मल्हार अध्याय 8 आज की पहेली

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
1. असमिया पहेली — “हातीर दाँत, कदमर पात”। हिंदी पहेली — “हाथी के दाँत-सी, कदंब के पात-सी।” (संकेत के लिए दिया गया चित्र देखिए।)
उत्तर

उत्तर — मूली। पुस्तक में इसी पहेली के सामने संकेत के रूप में सफ़ेद मूली का चित्र बना है, जिसके ऊपर हरे पत्ते लगे हैं।

पहेली की पंक्तियह किस हिस्से की बात हैमेल कैसे बैठा
“हाथी के दाँत-सी”मूली की जड़ (जो हम खाते हैं)हाथी का दाँत लंबा, मोटा, सफ़ेद और थोड़ा मुड़ा हुआ होता है — बिलकुल मूली जैसा।
“कदंब के पात-सी”मूली के हरे पत्तेकदंब के पत्ते चौड़े और गहरे हरे होते हैं — मूली के ऊपर लगे पत्तों जैसे।
यह पहेली किस तरह की है: यह उपमा वाली पहेली है। इसमें वस्तु का नाम नहीं लिया जाता, बस दो तुलनाएँ दे दी जाती हैं — एक उसके नीचे वाले हिस्से की, एक ऊपर वाले हिस्से की। दोनों तुलनाएँ जोड़ते ही पूरी वस्तु आँखों के सामने खड़ी हो जाती है। ऐसी पहेलियाँ भारत की लगभग हर भाषा में मिलती हैं।
भाषा की बात: असमिया ‘हातीर दाँत’ का हिंदी में सीधा-सीधा अर्थ है ‘हाथी के दाँत’ और ‘कदमर पात’ का ‘कदंब के पत्ते’। यानी असमिया और हिंदी के शब्द बहुत मिलते-जुलते हैं, क्योंकि दोनों का मूल संस्कृत है। यही बात एंजेला को अनु से असमिया सीखते समय भी पता चली होगी।
प्र2.
2. असमिया पहेली — “पानी आसे मास नाइ, हाबि आसे बाघ नाइ”। हिंदी पहेली — “पानी है पर मछली नहीं, जंगल है पर बाघ नहीं” (संकेत के लिए दिया गया चित्र देखिए।)
उत्तर

उत्तर — नारियल। पुस्तक में संकेत के रूप में भूरे रेशों वाले नारियल का चित्र दिया गया है।

पहेली की पंक्तिनारियल में क्या हैमेल कैसे बैठा
“पानी है पर मछली नहीं”नारियल के भीतर भरा हुआ पानीपानी तो है, पर वह तालाब या नदी का पानी नहीं — इसलिए उसमें कोई मछली नहीं रहती।
“जंगल है पर बाघ नहीं”नारियल के ऊपर उगे घने भूरे रेशे (जटा)वे रेशे देखने में घने जंगल जैसे लगते हैं, पर उस ‘जंगल’ में कोई जानवर नहीं रहता।
यह पहेली इतनी अच्छी क्यों है: इसमें दो बार विरोधाभास रचा गया है — पहले कोई चीज़ बताई जाती है (पानी, जंगल) और तुरंत उससे जुड़ी अपेक्षित चीज़ छीन ली जाती है (मछली, बाघ)। यही उलटफेर सोचने पर मजबूर करता है। जैसे ही आप सोचना छोड़कर ऐसी चीज़ ढूँढ़ते हैं जिसमें ‘पानी और जंगल दोनों हों पर जीव कोई न हो’, उत्तर तुरंत मिल जाता है।
पाठ से जोड़िए: इसी नारियल की जटा से बने घर अनु के खिलौनों में थे — “गुड़िया, लकड़ी के खिलौने और नारियल की जटा से बने घर।” यानी असम में नारियल घर-घर की चीज़ है, इसीलिए वहाँ की पहेली में भी वही आ गया। पहेलियाँ हमें बताती हैं कि किसी जगह के लोग किन चीज़ों के बीच रहते हैं।
प्र3.
3. असमिया पहेली — “आई बुलिले नेलागे, बोपाइ बुलिले लागे”। हिंदी पहेली — “लग-लग कहे तो ना लगे, बेलग कहे लग जाए” (संकेत के लिए दिया गया चित्र देखिए।)
उत्तर

