प्र1.
(क) “कभी तो निशा को सवेरा मिलेगा” — निशा का अर्थ है— रात। सवेरा का अर्थ है— सुबह। आपने अनुभव किया होगा कि कविता में इन दोनों शब्दों का प्रयोग ‘रात’ और ‘सुबह’ के लिए नहीं किया गया है। अपने समूह में चर्चा करके पता लगाइए कि ‘निशा’ और ‘सवेरा’ का इस कविता में क्या-क्या अर्थ हो सकता है। (संकेत— निशा से जुड़ा है ‘अँधेरा’ और सवेरे से जुड़ा है ‘उजाला’)
उत्तर
सोचिए — रात के बाद सुबह तो अपने आप आ जाती है, उसके लिए ‘कभी तो’ कहने की क्या ज़रूरत? कवि ने ‘कभी तो निशा को सवेरा मिलेगा’ लिखा है। इसी से पता चलता है कि यह उस रात की बात नहीं जो आठ घंटे में बीत जाती है। यहाँ दोनों शब्द प्रतीक हैं।
| ‘निशा’ के अर्थ (अँधेरे से जुड़े) | ‘सवेरा’ के अर्थ (उजाले से जुड़े) |
|---|---|
| दुख, कष्ट, बुरा समय | सुख, चैन, अच्छे दिन |
| निराशा, हताशा | आशा, उत्साह, नई हिम्मत |
| अज्ञान, अंधविश्वास, मूर्खता | ज्ञान, समझ, विवेक |
| बुराई, अन्याय, अत्याचार | अच्छाई, न्याय, भलाई |
| ग़रीबी, भूख, बीमारी | ख़ुशहाली, सुख-समृद्धि |
| आपस की लड़ाई, अशांति | मेल-मिलाप, शांति |
पूरा उत्तर एक वाक्य में — ‘निशा’ यहाँ दुख, अज्ञान, निराशा और बुराई का प्रतीक है, और ‘सवेरा’ सुख, ज्ञान, आशा और अच्छाई का। कवि कह रहे हैं कि दुनिया का यह बुरा समय भी एक दिन बीतेगा और अच्छे दिन आएँगे।
प्रतीक होता क्या है: जब कोई शब्द अपने सीधे अर्थ से आगे बढ़कर किसी बड़े भाव की जगह खड़ा हो जाए, तो वह प्रतीक कहलाता है। जैसे तिरंगा केवल कपड़ा नहीं, देश है; कबूतर केवल पक्षी नहीं, शांति है। इसी तरह इस कविता में दीप केवल मिट्टी का दीया नहीं, भलाई है — और निशा केवल रात नहीं, दुख है।