मल्हार अध्याय 9 हम सब विशेष हैं

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
(क) महाकवि सूरदास दृष्टिबाधित थे। उनकी विशेष क्षमता थी उनकी कल्पना शक्ति और कविता रचने की कुशलता। हम सभी में कुछ न कुछ ऐसा होता है जो हमें सबसे विशेष और सबसे भिन्न बनाता है। नीचे दिए गए व्यक्तियों की विशेष क्षमताएँ क्या हैं, विचार कीजिए और लिखिए— आपकी ____, आपके किसी परिजन की ____, आपके शिक्षक की ____, आपके मित्र की ____
उत्तर

यह आपके अपने अवलोकन का प्रश्न है, इसलिए हर विद्यार्थी का उत्तर अलग होगा। पर उत्तर लिखने से पहले यह समझ लीजिए कि ‘विशेष क्षमता’ का अर्थ क्या है

विशेष क्षमता का मतलब केवल गाना, नाचना या पढ़ाई में अव्वल आना नहीं है। कोई भी ऐसी बात जो आप औरों से बेहतर या अलग ढंग से कर पाते हैं, वह आपकी विशेष क्षमता है — जैसे किसी की बात ध्यान से सुन लेना, चीज़ें व्यवस्थित रखना, जल्दी हिसाब लगा लेना, या सबको हँसा देना।

किसकीढूँढ़ने का तरीक़ानमूना उत्तर
आपकीसोचिए — कौन-सा काम करते समय समय का पता ही नहीं चलता? किस काम के लिए लोग आपको बुलाते हैं?“मैं जो एक बार सुन लेती हूँ, वह मुझे याद रह जाता है। कक्षा में सबको पिछले दिन का पाठ मैं ही याद दिलाती हूँ।”
आपके किसी परिजन कीघर के किसी सदस्य को दो दिन ध्यान से देखिए — वे कौन-सा काम बिना थके, बिना ग़लती के कर लेते हैं?“मेरी दादी को सैकड़ों लोकगीत और कहावतें ज़बानी याद हैं। वे किसी भी मौक़े पर सही कहावत सुना देती हैं।”
आपके शिक्षक कीदेखिए — वे कठिन बात को आसान कैसे बनाते हैं? क्या वे सबका नाम याद रखते हैं?“हमारे गणित के शिक्षक कठिन सवाल को भी रोज़ की चीज़ों — रोटी, रुपये, क्रिकेट — से जोड़कर समझा देते हैं।”
आपके मित्र कीपूछिए मत, देखिए — मुश्किल घड़ी में आपका मित्र क्या करता है?“मेरा मित्र बहुत अच्छा चित्र बनाता है। किसी का मन उदास हो तो वह उसका चित्र बनाकर उसे हँसा देता है।”
सूरदास से यह क्यों जोड़ा गया है: सूरदास देख नहीं सकते थे, फिर भी उनके पदों में रंग, दृश्य और चेहरे इतने साफ़ हैं कि आँखों के सामने खड़े हो जाते हैं — छींके पर टँगा माखन, माँ का हँसना, गले लगाना। इसका अर्थ यह है कि जो नहीं है उससे बड़ा वह होता है जो है। हर व्यक्ति के पास कुछ न कुछ ऐसा है — उसे ढूँढ़ना और माँजना ही असली काम है।
लिखते समय एक बात का ध्यान: किसी की कमी को क्षमता की जगह मत लिखिए, और तुलना मत कीजिए (“मुझसे अच्छा तो वह है”)। हर पंक्ति में केवल एक अच्छाई, और उसके साथ एक उदाहरण — बस इतना काफ़ी है।
प्र2.
(ख) एक विशेष क्षमता ऐसी भी है जो हम सबके पास होती है। वह क्षमता है सबकी सहायता करना, सबके भले के लिए सोचना। तो बताइए, इस क्षमता का उपयोग करके आप इनकी सहायता कैसे करेंगे— • एक सहपाठी पढ़ना जानता है और उसे एक पाठ समझ में नहीं आ रहा है। • एक सहपाठी को पढ़ना अच्छा लगता है और वह देख नहीं सकता। • एक सहपाठी बहुत जल्दी-जल्दी बोलता है और उसे कक्षा में भाषण देना है। • एक सहपाठी बहुत अटक-अटक कर बोलता है और उसे कक्षा में भाषण देना है। • एक सहपाठी को चलने में कठिनाई है और वह सबके साथ दौड़ना चाहता है। • एक सहपाठी प्रतिदिन विद्यालय आता है और उसे सुनने में कठिनाई है।
उत्तर

छह अलग-अलग स्थितियाँ दी गई हैं। हर स्थिति में सहायता का ढंग अलग होगा। एक बात हर जगह समान है — सहायता का अर्थ काम अपने हाथ में ले लेना नहीं, बल्कि साथी को ख़ुद करने लायक़ बना देना है। दया दिखाना सहायता नहीं है; साथ देना सहायता है।

