मल्हार अध्याय 7 प्रतीक

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
(क) “कभी तो निशा को सवेरा मिलेगा” — निशा का अर्थ है— रात। सवेरा का अर्थ है— सुबह। आपने अनुभव किया होगा कि कविता में इन दोनों शब्दों का प्रयोग ‘रात’ और ‘सुबह’ के लिए नहीं किया गया है। अपने समूह में चर्चा करके पता लगाइए कि ‘निशा’ और ‘सवेरा’ का इस कविता में क्या-क्या अर्थ हो सकता है। (संकेत— निशा से जुड़ा है ‘अँधेरा’ और सवेरे से जुड़ा है ‘उजाला’)
उत्तर

सोचिए — रात के बाद सुबह तो अपने आप आ जाती है, उसके लिए ‘कभी तो’ कहने की क्या ज़रूरत? कवि ने ‘कभी तो निशा को सवेरा मिलेगा’ लिखा है। इसी से पता चलता है कि यह उस रात की बात नहीं जो आठ घंटे में बीत जाती है। यहाँ दोनों शब्द प्रतीक हैं।

‘निशा’ के अर्थ (अँधेरे से जुड़े)‘सवेरा’ के अर्थ (उजाले से जुड़े)
दुख, कष्ट, बुरा समयसुख, चैन, अच्छे दिन
निराशा, हताशाआशा, उत्साह, नई हिम्मत
अज्ञान, अंधविश्वास, मूर्खताज्ञान, समझ, विवेक
बुराई, अन्याय, अत्याचारअच्छाई, न्याय, भलाई
ग़रीबी, भूख, बीमारीख़ुशहाली, सुख-समृद्धि
आपस की लड़ाई, अशांतिमेल-मिलाप, शांति

पूरा उत्तर एक वाक्य में — ‘निशा’ यहाँ दुख, अज्ञान, निराशा और बुराई का प्रतीक है, और ‘सवेरा’ सुख, ज्ञान, आशा और अच्छाई का। कवि कह रहे हैं कि दुनिया का यह बुरा समय भी एक दिन बीतेगा और अच्छे दिन आएँगे।

प्रतीक होता क्या है: जब कोई शब्द अपने सीधे अर्थ से आगे बढ़कर किसी बड़े भाव की जगह खड़ा हो जाए, तो वह प्रतीक कहलाता है। जैसे तिरंगा केवल कपड़ा नहीं, देश है; कबूतर केवल पक्षी नहीं, शांति है। इसी तरह इस कविता में दीप केवल मिट्टी का दीया नहीं, भलाई है — और निशा केवल रात नहीं, दुख है।
प्र2.
(ख) कविता में से चुनकर कुछ शब्द नीचे दिए गए हैं। अपने समूह में मिलकर इन पर चर्चा कीजिए और इन्हें उपयुक्त स्थान पर लिखिए। शब्द — दिये, अँधेरा, अमावस, पूर्णिमा, दिवस, तिमिर, नाव, किनारा, शिला, ज्योति, उजेला, तूफ़ान, लौ, स्वर्ण, जलना, बुझना। (‘सवेरा’ और ‘निशा’ के शब्द-जाल में भरना है।)
उत्तर

सोलह शब्द दिए हैं और दोनों शब्द-जालों में आठ-आठ बादल बने हैं। इसलिए आठ शब्द ‘सवेरा’ के नीचे और आठ ‘निशा’ के नीचे आएँगे।

