मल्हार अध्याय 7 अनुमान या कल्पना से

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
अपने समूह में मिलकर चर्चा कीजिए— (क) “दिये और तूफ़ान की यह कहानी / चली आ रही और चलती रहेगी” — दीपक और तूफ़ान की यह कौन-सी कहानी हो सकती है जो सदा से चली आ रही है?
उत्तर

यह दीपक और तूफ़ान की लड़ाई की कहानी है — जो न कभी शुरू होते देखी गई, न कभी ख़त्म होते।

कहानी कुछ यों है: जिस दिन मनुष्य ने पहला दीप जलाया, उसी दिन से हवा उसे बुझाने लगी। दीपक बुझा, मनुष्य ने फिर जलाया। तूफ़ान और तेज़ आया, और भी दीप बुझे — “अनगिन तुम्हारे पवन ने बुझाए।” पर मनुष्य ने हार नहीं मानी, वह फिर-फिर जलाता रहा। यही कहानी युगों से चली आ रही है और आगे भी चलती रहेगी।

इसका असली अर्थ — यहाँ दीपक और तूफ़ान दो प्रतीक हैं:

दीपक किसका प्रतीकतूफ़ान किसका प्रतीकतो कहानी क्या हुई
अच्छाई, भलाईबुराई, अन्यायअच्छाई और बुराई का संघर्ष — जो हर युग में चलता रहा है
आशा, हिम्मतनिराशा, डरमनुष्य के मन के भीतर चलने वाली लड़ाई
ज्ञान, विवेकअज्ञान, अंधविश्वासज्ञान का प्रकाश फैलाने वालों और उसे रोकने वालों की कहानी
सत्य के लिए खड़ा एक व्यक्तिउसे रोकने वाली सारी ताक़तेंहर युग के सत्यवादी और सुधारक की कहानी
कवि ने ‘कहानी’ शब्द क्यों चुना: ‘लड़ाई’ कहते तो केवल हिंसा का चित्र बनता। ‘कहानी’ कहने से दो बातें एक साथ आ जाती हैं — यह बहुत पुरानी है, और यह आगे भी सुनाई जाती रहेगी। कहानी वही चलती है जो लोगों को याद रह जाए। यानी दीपक की जीत हर बार याद रखी गई है, इसीलिए वह कहानी बन गई।
अपनी कल्पना जोड़िए: यही कहानी आप अपने आसपास भी देख सकते हैं — परीक्षा की घबराहट (तूफ़ान) और रोज़ की थोड़ी-थोड़ी पढ़ाई (दीपक); गाँव में फैली कोई अफ़वाह (तूफ़ान) और सच बोलने वाला एक व्यक्ति (दीपक)। समूह में हर सदस्य ऐसा एक-एक उदाहरण सोचकर बताए।
प्र2.
(ख) “जली जो प्रथम बार लौ दीप की / स्वर्ण-सी जल रही और जलती रहेगी” — दीपक की यह सोने जैसी लौ क्या हो सकती है जो अनगिनत सालों से जल रही है?
उत्तर

यह वही पहली लौ है जो किसी मिट्टी के दीये में नहीं, मनुष्य के मन में जली थी — साहस, विश्वास और भलाई की लौ। दीये तो अनगिनत बुझ गए, पर वह भावना कभी नहीं बुझी। इसीलिए कवि कहते हैं कि वह आज भी जल रही है और आगे भी जलती रहेगी।

यह लौ क्या-क्या हो सकती है —

  • अँधेरे से लड़ने का साहस — वही जिससे मनुष्य ने पहली बार तिमिर को चुनौती दी थी।
  • ज्ञान का प्रकाश — जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचता रहा। एक दीये से दूसरा दीया जलता है, वैसे ही एक गुरु से दूसरा शिष्य।
  • दूसरों के लिए जीने की भावना — कविता का ‘स्नेह’, यानी वह प्रेम जिससे दीप जलते हैं।
  • यह विश्वास कि अच्छाई अंत में जीतती है — यही विश्वास हर युग में लोगों को टूटने से बचाता रहा।
  • आशा — कठिन से कठिन समय में भी यह मान लेना कि “कभी तो निशा को सवेरा मिलेगा।”
‘स्वर्ण-सी’ में छिपी दो बातें: सोने की पहली विशेषता — वह मैला नहीं होता, जंग नहीं लगती; दूसरी — वह घटता नहीं। कवि इशारा कर रहे हैं कि भलाई की यह लौ न समय के साथ मैली हुई, न कम हुई। हज़ारों साल पहले किसी ने जो सच्चाई और करुणा दिखाई थी, वह आज भी उतनी ही क़ीमती है। ‘सी’ लगने से यह उपमा अलंकार बन गया है।
सोचकर देखिए: आपके घर में शायद कोई ऐसी सीख चली आ रही होगी जो दादी को उनकी दादी ने दी थी — जैसे “भूखे को खाना ज़रूर देना।” वह भी एक ऐसी ही लौ है, जो किसी दीये में नहीं, लोगों के व्यवहार में जल रही है। ऐसी एक सीख अपनी लेखन-पुस्तिका में लिखिए।
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