प्र1.
(क) “भले शक्ति विज्ञान में है निहित वह / कि जिससे अमावस बने पूर्णिमा-सी” — आप अमावस्या और पूर्णिमा के बारे में पहले ही पढ़ चुके हैं। क्या आप जानते हैं कि अमावस्या और पूर्णिमा के होने का क्या कारण है?
उत्तर
इसका कारण तीन बातों में छिपा है, और तीनों पुस्तक ने स्वयं बता दी हैं —
- चंद्रमा का अपना प्रकाश नहीं होता। वह सूर्य के प्रकाश से ही चमकता है।
- चंद्रमा पृथ्वी की परिक्रमा करता है और पृथ्वी सूर्य की।
- इसलिए सूर्य, पृथ्वी और चंद्रमा की आपसी स्थिति रोज़ बदलती रहती है — और हमें चंद्रमा का उतना ही भाग दिखता है जितना सूर्य की ओर होकर हमारी तरफ़ पड़ता है।
| तिथि | तीनों की स्थिति | हमें क्या दिखता है |
|---|---|---|
| अमावस्या | चंद्रमा सूर्य और पृथ्वी के बीच में आ जाता है | चंद्रमा का प्रकाशित भाग सूर्य की ओर होता है और पृथ्वी की ओर वाला भाग अँधेरे में रहता है — इसलिए चाँद दिखाई ही नहीं देता। |
| पूर्णिमा | पृथ्वी सूर्य और चंद्रमा के बीच में होती है | चंद्रमा का पूरा प्रकाशित भाग हमारे सामने होता है — इसलिए चाँद पूरा गोल दिखाई देता है। |
पक्ष क्या हैं — चंद्रमा एक ही दिन में पूरा नहीं हो जाता; उसकी कलाएँ धीरे-धीरे घटती-बढ़ती हैं। इसी से महीने के दो भाग बनते हैं —
| पक्ष | क्या होता है | नाम का अर्थ | कब से कब तक |
|---|---|---|---|
| शुक्ल पक्ष | चंद्रमा की कलाएँ बढ़ती हैं | ‘शुक्ल’ का एक अर्थ है ‘उजला’ | अमावस्या के बाद से पूर्णिमा तक |
| कृष्ण पक्ष | चंद्रमा की कलाएँ घटती हैं | ‘कृष्ण’ का एक अर्थ है ‘काला’ | पूर्णिमा के बाद से अमावस्या तक |
कविता से जोड़िए: कवि कहते हैं कि विज्ञान में वह शक्ति है “जिससे अमावस बने पूर्णिमा-सी” — यानी विज्ञान घोर अँधेरे को पूरे उजाले में बदल सकता है। पर आगे वे यह भी पूछते हैं कि फिर दुनिया पर दिन में ही अमावस जैसी रात क्यों घिर रही है। यानी बात चाँद की नहीं, मनुष्य के मन की है — और मन का अँधेरा बिजली से नहीं, स्नेह से मिटता है।