प्र1.
(क) “रहेगा धरा पर दिया एक भी यदि / कभी तो निशा को सवेरा मिलेगा” — यदि हर व्यक्ति अपना कर्तव्य समझ ले और दूसरों की भलाई के लिए कार्य करे तो पूरी दुनिया सुंदर बन जाएगी। आप भी दूसरों के लिए प्रतिदिन बहुत-से अच्छे कार्य करते होंगे। अपने उन कार्यों के बारे में बताइए।
उत्तर
यह आपके अपने जीवन का प्रश्न है, इसलिए उत्तर भी आपका अपना होगा। पर अच्छा उत्तर लिखने का तरीक़ा यह है —
क्या-क्या शामिल कीजिए —
- छोटे और सच्चे काम लिखिए, बड़े-बड़े दावे नहीं। पानी पिलाना, रास्ता बताना, किसी की गिरी चीज़ उठाकर देना — ये सब ‘दिये’ हैं।
- तीन जगहों से उदाहरण लीजिए — घर, विद्यालय, मुहल्ला/रास्ता। इससे उत्तर पूरा लगता है।
- हर काम के साथ एक पंक्ति में लिखिए कि उससे किसे क्या फ़ायदा हुआ — यही उत्तर की जान है।
- अंत में कविता से जोड़ दीजिए — बताइए कि यही आपका ‘दिया’ है।
| कहाँ | ऐसे काम जो सचमुच किए जा सकते हैं |
|---|---|
| घर में | माँ के साथ काम में हाथ बँटाना, छोटे भाई-बहन को पढ़ाना, दादा-दादी को अख़बार पढ़कर सुनाना, बीमार के पास बैठना |
| विद्यालय में | जिस साथी की कॉपी छूट गई हो उसे अपनी कॉपी दिखाना, नए विद्यार्थी से बात करना, कक्षा साफ़ रखना, नल बंद करना, बिजली बचाना |
| मुहल्ले/रास्ते में | पक्षियों के लिए पानी रखना, पौधे में पानी डालना, बुज़ुर्ग को सड़क पार कराना, कूड़ा कूड़ेदान में डालना, किसी को रास्ता बताना |
नमूना उत्तर:
“मैं कोई बहुत बड़ा काम तो नहीं करता, पर कुछ छोटे काम रोज़ करता हूँ। सुबह उठकर छत पर रखे मिट्टी के कटोरे में पक्षियों के लिए पानी भर देता हूँ — गर्मियों में गौरैया और कबूतर दिन भर वहीं आते रहते हैं। स्कूल में मेरे साथ बैठने वाले साथी की आँखें कमज़ोर हैं, इसलिए मैं श्यामपट्ट पर लिखी बातें धीरे-धीरे बोलकर उसे लिखवा देता हूँ; अब उसकी कॉपी कभी अधूरी नहीं रहती। घर लौटते समय मैं दादी को अख़बार की मुख्य ख़बरें पढ़कर सुनाता हूँ, क्योंकि उन्हें छोटे अक्षर दिखाई नहीं देते — उस समय उनका चेहरा खिल उठता है। और छुट्टी के दिन मैं छोटी बहन को गिनती और पहाड़े याद कराता हूँ।
मुझे लगता है ये सब बहुत छोटे-छोटे दिये हैं। पर कविता में भी तो यही कहा गया है — ‘रहेगा धरा पर दिया एक भी यदि, कभी तो निशा को सवेरा मिलेगा।’ इसलिए मैं इन्हें जलाए रखना चाहता हूँ।”
“मैं कोई बहुत बड़ा काम तो नहीं करता, पर कुछ छोटे काम रोज़ करता हूँ। सुबह उठकर छत पर रखे मिट्टी के कटोरे में पक्षियों के लिए पानी भर देता हूँ — गर्मियों में गौरैया और कबूतर दिन भर वहीं आते रहते हैं। स्कूल में मेरे साथ बैठने वाले साथी की आँखें कमज़ोर हैं, इसलिए मैं श्यामपट्ट पर लिखी बातें धीरे-धीरे बोलकर उसे लिखवा देता हूँ; अब उसकी कॉपी कभी अधूरी नहीं रहती। घर लौटते समय मैं दादी को अख़बार की मुख्य ख़बरें पढ़कर सुनाता हूँ, क्योंकि उन्हें छोटे अक्षर दिखाई नहीं देते — उस समय उनका चेहरा खिल उठता है। और छुट्टी के दिन मैं छोटी बहन को गिनती और पहाड़े याद कराता हूँ।
मुझे लगता है ये सब बहुत छोटे-छोटे दिये हैं। पर कविता में भी तो यही कहा गया है — ‘रहेगा धरा पर दिया एक भी यदि, कभी तो निशा को सवेरा मिलेगा।’ इसलिए मैं इन्हें जलाए रखना चाहता हूँ।”
छोटे काम ही क्यों लिखने चाहिए: कवि ने भी बड़े-बड़े काम नहीं कहे — उन्होंने कहा ‘दिया एक भी’। एक दिये की रोशनी कितनी-सी होती है! पर कविता की पूरी आशा उसी एक दिये पर टिकी है। इसी तरह आपका उत्तर भी छोटे, सच्चे कामों से ही सुंदर बनेगा।