प्र1.
“जलाते चलो ये दिये स्नेह भर-भर / कभी तो धरा का अँधेरा मिटेगा।” इन पंक्तियों को अपने शिक्षक के साथ मिलकर लय सहित गाने या बोलने का प्रयास कीजिए। … (क) इस कविता को एक बार फिर से पढ़िए और अपने-अपने समूह में मिलकर इस कविता की विशेषताओं की सूची बनाइए, जैसे इस कविता की पंक्तियों को 2–4, 2–4 के क्रम में बाँटा गया है आदि।
उत्तर
पहले वह करके देखिए जो पुस्तक कहती है — दोनों पंक्तियाँ ताली देकर बोलिए। आप पाएँगे कि दोनों में लगभग बराबर समय लगता है। यही इस कविता की सबसे बड़ी विशेषता है और बाक़ी विशेषताएँ इसी के आसपास बुनी हुई हैं।
कविता की विशेषताओं की सूची —
| विशेषता | कविता से उदाहरण |
|---|---|
| 1. 2–4 का क्रम — दो पंक्तियों का एक छोटा खंड, फिर चार पंक्तियों का एक बड़ा खंड; यही क्रम अंत तक चलता है (2–4–2–4–2–4–2–4–2)। | “जलाते चलो… मिटेगा।” (2) फिर “भले शक्ति विज्ञान… निशा-सी।” (4) |
| 2. हर पंक्ति में लगभग समान समय — गाने या बोलने में सब पंक्तियाँ एक-सी लगती हैं, इसी से कविता गेय और प्रभावशाली बन जाती है। | पूरी कविता में — ताली देकर परखा जा सकता है। |
| 3. एक-सी तुक (अंत्यानुप्रास) — दो-पंक्ति वाले हर खंड की अंतिम पंक्ति ‘-एगा’ पर समाप्त होती है। | मिटेगा – सकेगा – मिलेगा – मिलेगा – मिलेगा |
| 4. ‘कभी तो’ की पुनरावृत्ति — आशा जगाने वाला यह जोड़ा तीन बार लौटता है। | “कभी तो धरा का…”, “कभी तो तिमिर का…”, “कभी तो निशा को…” |
| 5. उपमा अलंकार — ‘सा/सी/से’ लगाकर तुलना। | पूर्णिमा-सी, निशा-सी, स्वर्ण-सी |
| 6. प्रतीकों का प्रयोग — शब्द अपने सीधे अर्थ से आगे कुछ और कहते हैं। | दीप = भलाई; तिमिर, निशा = दुख और बुराई; सवेरा = अच्छे दिन |
| 7. संबोधन शैली — कवि पूरे समय ‘तुम’ से बात कर रहा है, इसलिए कविता सीधे पाठक से जुड़ जाती है। | “तुम्हीं ने”, “जलाते चलो”, “बुझाओ इन्हें” |
| 8. प्रेरणा देने वाली क्रियाएँ — आदेश-रूप में, इसलिए कविता पढ़कर कुछ करने का मन होता है। | जलाते चलो, बहाते चलो, बुझाओ |
| 9. अनुप्रास — एक ही वर्ण की आवृत्ति से पंक्ति में संगीत आ जाता है। | “चली आ रही और चलती रहेगी”; “जली जो… जल रही और जलती रहेगी” |
| 10. तत्सम और काव्य-शब्दों की छटा — साधारण शब्दों की जगह भारी-भरकम सुंदर शब्द। | तिमिर, सरित, निशा, धरा, ज्योति, स्वर्ण, शिला, साक्षी |
| 11. विरोधी जोड़ों की भरमार — दो उलटी चीज़ें आमने-सामने रखकर बात कही गई है। | दीप × तूफ़ान, अमावस × पूर्णिमा, निशा × सवेरा, जलना × बुझना |
| 12. दो-पंक्ति वाले खंडों का अंत ‘॥’ से — यह चिह्न बताता है कि यहाँ एक भाव पूरा हो गया। | “…यों न पथ मिल सकेगा॥” |
‘समान समय’ का रहस्य क्या है: कविता की हर पंक्ति में मात्राओं की संख्या लगभग बराबर रखी जाती है। मात्रा यानी बोलने में लगने वाला समय — छोटी ध्वनि (जैसे ‘क’) में एक मात्रा, बड़ी ध्वनि (जैसे ‘का’) में दो। जब हर पंक्ति में मात्राएँ बराबर हों, तो सब पंक्तियाँ एक ही ताल पर गाई जा सकती हैं। इसी कारण यह कविता याद भी जल्दी हो जाती है।