पहले देख लीजिए कि लेख में कौन-कौन सी जानकारियाँ दी गई हैं। लेखक बिमल श्रीवास्तव कुछ वर्ष गुवाहाटी हवाई अड्डे पर नियुक्त थे और उन्होंने वहाँ स्त्रियों को एक चमकीली भूरी-सुनहरी साड़ी पहने देखा। पूछने पर उनके असमी मित्र ने बताया कि वह मूँगा सिल्क है।
| क्रम | लेख की जानकारी |
|---|---|
| 1. | मूँगा सिल्क सभी प्रकार के रेशमों में सबसे महँगा होता है। |
| 2. | असमिया भाषा में ‘मूँगा’ का अर्थ है पीला या गहरा भूरा। |
| 3. | यह संपूर्ण विश्व में केवल असम और पूर्वोत्तर राज्यों में ही तैयार होता है — “यह असम को प्रकृति द्वारा दिया गया अनमोल और अद्वितीय उपहार है।” |
| 4. | इसकी साड़ियों को ‘ड्राई क्लीन’ कराने की ज़रूरत नहीं — इन्हें घर पर ही धोया जा सकता है। |
| 5. | हर धुलाई के बाद इनका निखार बढ़ता ही जाता है। |
| 6. | एक साड़ी औसतन 50 वर्ष तक ख़राब नहीं होती। |
| 7. | यह प्राकृतिक रूप से तैयार होने वाले सभी कपड़ों में सबसे मज़बूत माना जाता है। |
| 8. | इसे गर्मी और सर्दी — दोनों मौसमों में पहना जा सकता है। |
| 9. | असम के लोगों का मानना है कि इसमें अनेक औषधीय गुण भी होते हैं। |
| 10. | पारंपरिक साड़ी पर लाल या काली बॉर्डर और हरे, लाल या पीले रंग से बूटों की कढ़ाई होती है; पुरुष भी इसी रंग के कुर्ते पहनते हैं। |
नमूना उत्तर:
“मुझे इस लेख की यह जानकारी सबसे अच्छी लगी कि मूँगा सिल्क की एक साड़ी औसतन 50 वर्ष तक ख़राब नहीं होती और हर धुलाई के बाद उसका निखार बढ़ता ही जाता है।
यह बात मुझे इसलिए सबसे अच्छी लगी क्योंकि यह आजकल की सोच से बिलकुल उलटी है। आज ज़्यादातर चीज़ें कुछ महीनों में पुरानी लगने लगती हैं और हम नई ख़रीद लेते हैं। पर यह कपड़ा जितना पुराना होता है, उतना ही सुंदर होता जाता है। इसका मतलब है कि एक ही साड़ी दादी से माँ तक और माँ से बेटी तक पहुँच सकती है — कपड़ा ही नहीं, यादें भी साथ चली आती हैं। दूसरी बात जो मुझे इससे जुड़ी अच्छी लगी, वह यह कि इसे ड्राई क्लीन नहीं कराना पड़ता, घर पर ही धोया जा सकता है। यानी यह कपड़ा महँगा ज़रूर है, पर उसे सँभालना महँगा नहीं है। मुझे लगता है कि ऐसी चीज़ें बनाना ही सच्ची कारीगरी है — जो टिके भी और पर्यावरण को नुक़सान भी न पहुँचाए।”