सही उत्तर है — मेरे छोटे-छोटे हाथ छीके तक कैसे जा सकते हैं? इसी विकल्प के सामने तारा (★) बनाइए।
ध्यान दीजिए, प्रश्न पूछा गया है — “मैं माखन कैसे खा सकता हूँ?” यानी उत्तर वही होगा जो माखन तक पहुँचने की बात करे। पद में कृष्ण ठीक यही कहते हैं —
अर्थ — मैं तो छोटा-सा बालक हूँ, मेरी बाँहें छोटी हैं; इतने ऊँचे टँगे छींके तक मेरा हाथ भला किस तरह पहुँचता?
| विकल्प | सही / ग़लत | कारण |
|---|---|---|
| मेरे छोटे-छोटे हाथ छीके तक कैसे जा सकते हैं? | सही ★ | यही एकमात्र तर्क है जो बताता है कि माखन तक पहुँचना संभव ही नहीं था। ‘कैसे खा सकता हूँ’ का सीधा उत्तर यही है। |
| मुझे तुम पराया समझती हो। | ग़लत | यह उलाहना है, तर्क नहीं। यह बात कृष्ण बाद में कहते हैं — “जिय तेरे कछु भेद उपजि हैं, जानि परायो जायो।” इससे माखन न खाना सिद्ध नहीं होता। |
| मेरी माता, तुम बहुत भोली हो। | ग़लत | यह माँ पर टिप्पणी है — कि तुम दूसरों की बातों में आ जाती हो। यह ग्वाल-बालों को दोष देता है, कृष्ण के हाथ की पहुँच को नहीं। |
| मुझे यह लाठी-कंबल नहीं चाहिए। | ग़लत | यह तो पद के अंत का रूठना है — “ये ले अपनी लकुटि कमरिया, बहुतहिं नाच नचायो।” यह तर्क नहीं, नाराज़गी है। |