मल्हार अध्याय 9 पंक्तियों पर चर्चा

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
(क) “भोर भयो गैयन के पाछे, मधुबन मोहि पठायो”
उत्तर

शब्दार्थ — भोर = सुबह; भयो = हुई; गैयन के पाछे = गायों के पीछे-पीछे; मोहि = मुझे; पठायो = भेज दिया।

भावार्थ — कृष्ण माँ से कहते हैं — “सुबह होते ही तो तुमने मुझे गायों के पीछे मधुबन भेज दिया था। मैं दिन भर घर पर था ही नहीं, फिर माखन खाने का अवसर मुझे मिला कहाँ?”

पंक्ति का अंशक्या बता रहा हैकृष्ण के बचाव में इसका काम
भोर भयोसमय — दिन की शुरुआतयह सिद्ध करता है कि वे बहुत सवेरे ही घर से निकल गए थे।
गैयन के पाछेकाम — गायें चरानादिन भर उनके पास अपना कोई काम ही नहीं था; वे गायों के पीछे चलते रहे।
मधुबन मोहि पठायोजगह — घर से दूर एक वनमाखन घर के छींके में था और कृष्ण वन में थे — दूरी ही उनका सबसे बड़ा सबूत है।
‘पठायो’ शब्द इतना ज़रूरी क्यों है: कृष्ण ने यह नहीं कहा कि “मैं गया था”, कहा — “मुझे भेजा गया था”। इस एक शब्द से वे अपने जाने की ज़िम्मेदारी भी माँ पर डाल देते हैं — “तुमने ही तो भेजा था!” यही बाल-सुलभ चतुराई पूरे पद की जान है।
अपने शब्दों में कैसे लिखें: ऐसी पंक्ति का अर्थ लिखते समय तीन बातें ज़रूर लिखिए — कब (सुबह), क्या (गाय चराना) और कहाँ (मधुबन)। फिर एक वाक्य जोड़िए कि पंक्ति यह बात क्यों कह रही है।
प्र2.
(ख) “सूरदास तब बिहँसि जसोदा, लै उर कंठ लगायो”
उत्तर

शब्दार्थ — बिहँसि = मुसकाकर, हँसकर; जसोदा = यशोदा; लै = लेकर; उर = छाती, हृदय; कंठ = गला।

भावार्थ — सूरदास कहते हैं कि कृष्ण की यह भोली-भाली, रूठी हुई सफ़ाई सुनकर माँ यशोदा हँस पड़ीं और उन्होंने कृष्ण को उठाकर छाती और गले से लगा लिया। सारा झगड़ा वहीं ख़त्म हो गया।

अंशक्या दिखाता है
सूरदासअंतिम पंक्ति में कवि ने अपना नाम जोड़ा है। यह सूरदास के पदों की पहचान है — इसे भणिता या ‘छाप’ कहते हैं।
बिहँसियशोदा को गुस्सा नहीं, हँसी आई। यानी वे भी जानती थीं कि माखन किसने खाया — पर बेटे की चतुराई ने उनका मन जीत लिया।
उर कंठ लगायोदंड की जगह गले लगाना। यहाँ शिकायत का अंत सज़ा से नहीं, प्यार से होता है।
इस पंक्ति में सबसे सुंदर बात क्या है: पूरा पद एक झगड़े जैसा शुरू होता है — आरोप, सफ़ाई, उलाहना, रूठना। पर अंत में वह झगड़ा वात्सल्य में बदल जाता है। इसीलिए यह पद वात्सल्य रस का माना जाता है — माँ के हृदय का प्रेम ही यहाँ का असली विषय है।
अपने जीवन से जोड़िए: क्या कभी घर में आपकी शरारत पर डाँट पड़ते-पड़ते रह गई और माँ या दादी हँस पड़ीं? उस पल को दो-तीन वाक्यों में लिखिए — यही इस पंक्ति का अनुभव है।
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