृदय उसे देखने के लिए अधीर हो उठा।” / “बालकों की-सी अधीरता से बोला।” / “अपनी चीज़ की प्रशंसा दूसरे के मुख से सुनने के लिए उनका हृदय भी अधीर हो गया।”
डरबाबा भारतीजब खड़्गसिंह धमकी देकर गया — “मैं यह घोड़ा आपके पास न रहने दूँगा।” उसके बाद कई महीनों तक“बाबा भारती डर गए। अब उन्हें रात को नींद न आती। सारी रात अस्तबल की रखवाली में कटने लगी। प्रतिक्षण खड़्गसिंह का भय लगा रहता।”
प्रसन्नताबाबा भारती(1) रोज़ घोड़े को देख-देखकर; (2) संध्या की सवारी के समय; (3) सबसे अधिक तब, जब सुलतान लौटा हुआ मिला“देख-देखकर प्रसन्न होते थे।” / “इस समय उनकी आँखों में चमक थी, मुख पर प्रसन्नता।” / “बाबा भारती आश्चर्य और प्रसन्नता से दौड़ते हुए अंदर घुसे।”
करुणाबाबा भारती (और वेश बदले खड़्गसिंह की आवाज़ में)जब मार्ग में पड़े अपाहिज ने पुकारा — “ओ बाबा, इस कंगले की सुनते जाना।” उसकी आवाज़ सुनकर बाबा का मन दया से भर गया और उन्होंने घोड़ा रोक लिया“आवाज़ में करुणा थी। बाबा ने घोड़े को रोक लिया।”
निराशाबाबा भारती(1) जिस क्षण अपाहिज घोड़ा दौड़ाकर ले भागा; (2) अगली सुबह, जब आदतवश अस्तबल पहुँचकर याद आया कि घोड़ा है ही नहीं“उनके मुख से भय, विस्मय और निराशा से मिली हुई चीख निकल गई।” / “घोर निराशा ने पाँव को मन-मन-भर का भारी बना दिया।”
एक बात ध्यान देने की: इनमें से चार भाव (डर, प्रसन्नता, करुणा, निराशा) बाबा भारती के हैं और दो (चकित, अधीर) मुख्यतः खड़्गसिंह के। इससे पता चलता है कि लेखक ने कहानी को बाबा भारती के मन के भीतर से कहा है — हम घटनाएँ अधिकतर उन्हीं की आँखों से देखते हैं। खड़्गसिंह के मन में हम केवल दो बार झाँकते हैं, और दोनों बार वह चौंका हुआ है।
प्र2.
(ख) आप उपर्युक्त भावों को कब-कब अनुभव करते हैं? लिखिए। (संकेत— जैसे गली में किसी कुत्ते को देखकर डर या प्रसन्नता या करुणा आदि का अनुभव करना)
उत्तर

यह आपके अपने अनुभव का प्रश्न है, इसलिए हर विद्यार्थी का उत्तर अलग होगा। पर अच्छा उत्तर वही है जिसमें हर भाव के साथ एक सच्ची, छोटी-सी घटना जुड़ी हो — केवल “मुझे डर लगता है” कहना अधूरा है।

तरीक़ा: छहों भावों की सूची बनाइए और हर एक के सामने ‘कब’ लिखिए — एक वाक्य में घटना, दूसरे वाक्य में उस समय आपके शरीर-मन को क्या हुआ (दिल तेज़ धड़का, हाथ काँपे, आँख भर आई)।

नमूना उत्तर:
भावमैं इसे कब अनुभव करता/करती हूँ
चकितपिछले वर्ष विज्ञान मेले में मैंने पहली बार सूक्ष्मदर्शी से पानी की एक बूँद देखी। उसमें हिलते-डुलते नन्हे जीव देखकर मैं चकित रह गया — मुझे विश्वास ही नहीं हुआ कि इतना कुछ हमारी आँखों से छिपा रहता है।
अधीरपरीक्षा-परिणाम वाले दिन मैं अधीर हो जाता हूँ। बार-बार घड़ी देखता हूँ और एक जगह बैठा नहीं जाता।
डरगली के मोड़ पर एक बड़ा कुत्ता अचानक भौंकते हुए मेरी ओर दौड़ा था। उस दिन मेरा दिल इतनी तेज़ धड़का कि साइकिल का हैंडल तक काँपने लगा।
प्रसन्नताजब मेरी बनाई चित्रकला कक्षा की दीवार पर लगाई गई और शिक्षिका ने सबके सामने उसकी प्रशंसा की, तब मैं प्रसन्नता से भर उठा।
करुणाबरसात में एक पिल्ला दुकान के छज्जे के नीचे भीगता हुआ काँप रहा था। उसे देखकर मन करुणा से भर गया और मैं उसे घर लाकर बोरी पर सुला आया।
निराशापूरी तैयारी के बाद भी जब मैं दौड़ में अंतिम स्थान पर रहा, तो बहुत निराशा हुई। पर पिताजी ने कहा कि हारने वाला भी वही है जो मैदान में उतरा था — इससे मन हल्का हो गया।
यह अभ्यास क्यों दिया गया है: कहानी के पात्रों के भाव तभी सच्चे लगते हैं जब हम उन्हें अपने भीतर पहचान लें। जब आप लिखते हैं कि कुत्ते को देखकर आपका दिल धड़का था, तो आप बाबा भारती के उस डर को भी बेहतर समझ पाते हैं जिसमें उनकी रातों की नींद उड़ गई थी। भाव पहचानना अच्छा पाठक बनने की पहली सीढ़ी है।
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