मल्हार अध्याय 7 सोच-विचार के लिए

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
(क) कविता में अँधेरे या तिमिर के लिए किन वस्तुओं के उदाहरण दिए गए हैं?
उत्तर

कवि ने अँधेरे को कोई एक चीज़ नहीं रहने दिया — उसे बार-बार किसी न किसी वस्तु का रूप देकर दिखाया है। कविता में ये उदाहरण आए हैं —

अँधेरे के लिए दी गई वस्तुकविता की पंक्तिइससे क्या चित्र बनता है
अमावस की रात (निशा)“घिरी आ रही है अमावस निशा-सी।”अँधेरा चारों ओर से घेर लेने वाली काली रात है — और वह भी दिन के समय!
सरित यानी नदी“तिमिर की सरित पार करने तुम्हीं ने”अँधेरा एक बहती नदी है, जिसे पार करना पड़ता है — इसीलिए नाव चाहिए।
शिला यानी चट्टान“युगों से तुम्हीं ने तिमिर की शिला पर”अँधेरा कठोर चट्टान है, जिस पर टिककर दीप जलाने पड़ते हैं।
तूफ़ान / पवन“अनगिन तुम्हारे पवन ने बुझाए।”अँधेरा हवा बनकर आता है और जलते दीप बुझा देता है।
बिना स्नेह जलते विद्युत-दिये“बिना स्नेह विद्युत-दिये जल रहे जो”जो उजाला प्रेम के बिना है, वह उजाला नहीं — वह भी एक तरह का अँधेरा ही है।

इनके साथ ‘अँधेरा’ और ‘तिमिर’ शब्द तो सीधे आए ही हैं — “कभी तो धरा का अँधेरा मिटेगा”, “कभी तो तिमिर का किनारा मिलेगा”।

ध्यान देने की बात: नदी, चट्टान, रात, तूफ़ान — ये चारों ऐसी चीज़ें हैं जो मनुष्य के रास्ते में रुकावट बनती हैं। कवि ने अँधेरे को इन्हीं का रूप देकर बताया कि दुख भी ऐसी ही रुकावट है। पर हर रुकावट का उपाय भी उसने साथ ही दिया — नदी के लिए नाव, तूफ़ान के लिए फिर से जलाया गया दीप।
प्र2.
(ख) यह कविता आशा और उत्साह जगाने वाली कविता है। इसमें क्या आशा की गई है? यह आशा क्यों की गई है?
उत्तर

क्या आशा की गई है — यही कि अँधेरा हमेशा नहीं रहेगा। कविता में तीन बार यह आशा दोहराई गई है, और तीनों बार शब्द बदलते हैं पर बात एक ही रहती है —

“कभी तो धरा का अँधेरा मिटेगा।”
“कभी तो तिमिर का किनारा मिलेगा॥”
“कभी तो निशा को सवेरा मिलेगा॥”

इसके साथ एक आशा और है — “उसी से तिमिर को उजेला मिलेगा।” यानी जो दीप स्वयं बुझ गया, उसकी दी हुई ज्योति से भी अँधेरा हारेगा।

यह आशा क्यों की गई है — इसके तीन ठोस कारण कविता में ही दिए हैं:

  1. मनुष्य पहले भी जीत चुका है। उसी ने पहला दीप जलाकर अँधेरे की चुनौती स्वीकार की थी और ‘युगों से’ लगातार दीप जलाता आया है।
  2. दीपक हारता नहीं, आगे बढ़ जाता है। “मगर बुझ स्वयं ज्योति जो दे गए वे” — बुझने से पहले वह अपनी लौ दूसरे दीपक को दे जाता है, इसलिए ज्योति की परंपरा कभी टूटती नहीं।
  3. जीत के लिए एक दिया भी काफ़ी है। “रहेगा धरा पर दिया एक भी यदि, कभी तो निशा को सवेरा मिलेगा।” जब शर्त इतनी छोटी है, तो निराश होने का कारण ही नहीं बचता।
‘कभी तो’ शब्द पर ध्यान दीजिए: कवि यह नहीं कहते कि कल ही सवेरा हो जाएगा। वे कहते हैं — ‘कभी तो’। यानी समय लगेगा, पर होगा ज़रूर। यही सच्ची आशा है — जल्दबाज़ी वाली नहीं, धीरज वाली। इसीलिए कविता उत्साह भी जगाती है और अधीर भी नहीं बनाती।
प्र3.
(ग) कविता में किसे जलाने और किसे बुझाने की बात कही गई है?
उत्तर

कविता में एक ही साँस में दो उलटे आदेश दिए गए हैं — कुछ जलाओ और कुछ बुझाओ।

क्या करना हैकिसेकविता की पंक्तिक्यों
जलाना हैस्नेह से भरे दिये“जलाते चलो ये दिये स्नेह भर-भर”क्योंकि इन्हीं से धरती का अँधेरा मिटेगा। ‘स्नेह’ यानी तेल भी और प्रेम भी।
बुझाना हैबिना स्नेह जल रहे विद्युत-दिये“बिना स्नेह विद्युत-दिये जल रहे जो, बुझाओ इन्हें, यों न पथ मिल सकेगा॥”क्योंकि जिस उजाले में प्रेम नहीं, वह रास्ता नहीं दिखा सकता।

पूरा उत्तर एक वाक्य में — कवि प्रेम और भलाई के दीपक जलाते रहने को कहते हैं, और उन बिजली के दीपकों को बुझा देने को कहते हैं जो चमक तो रहे हैं पर जिनमें स्नेह नहीं है।

बुझाने की बात क्यों: पहली बार पढ़ने पर यह अजीब लगता है — भला कोई उजाला बुझाने को क्यों कहेगा? पर कवि की बात गहरी है। बिजली के बल्ब में तेल नहीं होता — और हिंदी में तेल का नाम भी ‘स्नेह’ है, प्रेम का भी। इस एक शब्द के दोहरे अर्थ पर पूरी बात टिकी है: जिस प्रगति में प्रेम नहीं, वह प्रगति नहीं। ऐसा उजाला आँखों को चौंधिया देता है, रास्ता नहीं दिखाता — “यों न पथ मिल सकेगा।”
आज से जोड़िए: शहरों में रात को इतनी रोशनी होती है कि तारे तक दिखाई नहीं देते। पर उसी चमकते शहर में कोई अकेला पड़ोसी बीमार पड़ा हो और किसी को पता न चले — तो वह उजाला किस काम का? कवि इसी बात की ओर इशारा कर रहे हैं।
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