सवेरा (उजाले से जुड़े शब्द)कविता में कहाँनिशा (अँधेरे से जुड़े शब्द)कविता में कहाँ
दिये“जलाते चलो ये दिये स्नेह भर-भर”अँधेरा“कभी तो धरा का अँधेरा मिटेगा।”
पूर्णिमा“अमावस बने पूर्णिमा-सी”अमावस“घिरी आ रही है अमावस निशा-सी।”
दिवस“आज क्यों दिवस ही में”तिमिर“कभी तो तिमिर का किनारा मिलेगा॥”
ज्योति“मगर बुझ स्वयं ज्योति जो दे गए वे”तूफ़ान“दिये और तूफ़ान की यह कहानी”
उजेला“उसी से तिमिर को उजेला मिलेगा॥”शिला“युगों से तुम्हीं ने तिमिर की शिला पर”
लौ“जली जो प्रथम बार लौ दीप की”नाव“तिमिर की सरित पार करने… दीप की नाव”
स्वर्ण“स्वर्ण-सी जल रही और जलती रहेगी।”किनारा“कभी तो तिमिर का किनारा मिलेगा॥”
जलना“जलते हुए दीप”, “जलाते चलो”बुझना“अनगिन तुम्हारे पवन ने बुझाए।”
‘नाव’, ‘किनारा’ और ‘शिला’ किस ओर जाएँगे — यह उलझन ज़रूर होगी: कविता में ये तीनों शब्द हर बार तिमिर के साथ ही आते हैं — तिमिर की सरित पार करने वाली नाव, तिमिर का किनारा, तिमिर की शिला। इसीलिए ये अँधेरे के चित्र का हिस्सा हैं और ‘निशा’ के नीचे बैठते हैं। पर यदि आपका समूह यह तर्क दे कि नाव और किनारा तो अँधेरे से पार निकलने के साधन और मंज़िल हैं, इसलिए वे ‘सवेरा’ की ओर जाएँगे — तो यह भी एक अच्छा तर्क है। कक्षा में दोनों पक्ष रखिए; बस अपना कारण कविता की पंक्ति से दीजिए।
पक्का नियम: बाक़ी चौदह शब्दों में कोई उलझन नहीं। जो चीज़ प्रकाश देती है (दिये, ज्योति, लौ, उजेला, दिवस, पूर्णिमा, स्वर्ण, जलना) वह सवेरे की ओर; जो प्रकाश छीनती है (अँधेरा, अमावस, तिमिर, तूफ़ान, बुझना) वह निशा की ओर।
प्र3.
(ग) अपने समूह में मिलकर ‘निशा’ और ‘सवेरा’ के लिए कुछ और शब्द सोचिए और लिखिए। (संकेत— नीचे दिए गए चित्र देखिए और इन पर विचार कीजिए।)
उत्तर

पहले पुस्तक के चार चित्र-जोड़े देखिए। हर जोड़े में एक ही दृश्य दो हालतों में दिखाया गया है — एक ‘सवेरा’ वाली, एक ‘निशा’ वाली।

चित्र-जोड़ासवेरे वाला चित्रनिशा वाला चित्रकौन-सा शब्द मिला
1. पहाड़चोटी पर झंडा गाड़े खड़ा पर्वतारोहीवही पहाड़, चोटी सूनीसवेरा = सफलता, विजय / निशा = हार, अधूरापन
2. क़िलाहरियाली से घिरा, धूप में चमकता क़िलावही क़िला काला-नीला, उजड़ा हुआसवेरा = समृद्धि, उन्नति / निशा = पतन, वीरानी
3. गुलाबफूलों से लदी भरी-पूरी झाड़ीअकेली डाल पर एक फूलसवेरा = ख़ुशहाली, भरा-पूरा जीवन / निशा = अभाव, अकेलापन
4. चाँदखुले तारों भरे आकाश में पूरा चाँदबादलों के पीछे छिपा चाँदसवेरा = स्पष्टता, आशा / निशा = बाधा, निराशा

इन्हीं से बने कुछ और शब्द —

‘निशा’ के लिए‘सवेरा’ के लिए
अंधकार, अँधियारा, तम, तिमिर, कालिमाउजाला, प्रकाश, आलोक, ज्योति, भोर, प्रभात, अरुणोदय
निराशा, हताशा, मायूसीआशा, उम्मीद, उत्साह, उमंग
दुख, पीड़ा, विपत्ति, संकटसुख, आनंद, चैन, शांति
अज्ञान, मूर्खता, अंधविश्वासज्ञान, विद्या, समझ, विवेक
हार, असफलता, ठहरावजीत, सफलता, उन्नति, प्रगति
वीरानी, उजड़ना, मुरझाना, सूनापनहरियाली, खिलना, बसना, भरा-पूरा होना
चित्रों से यह भी समझिए: चारों जोड़ों में वस्तु वही है, हालत अलग है — वही पहाड़, वही क़िला, वही गुलाब, वही चाँद। कवि की बात भी यही है — दुनिया वही रहती है, बस उस पर ‘निशा’ छाई है या ‘सवेरा’। और यह हालत बदली जा सकती है — बस कोई दिया जलाता रहे।
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