मल्हार अध्याय 7 अमावस्या और पूर्णिमा

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
(क) “भले शक्ति विज्ञान में है निहित वह / कि जिससे अमावस बने पूर्णिमा-सी” — आप अमावस्या और पूर्णिमा के बारे में पहले ही पढ़ चुके हैं। क्या आप जानते हैं कि अमावस्या और पूर्णिमा के होने का क्या कारण है?
उत्तर

इसका कारण तीन बातों में छिपा है, और तीनों पुस्तक ने स्वयं बता दी हैं —

  1. चंद्रमा का अपना प्रकाश नहीं होता। वह सूर्य के प्रकाश से ही चमकता है।
  2. चंद्रमा पृथ्वी की परिक्रमा करता है और पृथ्वी सूर्य की।
  3. इसलिए सूर्य, पृथ्वी और चंद्रमा की आपसी स्थिति रोज़ बदलती रहती है — और हमें चंद्रमा का उतना ही भाग दिखता है जितना सूर्य की ओर होकर हमारी तरफ़ पड़ता है।
तिथितीनों की स्थितिहमें क्या दिखता है
अमावस्याचंद्रमा सूर्य और पृथ्वी के बीच में आ जाता हैचंद्रमा का प्रकाशित भाग सूर्य की ओर होता है और पृथ्वी की ओर वाला भाग अँधेरे में रहता है — इसलिए चाँद दिखाई ही नहीं देता।
पूर्णिमापृथ्वी सूर्य और चंद्रमा के बीच में होती हैचंद्रमा का पूरा प्रकाशित भाग हमारे सामने होता है — इसलिए चाँद पूरा गोल दिखाई देता है।

पक्ष क्या हैं — चंद्रमा एक ही दिन में पूरा नहीं हो जाता; उसकी कलाएँ धीरे-धीरे घटती-बढ़ती हैं। इसी से महीने के दो भाग बनते हैं —

पक्षक्या होता हैनाम का अर्थकब से कब तक
शुक्ल पक्षचंद्रमा की कलाएँ बढ़ती हैं‘शुक्ल’ का एक अर्थ है ‘उजला’अमावस्या के बाद से पूर्णिमा तक
कृष्ण पक्षचंद्रमा की कलाएँ घटती हैं‘कृष्ण’ का एक अर्थ है ‘काला’पूर्णिमा के बाद से अमावस्या तक
कविता से जोड़िए: कवि कहते हैं कि विज्ञान में वह शक्ति है “जिससे अमावस बने पूर्णिमा-सी” — यानी विज्ञान घोर अँधेरे को पूरे उजाले में बदल सकता है। पर आगे वे यह भी पूछते हैं कि फिर दुनिया पर दिन में ही अमावस जैसी रात क्यों घिर रही है। यानी बात चाँद की नहीं, मनुष्य के मन की है — और मन का अँधेरा बिजली से नहीं, स्नेह से मिटता है।
प्र2.
(ख) अब नीचे दिए गए चित्र में अमावस्या, पूर्णिमा, कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष को पहचानिए और ये नाम उपयुक्त स्थानों पर लिखिए— (यदि पहचानने में कठिनाई हो तो आप अपने शिक्षक, परिजनों या इंटरनेट की सहायता भी ले सकते हैं।)
उत्तर

पुस्तक के चित्र में चंद्रमा के 28 चित्र हैं — सात-सात के चार क्रम (पंक्तियाँ)। इन्हें बाएँ से दाएँ, ऊपर से नीचे उसी क्रम में पढ़ना है जैसे पुस्तक पढ़ते हैं।

चित्र में स्थानवहाँ चाँद कैसा दिखता हैवहाँ क्या लिखिए
सबसे पहला चित्र (पहली पंक्ति, बाएँ कोने में)पूरी तरह काला — चाँद दिखता ही नहींअमावस्या
पहली और दूसरी पंक्ति के चित्र (जहाँ उजाला दाईं ओर से बढ़ रहा है)पतली-सी रेखा से बढ़ते-बढ़ते आधा और फिर लगभग पूराशुक्ल पक्ष
तीसरी पंक्ति के शुरू के चित्रचाँद पूरा गोल और सबसे चमकीलापूर्णिमा
तीसरी पंक्ति के अंत से चौथी पंक्ति तक (जहाँ उजाला बाईं ओर रह जाता है)पूरे से घटकर आधा, फिर पतली रेखाकृष्ण पक्ष
सबसे अंतिम चित्र (चौथी पंक्ति, दाएँ कोने में)फिर से पूरी तरह कालाअमावस्या

पहचानने का सबसे आसान नियम —

यदि चाँद का उजला भाग…तो वहक्योंकि
दाईं ओर है और बढ़ रहा हैशुक्ल पक्षअमावस्या के बाद चाँद दाईं ओर से भरना शुरू होता है
बाईं ओर बचा है और घट रहा हैकृष्ण पक्षपूर्णिमा के बाद चाँद दाईं ओर से घटना शुरू होता है
पूरा गोल हैपूर्णिमापूरा प्रकाशित भाग हमारे सामने है
बिल्कुल नहीं हैअमावस्याप्रकाशित भाग दूसरी ओर है
ऊपर वाले गोल चित्र से मिलाइए: उसी पृष्ठ पर एक गोल चक्र भी बना है जिसमें ऊपर पूर्णिमा, नीचे अमावस्या, दाईं ओर कृष्णपक्ष और बाईं ओर शुक्लपक्ष लिखा है। वही क्रम इस 28 चित्रों वाले चित्र में सीधी पंक्तियों में खुल गया है — गोल घूमने के बजाय बाएँ से दाएँ चलता हुआ। दोनों चित्र एक ही बात कह रहे हैं।
यह देखकर ख़ुद जाँचिए: आज रात चाँद देखिए और नोट कीजिए कि उजाला किस ओर है। फिर तिथिपत्र में देखिए कि आज कृष्ण पक्ष है या शुक्ल। यदि दोनों बातें मिल गईं, तो समझिए आपने आकाश पढ़ना सीख लिया। यही काम हमारे यहाँ हज़ारों साल से तिथि गिनने के लिए होता आया है।
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