कक्षा ६ हिंदी अध्याय 7 जलाते चलो के लिए एनसीईआरटी समाधान
अद्यतन 2026-09-19
इस अध्याय के बारे में
कविता का नाम ‘जलाते चलो’ और कवि हैं द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी (1916–1998)। बाल साहित्य के चर्चित रचनाकारों में इनका नाम प्रमुखता से लिया जाता है। इनका लिखा गीत ‘हम सब सुमन एक उपवन के’ आज भी बहुत लोकप्रिय है। कविता किससे कही गई है — पूरी कविता में कवि ‘तुम’ कहकर मनुष्य को पुकारता है। वही मनुष्य, जिसने युगों पहले पहला दीप जलाकर अँधेरे को पहली चुनौती दी थी — “जला दीप पहला तुम्हीं ने तिमिर की, चुनौती प्रथम बार स्वीकार की थी।” मुख्य भाव — दीप जलाते चलो, यानी दूसरों की भलाई के काम करते चलो । तूफ़ान अनगिनत दीप बुझा चुका है, फिर भी हार दीप की नहीं हुई — क्योंकि बुझने वाला दीप भी अपनी ज्योति दूसरे को दे जाता है। प्रतीक — कविता में ‘दीप, ज्योति, लौ, सवेरा, पूर्णिमा’ अच्छाई, ज्ञान और आशा के प्रतीक हैं; ‘तिमिर, निशा, अमावस, तूफ़ान’ दुख, अज्ञान, बुराई और निराशा के। इसीलिए ‘निशा’ का अर्थ यहाँ केवल ‘रात’
त्वरित पुनरावृत्ति
| कविता का शब्द | कविता में अर्थ | कविता में कहाँ आया है | अपना एक वाक्य |
|---|---|---|---|
| तिमिर | अँधेरा, अंधकार; यहाँ दुख-अज्ञान का प्रतीक | “कभी तो तिमिर का किनारा मिलेगा॥” | ज्ञान का दीपक जलते ही मन का तिमिर मिट जाता है। |
| निशा | रात; यहाँ निराशा और बुरे समय का प्रतीक | “कभी तो निशा को सवेरा मिलेगा॥” | दुख की निशा कितनी भी लंबी हो, सवेरा आता ज़रूर है। |
| अमावस | अमावस्या — वह रात जिसमें चंद्रमा दिखाई नहीं देता | “घिरी आ रही है अमावस निशा-सी।” | अमावस की रात में तारे और भी चमकीले लगते हैं। |
| पूर्णिमा | पूर्णमासी — वह तिथि जिस रात चंद्रमा पूरा दिखाई देता है | “कि जिससे अमावस बने पूर्णिमा-सी,” | पूर्णिमा की रात नदी का पानी चाँदी-सा चमकता है। |
| सरित | नदी (सरिता का काव्य-रूप) | “तिमिर की सरित पार करने तुम्हीं ने” | गाँव के पास बहती सरित ही हमारी प्यास बुझाती है। |
| धरा | धरती, पृथ्वी | “कभी तो धरा का अँधेरा मिटेगा।” | वर्षा होते ही धरा हरी चादर ओढ़ लेती है। |
| स्नेह | (1) दीपक का तेल, (2) प्रेम — दोनों अर्थ एक साथ | “जलाते चलो ये दिये स्नेह भर-भर” | माँ के स्नेह से बड़ा कोई सहारा नहीं। |
| ज्योति | दीपक की लौ, प्रकाश | “मगर बुझ स्वयं ज्योति जो दे गए वे” | एक दीपक की ज्योति से सौ दीपक जल सकते हैं। |
| उजेला | उजाला, प्रकाश (उजाला का काव्य-रूप) | “उसी से तिमिर को उजेला मिलेगा॥” | खिड़की खुलते ही कमरे में उजेला भर गया। |
| अनगिन / अनगिनत | जिन्हें गिना न जा सके, असंख्य | “दिये अनगिनत है निरंतर जलाए”, “अनगिन तुम्हारे पवन ने बुझाए।” | आकाश में अनगिनत तारे टिमटिमा रहे थे। |
| स्वर्ण | सोना; यहाँ लौ की सुनहरी चमक | “स्वर्ण-सी जल रही और जलती रहेगी।” | सूर्यास्त के समय आकाश स्वर्ण-सा दिखता है। |
| शिला | चट्टान, बड़ा पत्थर | “युगों से तुम्हीं ने तिमिर की शिला पर” | नदी के बीच पड़ी शिला पर बगुला बैठा था। |
| साक्षी | गवाह | “समय साक्षी है कि जलते हुए दीप” | यह पुराना बरगद गाँव के सौ वर्षों का साक्षी है। |
| निहित | छिपा हुआ, समाया हुआ | “भले शक्ति विज्ञान में है निहित वह” | इस छोटी-सी कहानी में बड़ी सीख निहित है। |
| पवन | हवा, वायु | “अनगिन तुम्हारे पवन ने बुझाए।” | सुबह की ठंडी पवन मन को ताज़ा कर देती है। |
अभ्यास
- मेरी समझ से
- मिलकर करें मिलान
- पंक्तियों पर चर्चा
- सोच-विचार के लिए
- कविता की रचना
- मिलान
- अनुमान या कल्पना से
- शब्दों के रूप
- अर्थ की बात
- प्रतीक
- पंक्ति से पंक्ति
- सा/सी/से का प्रयोग
- आपकी बात
- अमावस्या और पूर्णिमा
- तिथिपत्र
- आज की पहेली
- खोजबीन के लिए