सही उत्तर है — भलाई के कार्य करते रहना। इसी विकल्प के सामने तारा (★) बनाइए।
कविता की पहली ही पंक्ति इसका प्रमाण है —
कभी तो धरा का अँधेरा मिटेगा।”
यहाँ ‘स्नेह’ का दोहरा अर्थ है — दीपक का तेल भी और प्रेम भी। यानी प्रेम से भरे दीपक जलाते चलो। और कविता के अंत में यही बात खुलकर आ जाती है — “रहेगा धरा पर दिया एक भी यदि, कभी तो निशा को सवेरा मिलेगा।” यह किसी त्योहार की बात नहीं, जीवन भर भलाई करते रहने की बात है।
| विकल्प | सही / ग़लत | कारण |
|---|---|---|
| भलाई के कार्य करते रहना | सही ★ | ‘दीप’ यहाँ प्रतीक है — भलाई, आशा और परोपकार का। पूरी कविता यही कहती है कि यह काम रुकना नहीं चाहिए। |
| दीपावली के दीपक जलाना | ग़लत | कविता में दीपावली का नाम तक नहीं है। दीप यहाँ त्योहार का नहीं, प्रतीक का दीप है। |
| बल्ब आदि जलाकर अंधकार दूर करना | ग़लत | कवि तो इसका उलटा कहता है — “बिना स्नेह विद्युत-दिये जल रहे जो, बुझाओ इन्हें, यों न पथ मिल सकेगा।” |
| तिमिर मिलने तक नाव चलाते रहना | ग़लत | कविता में नाव तिमिर मिलने तक नहीं, तिमिर को पार करने तक चलानी है — “कभी तो तिमिर का किनारा मिलेगा।” |