उत्तर — होंठ। पुस्तक में संकेत के रूप में होंठों का चित्र दिया गया है।

यह पहेली सबसे मज़ेदार है, क्योंकि इसका उत्तर बोलकर ही मिलता है। इसे हल करने का तरीक़ा यही है कि पहेली में दिए शब्दों को ज़ोर से बोलिए और आईने में अपने होंठ देखिए।

शब्दबोलने पर होंठों का क्या होता हैक्यों
“लग-लग”होंठ नहीं मिलते — यानी नहीं लगते‘ल’ और ‘ग’ जीभ से बनने वाली ध्वनियाँ हैं। इन्हें बोलने में होंठों का काम ही नहीं पड़ता।
“बेलग”होंठ मिल जाते हैं — यानी लग जाते हैं‘ब’ बोलने के लिए दोनों होंठ आपस में जुड़ते हैं। ‘ब’, ‘भ’, ‘प’, ‘फ़’, ‘म’ — ये सब होंठों से बनते हैं।

असमिया में यह और भी सुंदर बन जाती है — ‘आई’ का अर्थ है माँ और ‘बोपाइ’ का अर्थ है पिता। यानी पहेली कहती है — “माँ कहो तो होंठ नहीं लगते, पिता कहो तो लग जाते हैं।” ‘आई’ बोलिए — होंठ खुले ही रहते हैं। ‘बोपाइ’ बोलिए — ‘ब’ और ‘प’ दोनों पर होंठ मिलते हैं!

यहाँ एक व्याकरण की बात छिपी है: जो ध्वनियाँ दोनों होंठों को मिलाकर बोली जाती हैं, उन्हें ओष्ठ्य ध्वनियाँ कहते हैं — प, फ, ब, भ, म। हिंदी में भी यह जाँच कीजिए — ‘मामा’ बोलिए, होंठ दो बार मिलेंगे; ‘नाना’ बोलिए, एक बार भी नहीं मिलेंगे। इस छोटी-सी पहेली ने आपको ध्वनि-विज्ञान का एक नियम सिखा दिया।
प्र4.
4. असमिया पहेली — “सय चरण कृष्ण वरण, पेट काटिलेउ नाई मरण”। हिंदी पहेली — “काला तन और छह हैं चरण, पेट कटे पर भी न मरण” (संकेत के लिए दिया गया चित्र देखिए।)
उत्तर

उत्तर — चींटी। पुस्तक में संकेत के रूप में काली चींटी का चित्र दिया गया है।

पहेली की पंक्तिचींटी में यह कैसे मिलता है
“काला तन”आम चींटी का रंग काला होता है।
“छह हैं चरण”चींटी एक कीट (कीड़ा) है और हर कीट के छह पैर होते हैं। यही पहेली का सबसे बड़ा सुराग़ है — मकड़ी के आठ पैर होते हैं, इसलिए वह उत्तर नहीं हो सकती।
“पेट कटे पर भी न मरण”चींटी का शरीर तीन हिस्सों में बँटा होता है और सिर तथा पेट के बीच का हिस्सा इतना पतला होता है कि लगता है मानो उसका पेट कटा हुआ है — फिर भी वह जीवित रहती है और दौड़ती-भागती रहती है।
पहेली सुलझाने का तरीक़ा: ऐसी पहेली में हर पंक्ति एक छननी की तरह काम करती है। ‘काला तन’ से बहुत-से जीव बचे रहते हैं — कौआ, भैंस, भँवरा, चींटी। ‘छह चरण’ लगाते ही कौआ और भैंस निकल जाते हैं, केवल कीट बचते हैं। ‘पेट कटे पर भी न मरण’ लगाते ही चींटी बच जाती है, क्योंकि उसी की कमर इतनी पतली होती है। एक-एक शर्त लगाकर सूची छोटी करते जाइए — उत्तर अपने आप निकल आएगा।
असमिया शब्द देखिए: ‘सय’ = छह, ‘चरण’ = पैर, ‘कृष्ण वरण’ = काला रंग, ‘मरण’ = मृत्यु। इनमें से ‘चरण’, ‘कृष्ण’, ‘वरण’ और ‘मरण’ — चारों शब्द हिंदी में भी ठीक इसी अर्थ में चलते हैं। इसीलिए यह पहेली हिंदी में लगभग ज्यों-की-त्यों उतर आई।
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