प्र1.
(क) “जलाते चलो ये दिये स्नेह भर-भर” — इस पंक्ति में ‘चलो’ के स्थान पर ‘रहो’ शब्द रखकर पढ़िए। इस शब्द के बदलने से पंक्ति के अर्थ में क्या अंतर आ रहा है? अपने समूह में चर्चा कीजिए।
उत्तर
दोनों पंक्तियाँ एक बार बोलकर देखिए —
“जलाते चलो ये दिये स्नेह भर-भर”
“जलाते रहो ये दिये स्नेह भर-भर”
“जलाते रहो ये दिये स्नेह भर-भर”
अर्थ बहुत बदल नहीं जाता, पर भाव बदल जाता है — और कविता में यही असली बात है।
| शब्द | उसमें क्या भाव है | कैसा चित्र बनता है |
|---|---|---|
| चलो (कवि का चुना हुआ) | निरंतरता + गति, आगे बढ़ना, यात्रा | कोई रुका नहीं है — लोग चलते जा रहे हैं और चलते-चलते दीप जलाते जा रहे हैं। रास्ता आगे बढ़ता जाता है। |
| रहो | केवल निरंतरता, गति नहीं | कोई एक जगह खड़ा या बैठा है और वहीं दीप जलाता जा रहा है। काम तो चल रहा है, पर आगे कोई नहीं बढ़ रहा। |
इसलिए ‘चलो’ ही उपयुक्त है — क्योंकि पूरी कविता एक यात्रा की कविता है। इसमें नदी है (“तिमिर की सरित”), नाव है (“बना दीप की नाव”), किनारा है (“कभी तो तिमिर का किनारा मिलेगा”) और आगे बढ़ने का आदेश भी है (“बहाते चलो नाव तुम वह निरंतर”)। ‘रहो’ रख देने से यह पूरी यात्रा रुक जाती।
एक बात और: ‘चलो’ में साथ चलने का भाव भी है — जैसे कोई हाथ पकड़कर कह रहा हो, “आओ, चलते हैं।” ‘रहो’ में यह अपनापन नहीं, केवल आदेश है। कविता पाठक को साथ लेकर चलना चाहती है, इसलिए ‘चलो’ ही ठीक बैठता है।
ख़ुद करके देखिए: ‘बहाते चलो नाव तुम वह निरंतर’ में भी ‘चलो’ की जगह ‘रहो’ रखकर पढ़िए — “बहाते रहो नाव तुम वह निरंतर।” नाव तो चल रही है, पर लगता है जैसे वह एक ही जगह पानी में हिल रही हो, किनारे की ओर बढ़ ही न रही हो। इसी छोटे-से अंतर को पहचानना कविता पढ़ना सीखना है।