प्र1.
सूरदास द्वारा रचित कुछ अन्य रचनाएँ खोजें व पढ़ें।
उत्तर
यह खोजबीन की गतिविधि है। सूरदास के हज़ारों पद उपलब्ध हैं, इसलिए शुरुआत के लिए नीचे कुछ चुने हुए, कक्षा 6 के लायक़ पद और ग्रंथ दिए गए हैं।
1. सूरदास के प्रमुख ग्रंथ —
| ग्रंथ | इसमें क्या है |
|---|---|
| सूरसागर | सूरदास की सबसे प्रसिद्ध रचना। इसी में कृष्ण की बाल-लीलाओं के वे सारे पद हैं जिनके लिए वे जाने जाते हैं — यह पाठ भी इसी परंपरा का पद है। |
| सूर-सारावली | एक लंबा पद-ग्रंथ, जिसमें सृष्टि और लीलाओं का वर्णन है। |
| साहित्य-लहरी | दृष्टकूट पदों का संग्रह — ऐसे पद जिनका अर्थ पहेली की तरह खोलना पड़ता है। |
2. पढ़ने-गाने के लिए कुछ चुने हुए पद —
| पद की पहली पंक्ति | किस बारे में है | इस पाठ से क्या जुड़ता है |
|---|---|---|
| “मैया, मोहि दाऊ बहुत खिझायो” | बलराम (दाऊ) कृष्ण को चिढ़ाते हैं कि तुम यशोदा के बेटे नहीं हो। | यहाँ भी कृष्ण माँ से शिकायत कर रहे हैं — और ‘पराया’ वाला भाव यहाँ भी है। |
| “मैया कबहिं बढ़ैगी चोटी” | नन्हा कृष्ण पूछता है — मेरी चोटी कब बड़ी होगी? | बाल-हठ और बाल-सुलभ जिज्ञासा का सुंदर उदाहरण। |
| “सोभित कर नवनीत लिए” | हाथ में माखन लिए कृष्ण की छवि का वर्णन। | वही माखन — पर इस बार शिकायत नहीं, सौंदर्य का चित्र। |
| “अब लौं नसानी, अब न नसैहौं” | अब तक जो समय गँवाया सो गँवाया, आगे नहीं गँवाऊँगा। | विनय के पद — इनसे सूरदास का दूसरा रूप दिखता है। |
| “खेलन में को काको गुसैयाँ” | खेल में कौन किसका मालिक? — कृष्ण और साथियों की नोक-झोंक। | इसी पाठ के ग्वाल-बाल यहाँ फिर मिलेंगे। |
| “ऊधौ, मोहि ब्रज बिसरत नाहीं” | भ्रमरगीत का पद — गोपियों का विरह। | थोड़ा कठिन है, पर सूरदास की दूसरी बड़ी उपलब्धि यही ‘भ्रमरगीत’ है। |
3. खोजबीन कैसे कीजिए —
- विद्यालय के पुस्तकालय में ‘सूरसागर’ या ‘सूर के पद’ नाम की पुस्तक माँगिए। बाल-संस्करण सबसे आसान होते हैं।
- घर के बड़ों से पूछिए — कई लोगों को सूरदास के भजन ज़बानी याद होते हैं। दादी-नानी से एक पद सुनकर लिख लीजिए।
- बड़ों की देखरेख में भारतवाणी, ई-पाठशाला या हिंदी समय जैसी विश्वसनीय वेबसाइटों पर पद ढूँढ़िए। जहाँ भी पद मिले, पहले उसका अर्थ देखिए, फिर पंक्तियाँ पढ़िए।
- जो पद अच्छा लगे, उसे अपनी लेखन-पुस्तिका में उतार लीजिए और नीचे उसका भाव दो-तीन वाक्यों में लिखिए।
4. कक्षा में क्या कीजिए — एक ‘सूर-संध्या’ कीजिए। हर विद्यार्थी एक पद चुने, उसे गाकर सुनाए और फिर एक वाक्य में बताए कि पद में क्या हो रहा है। अंत में सब मिलकर देखिए — सूरदास के पदों में सबसे ज़्यादा कौन-सी चीज़ आती है? (उत्तर प्रायः यही निकलेगा — माखन, गाय, माँ और बंसी!)
यह खोजबीन क्यों ज़रूरी है: एक पद पढ़कर किसी कवि को नहीं जाना जा सकता। जब आप सूरदास के चार-पाँच पद पढ़ेंगे, तब आपको उनकी अपनी पहचान दिखने लगेगी — हर पद में तुक, हर पद के अंत में उनका नाम, और हर पद में एक छोटा-सा दृश्य जो आँखों के सामने खड़ा हो जाता है। यही किसी कवि को ‘पहचानना’ कहलाता है।
Tip: ब्रजभाषा के पद पढ़ते समय ज़ोर से पढ़िए। ये पद आँखों के लिए नहीं, कानों के लिए बने थे — सूरदास ख़ुद इन्हें गाकर सुनाते थे।