मल्हार अध्याय 4 सुलतान की कहानी

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
मान लीजिए, यह कहानी सुलतान सुना रहा है। तब कहानी कैसे आगे बढ़ती? स्वयं को सुलतान के स्थान पर रखकर कहानी बनाइए। (संकेत— आप कहानी को इस प्रकार बढ़ा सकते हैं — मेरा नाम सुलतान है। मैं एक घोड़ा हूँ..... )
उत्तर

यह सृजन का प्रश्न है — आपको वही कहानी दूसरी आँख से लिखनी है। ऐसी कहानी को आत्मकथात्मक शैली कहते हैं, क्योंकि इसमें ‘मैं’ ही सब कुछ बताता है।

लिखने से पहले चार बातें तय कर लीजिए —

  • पूरी कहानी ‘मैं’ में हो — “मैंने देखा”, “मुझे लगा”, “मेरे स्वामी”।
  • वही बताइए जो घोड़ा जान सकता है — वह बाबा भारती के मन की बात नहीं जान सकता, पर उनके हाथ का स्पर्श, उनकी आवाज़, उनके पाँवों की चाप पहचान सकता है।
  • घोड़े की इंद्रियाँ काम में लाइए — गंध, आहट, चाबुक-लगाम का दबाव, दाने का स्वाद। यही आपकी कहानी को नया बनाएगा।
  • घटनाओं का क्रम वही रखिए — डाकू का आना, चाल दिखाना, अपाहिज का धोखा, बाबा की प्रार्थना, रात को वापसी।
नमूना उत्तर:
“मेरा नाम सुलतान है। मैं एक घोड़ा हूँ — सफ़ेद, ऊँचा और, लोग कहते हैं, बड़ा बाँका। मैं गाँव के बाहर एक छोटे-से मंदिर के अस्तबल में रहता हूँ। मेरे स्वामी बाबा भारती हैं। हर सुबह मुँह-अँधेरे वे नहाकर सीधे मेरे पास आते हैं, अपने हाथों से मेरा खरहरा करते हैं और दाना खिलाते हैं। उनके हाथ की गंध मुझे इतनी भली लगती है कि आहट सुनते ही मैं कान खड़े कर लेता हूँ।

एक दोपहर एक भारी डील-डौल वाला आदमी आया। उसकी आँखों में जो चमक थी, वह मुझे अच्छी नहीं लगी — हम जानवर आदमी की आँख पढ़ लेते हैं। बाबा ने गर्व से मुझे उसके सामने खड़ा किया, फिर मेरी पीठ पर हाथ फेरा और सवार हो गए। मैं हवा से बातें करने लगा। लौटकर मैंने देखा, वह आदमी मुझे ऐसे देख रहा था जैसे मैं उसी का हो चुका होऊँ। जाते-जाते वह कुछ कह गया, और उस रात से बाबा ने अस्तबल के फाटक पर लाठी लेकर पहरा देना शुरू कर दिया।

कई महीने बीत गए। एक साँझ हम रोज़ की तरह घूमने निकले। रास्ते में एक अपाहिज कराह रहा था। बाबा ने मुझे रोका और उसे मेरी पीठ पर बिठा दिया, स्वयं लगाम पकड़कर पैदल चलने लगे। तभी उस आदमी ने मेरी पसलियों में एड़ लगाई — और वह गंध! वही चमकती आँखों वाला डाकू था। मैं रुकना चाहता था, पर लगाम उसके हाथ में थी और मुझे दौड़ना पड़ा। पीछे से बाबा की चीख सुनकर मेरा कलेजा काँप गया।

वह मुझे बहुत दूर ले गया। पर उस रात वह अजीब-सा चुप था। आधी रात बीते उसने मेरी बाग पकड़ी और चुपचाप उसी अस्तबल के फाटक तक ले आया, जहाँ से मुझे ले गया था। उसने मुझे मेरी जगह पर बाँधा, फाटक बंद किया और बाहर खड़ा होकर रोने लगा। मैं समझ नहीं पाया कि आदमी लूटकर लौटाता क्यों है और लौटाकर रोता क्यों है।

सुबह होने से पहले मैंने वही जानी-पहचानी चाप सुनी — बाबा के पाँवों की। मैं ज़ोर से हिनहिनाया। वे दौड़ते हुए भीतर आए और मेरे गले से लिपटकर रोने लगे, ठीक वैसे जैसे कोई पिता बिछड़े बेटे से मिलता है। बार-बार मेरी पीठ थपथपाते और कहते जाते — ‘अब कोई गरीबों की सहायता से मुँह न मोड़ेगा।’ उस दिन मुझे समझ आया कि मेरे स्वामी ने मुझे नहीं, मुझसे भी बड़ी कोई चीज़ बचाई थी।”
ऐसी कहानी लिखने का लाभ: जब कहानी कहने वाला बदलता है, तो पाठक को नई बातें दिखने लगती हैं। सुदर्शन की मूल कहानी में हमें बाबा भारती और खड़्गसिंह के मन का पता चलता है; सुलतान की ज़ुबानी वही घटनाएँ गंध, आहट और स्पर्श के रास्ते आती हैं। यही कारण है कि लेखक कभी-कभी जान-बूझकर कहानी किसी पशु, किसी बच्चे या किसी निर्जीव वस्तु से कहलवाते हैं।
क्या यह उपयोगी रहा? त्रुटि बताएँ