स्थितिमैं क्या करूँगा / करूँगीक्यों
पढ़ना जानता है, पर पाठ समझ नहीं आ रहाउसके साथ बैठकर पाठ को छोटे-छोटे हिस्सों में पढ़ूँगा और हर हिस्से के बाद पूछूँगा — “इसमें क्या हुआ?” कठिन शब्दों के अर्थ शब्दकोश से मिलकर देखूँगा और पाठ की कहानी को अपने शब्दों में सुनाऊँगा।समझ में कठिनाई प्रायः शब्दों की होती है, पढ़ने की नहीं। शब्द खुलते ही पाठ खुल जाता है।
पढ़ना पसंद है, पर देख नहीं सकताउसे पाठ पढ़कर सुनाऊँगा, और अपनी आवाज़ में रिकॉर्ड करके दूँगा ताकि वह जब चाहे सुन सके। शिक्षक से कहकर ब्रेल पुस्तक या ऑडियो-पुस्तक मँगवाने का अनुरोध करूँगा। चित्रों का वर्णन शब्दों में करूँगा।ठीक सूरदास की तरह — देख न पाना पढ़ने-रचने में बाधा नहीं। रास्ता बदलता है, मंज़िल नहीं।
बहुत जल्दी-जल्दी बोलता है, भाषण देना हैउससे कहूँगा कि भाषण में हर वाक्य के बाद मन में एक-दो गिनें और साँस लें। भाषण की पर्ची पर जहाँ रुकना है वहाँ / का चिह्न लगा दूँगा। दो-तीन बार मेरे सामने अभ्यास कराऊँगा और हाथ के इशारे से धीमे होने का संकेत दूँगा।तेज़ बोलना घबराहट से होता है। ठहराव का अभ्यास होते ही आवाज़ अपने आप सँभल जाती है।
अटक-अटक कर बोलता है, भाषण देना हैकभी बीच में टोकूँगा नहीं, न वाक्य पूरा करूँगा — धैर्य से सुनूँगा। भाषण छोटे-छोटे वाक्यों में लिखवाऊँगा और उसे धीरे, आराम से बोलने को कहूँगा। कक्षा से पहले उसे मेरे सामने अभ्यास का अवसर दूँगा और यह बताऊँगा कि उसकी बात ज़रूरी है, रफ़्तार नहीं।बीच में टोकना और हँसना ही अटकने को बढ़ाता है। धैर्य से सुनना सबसे बड़ी सहायता है।
चलने में कठिनाई है, सबके साथ दौड़ना चाहता हैखेल का नियम ऐसा बनाऊँगा कि वह भी खेल सके — जैसे जोड़ी बनाकर दौड़, या ऐसा खेल जिसमें उसकी टीम में वह पासिंग या निशाना लगाने का काम करे। उसकी व्हीलचेयर या बैसाखी के लिए रास्ता ख़ाली रखूँगा और उसकी टीम में सबसे पहले उसे चुनूँगा।उसे तरस नहीं, खेल में जगह चाहिए। खेल बदला जा सकता है, ताकि कोई बाहर न रह जाए।
रोज़ विद्यालय आता है, सुनने में कठिनाई हैबात करते समय उसके सामने खड़ा होकर, साफ़ और थोड़ा धीरे बोलूँगा ताकि वह होंठ पढ़ सके। कक्षा में सबसे आगे उसके साथ बैठूँगा और शिक्षक की कही बात लिखकर दिखाऊँगा। ज़रूरी सूचनाएँ कॉपी में लिखकर दे दूँगा और कुछ सांकेतिक भाषा सीखने की कोशिश करूँगा।चिल्लाने से बात साफ़ नहीं होती। सामने से, साफ़ बोलना और लिखकर देना कहीं अधिक काम आता है।

नमूना उत्तर (एक स्थिति पर, जैसा आप कॉपी में लिख सकते हैं):

“मेरी कक्षा में एक साथी है जिसे सुनने में कठिनाई है। मैं उससे बात करते समय हमेशा उसके सामने खड़ा होता हूँ और साफ़-साफ़ बोलता हूँ, ताकि वह मेरे होंठ भी पढ़ सके। कक्षा में मैं उसके पास बैठता हूँ और शिक्षक जो बोलते हैं, उसका मुख्य हिस्सा तुरंत अपनी कॉपी में लिखकर उसे दिखा देता हूँ। जब खेल के मैदान में सीटी बजती है, तो मैं हाथ उठाकर उसे संकेत कर देता हूँ। पिछले महीने मैंने उससे कुछ सांकेतिक भाषा भी सीखी — अब हम दोनों बिना बोले भी बात कर लेते हैं।”

सबसे ज़रूरी बात: सहायता करते समय साथी से पूछ लीजिए कि उसे किस तरह की मदद चाहिए। बिना पूछे की गई मदद कई बार अपमान जैसी लगती है। और कभी किसी की कठिनाई पर हँसिए मत — यही इस पूरी गतिविधि का असली सबक़ है।
Did you know? कक्षा को सबके लिए खोल देने के इसी विचार को समावेशी शिक्षा (inclusive education) कहते हैं। सूरदास दृष्टिबाधित थे, पर उनकी कविता आज भी पूरे देश में गाई जाती है — क्योंकि उनके समय में भी लोगों ने उन्हें सुना, गाया और आगे बढ़ाया।
क्या यह उपयोगी रहा? त्रुटि बताएँ