कवि ने अँधेरे को कोई एक चीज़ नहीं रहने दिया — उसे बार-बार किसी न किसी वस्तु का रूप देकर दिखाया है। कविता में ये उदाहरण आए हैं —
| अँधेरे के लिए दी गई वस्तु | कविता की पंक्ति | इससे क्या चित्र बनता है |
|---|---|---|
| अमावस की रात (निशा) | “घिरी आ रही है अमावस निशा-सी।” | अँधेरा चारों ओर से घेर लेने वाली काली रात है — और वह भी दिन के समय! |
| सरित यानी नदी | “तिमिर की सरित पार करने तुम्हीं ने” | अँधेरा एक बहती नदी है, जिसे पार करना पड़ता है — इसीलिए नाव चाहिए। |
| शिला यानी चट्टान | “युगों से तुम्हीं ने तिमिर की शिला पर” | अँधेरा कठोर चट्टान है, जिस पर टिककर दीप जलाने पड़ते हैं। |
| तूफ़ान / पवन | “अनगिन तुम्हारे पवन ने बुझाए।” | अँधेरा हवा बनकर आता है और जलते दीप बुझा देता है। |
| बिना स्नेह जलते विद्युत-दिये | “बिना स्नेह विद्युत-दिये जल रहे जो” | जो उजाला प्रेम के बिना है, वह उजाला नहीं — वह भी एक तरह का अँधेरा ही है। |
इनके साथ ‘अँधेरा’ और ‘तिमिर’ शब्द तो सीधे आए ही हैं — “कभी तो धरा का अँधेरा मिटेगा”, “कभी तो तिमिर का किनारा मिलेगा”।