कक्षा ६ हिंदी अध्याय 9 मैया मैं नहिं माखन खायो के लिए एनसीईआरटी समाधान
अद्यतन 2026-09-19
इस अध्याय के बारे में
रचना का नाम ‘मैया मैं नहिं माखन खायो’ है और रचयिता हैं महाकवि सूरदास । यह कोई कहानी नहीं, एक पद है — गाया जाने वाला छोटा गीत। भाषा ब्रजभाषा है, इसलिए ‘पीछे’ यहाँ ‘पाछे’ और ‘भोली’ यहाँ ‘भोरी’ बन गया है। कवि से परिचय — पुस्तक बताती है कि सूरदास का जन्म 15वीं शताब्दी में हुआ माना जाता है और मृत्यु 16वीं शताब्दी में हुई। उन्होंने अपना अधिकांश जीवन मथुरा, गोवर्धन सहित ब्रज के क्षेत्रों में श्रीकृष्ण के गुणगान में भजन गाते हुए बिताया। उनकी अधिकतर कविताओं में श्रीकृष्ण की बाल-लीलाओं का मनोहारी वर्णन है। वे दृष्टिबाधित थे, फिर भी उनकी कल्पना-शक्ति ऐसी थी कि दृश्य आँखों के सामने खड़ा हो जाता है। पद में हो क्या रहा है — ग्वाल-बालों ने यशोदा से शिकायत कर दी कि कान्हा ने माखन चुराकर खाया। कृष्ण सफ़ाई देते हैं — सुबह होते ही तो मुझे गायों के पीछे मधुबन भेज दिया गया, चार पहर मैं बंसीवट पर भटकता रहा और स
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| पद का शब्द | अर्थ | पद की पंक्ति | अपना एक वाक्य |
|---|---|---|---|
| मैया | माँ (ब्रजभाषा का प्यारा संबोधन) | “मैया मैं नहिं माखन खायो।” | मैया, आज मुझे अपने हाथ की खिचड़ी खिला दो। |
| माखन | मक्खन | “मैया मैं नहिं माखन खायो।” | ताज़ी रोटी पर माखन लगाकर खाने में बड़ा मज़ा आता है। |
| भोर | सुबह, प्रातःकाल | “भोर भयो गैयन के पाछे…” | भोर होते ही चिड़ियाँ चहचहाने लगीं। |
| गैयन | गायों (के) | “भोर भयो गैयन के पाछे…” | गाँव में गैयन के गले की घंटियाँ दूर तक सुनाई देती हैं। |
| पाछे | पीछे | “भोर भयो गैयन के पाछे…” | मैं अपने बड़े भाई के पाछे-पाछे मेले तक गया। |
| मधुबन | मथुरा के पास यमुना के किनारे का एक वन | “…मधुबन मोहि पठायो।” | मधुबन की छाया में गायें दिन भर चरती रहती हैं। |
| पठायो | भेज दिया | “…मधुबन मोहि पठायो।” | दादी ने मुझे दुकान से सौदा लाने पठायो (भेजा)। |
| पहर | समय मापने की एक इकाई — तीन घंटे का एक पहर, दिन-रात में आठ पहर | “चार पहर बंसीवट भटक्यो…” | दो पहर बीत जाने पर सूरज ठीक सिर पर आ जाता है। |
| बंसीवट | एक वट (बरगद) वृक्ष, जिस पर चढ़कर कृष्ण बंसी बजाकर गायों को बुलाते थे | “चार पहर बंसीवट भटक्यो…” | बंसीवट की कहानी हमें दादाजी ने सुनाई थी। |
| बहियन | बाँहें, भुजाएँ | “मैं बालक बहियन को छोटो…” | छोटे बच्चे की बहियन इतनी छोटी होती हैं कि वह मेज़ तक नहीं पहुँचता। |
| छीको | छींका — रस्सियों का बुना गोल जाल, जो छत से लटकाकर उसमें दूध-दही रखा जाता है | “…छीको केहि बिधि पायो।” | माँ ने दही की मटकी छींके पर टाँग दी। |
| केहि बिधि | किस प्रकार, किस तरह | “…छीको केहि बिधि पायो।” | इतना भारी पत्थर तुमने केहि बिधि (किस तरह) उठाया? |
| ग्वाल-बाल | गाय पालने वालों के बच्चे, कृष्ण के संगी-साथी | “ग्वाल-बाल सब बैर परे हैं…” | ग्वाल-बाल दिन भर गायों के साथ जंगल में रहते थे। |
| बरबस | ज़बरदस्ती, बिना मरज़ी के | “…बरबस मुख लपटायो।” | दोस्तों ने बरबस मुझे मंच पर गाने के लिए खड़ा कर दिया। |
| भोरी | भोली, सीधी-सादी | “तू माता मन की अति भोरी…” | मेरी छोटी बहन इतनी भोरी है कि हर बात पर विश्वास कर लेती है। |
| पतियायो | विश्वास कर लिया, सच मान लिया | “…इनके कहे पतियायो।” | उसने बिना जाँचे ही अफ़वाह पर पतियायो (विश्वास कर लिया)। |
| जिय | मन, जी, हृदय | “जिय तेरे कछु भेद उपजि हैं…” | उसके जिय में अब भी कोई बात खटक रही है। |
| परायो जायो | पराया जन्मा हुआ, किसी और का बेटा | “…जानि परायो जायो।” | अपने ही घर में किसी को परायो समझना ठीक नहीं। |
| लकुटि कमरिया | लाठी और छोटा कंबल (कमली), जिन्हें लेकर कृष्ण गाय चराने जाते थे | “ये ले अपनी लकुटि कमरिया…” | चरवाहा लकुटि कमरिया लेकर सुबह ही निकल जाता है। |
| बिहँसि | मुसकाकर, हँसकर | “सूरदास तब बिहँसि जसोदा…” | माँ बिहँसि पड़ीं और मेरा सारा गुस्सा उड़ गया। |
| उर कंठ लगायो | छाती और गले से लगा लिया | “…लै उर कंठ लगायो।” | वर्षों बाद मिले पिता ने बेटे को उर कंठ लगा लिया। |
अभ्यास
- मेरी समझ से
- मिलकर करें मिलान
- पंक्तियों पर चर्चा
- सोच-विचार के लिए
- कविता की रचना
- अनुमान या कल्पना से
- शब्दों के रूप
- वर्ण-परिवर्तन
- पंक्ति से पंक्ति
- आपकी बात
- घर की वस्तुएँ
- समय का माप
- हम सब विशेष हैं
- आज की पहेली
- खोजबीन के लिए