पुस्तक ने आपको पहले ही एक विशेषता — तुक — समझा दी है और एक उदाहरण — कवि का नाम अंतिम पंक्ति में — दे दिया है। इसी तरह पद को दोबारा पढ़कर बाक़ी विशेषताएँ ढूँढ़नी हैं। नीचे पूरी सूची प्रमाण सहित दी गई है।
| विशेषता | पद से प्रमाण |
|---|---|
| 1. हर पंक्ति के अंत में तुक | खायो – पठायो – आयो – पायो – लपटायो – पतियायो – जायो – नचायो – लगायो। पूरे पद में एक ही तुक चलता है, इसलिए इसे गाना बहुत आसान है। |
| 2. अंतिम पंक्ति में कवि का नाम | “सूरदास तब बिहँसि जसोदा…” — इसे भणिता या ‘छाप’ कहते हैं। इससे पता चल जाता है कि पद किसका है। |
| 3. पूरा पद कृष्ण के अपने मुँह से | “मैया मैं नहिं माखन खायो” — कवि बीच में नहीं बोलता; केवल अंतिम पंक्ति में आकर दृश्य पूरा करता है। इसे आत्मकथात्मक शैली कहते हैं। |
| 4. ब्रजभाषा | पाछे (पीछे), भोरी (भोली), कछु (कुछ), लै (ले), नहिं (नहीं), मोहि (मुझे) — यह ब्रज क्षेत्र की मीठी बोली है। |
| 5. संवाद जैसा प्रवाह | पद पढ़ते ही ऐसा लगता है जैसे माँ-बेटे की सचमुच बातचीत सुनाई दे रही हो। यह नाटकीयता पद की बड़ी शक्ति है। |
| 6. अनुप्रास (एक ही ध्वनि की आवृत्ति) | “भोर भयो”, “बंसीवट भटक्यो”, “बैर परे… बरबस”, “ग्वाल-बाल… गैयन” — इससे पद में लय आ जाती है। |
| 7. वात्सल्य रस | पूरे पद का भाव माँ का बेटे के प्रति प्रेम है — अंत में “लै उर कंठ लगायो” पर आकर यह भाव पूरा खिलता है। |
| 8. दो-दो पंक्तियों के जोड़े | पद में हर दो पंक्तियों के बाद पूर्ण विराम (॥) आता है — एक-एक जोड़ा एक-एक तर्क पूरा करता है। |
| 9. बाल-सुलभ चतुराई | “मैं बालक बहियन को छोटो” — कृष्ण अपने छोटेपन को ही अपना सबसे बड़ा हथियार बना लेते हैं। |