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अद्यतन2026-09-05

प्र1.
मानचित्र पृथ्वी के क्षेत्र, चाहे वह छोटा हो या बड़ा, को दर्शाने के लिए एक अत्यधिक उपयोगी साधन है। मानचित्रों के मुख्य घटक दूरी, दिशा और प्रतीक चिह्न हैं।
उत्तर

इस सार का विस्तार —

  • मानचित्र पूरे महाद्वीप को एक पृष्ठ पर समेट सकता है और एक छोटे गाँव को पूरे पृष्ठ पर फैला सकता है। बदलता केवल स्केल है, विचार नहीं।
  • दूरी स्केल से आती है — लघु नगर के मानचित्र में 1 से.मी. = 500 मी., तो चित्र 5.2 में 2.5 से.मी. = 500 कि.मी.।
  • दिशा ‘उ.’ वाले तीर और कम्पास के आठ बिंदुओं से आती है — उ., उ.पू., पू., द.पू., द., द.प., प., उ.प.।
  • प्रतीक चिह्न बहुत कम स्थान में बहुत अधिक सूचना भर देते हैं; भारत में इन्हें भारतीय सर्वेक्षण विभाग निर्धारित करता है।
महत्व: तीनों में से कोई एक भी हटा दीजिए और मानचित्र काम करना बंद कर देगा। स्केल नहीं तो दूरी का अनुमान नहीं; दिशा नहीं तो यात्रा में उपयोग नहीं; प्रतीक चिह्न नहीं तो कुछ दिखाने का स्थान ही नहीं।
प्र2.
पृथ्वी के प्रत्येक स्थान की एक स्थिति है जिसको अक्षांशों और देशांतरों के एक ग्रिड — पूर्व से पश्चिम की ओर जाने वाली (भूमध्य रेखा के समानांतर) और उत्तर से दक्षिण की ओर जाने वाली (एक ध्रुव से दूसरे ध्रुव तक) काल्पनिक रेखाओं की सहायता से सही-सही परिभाषित किया जा सकता है।
उत्तर

ग्रिड को खोलकर देखिए —

 अक्षांश के समानांतरदेशांतर के याम्योत्तर
रेखा की दिशापूर्व–पश्चिमउत्तर–दक्षिण
आकारपूरे वृत्त; ध्रुवों की ओर छोटे होते जाते हैंअर्धवृत्त, सभी की लंबाई समान, दोनों ध्रुवों पर मिलते हैं
शून्य रेखाभूमध्य रेखा, 0°ग्रिनिच की प्रमुख याम्योत्तर, 0°
अधिकतम मान90° उ. और 90° द. (दोनों ध्रुव)180° पू. = 180° प. (एक ही रेखा)

इन्हें काल्पनिक रेखाएँ इसलिए कहा जाता है कि धरातल पर कहीं कुछ खिंचा हुआ नहीं है — ये केवल मानचित्रों और ग्लोब पर बनाई जाती हैं। फिर भी इनसे मिलने वाली स्थिति बिल्कुल निश्चित होती है — दिल्ली 29° उ., 77° पू.

एक बात अवश्य याद रखिए: पहले अक्षांश, फिर देशांतर, और अक्षर कभी न भूलिए — 19° उ., 73° पू. मुंबई है, किंतु 19° द., 73° प. प्रशांत महासागर का सूना जल है।
प्र3.
देशांतर से समय निर्धारित किया जाता है और समय क्षेत्र को भी परिभाषित किया जाता है।
उत्तर

पृथ्वी 24 घंटे में 360° घूमती है, इसलिए —

360° ÷ 24 घंटे = प्रति घंटा 15°  •  1° = 4 मिनट
  • प्रत्येक याम्योत्तर का अपना स्थानीय समय होता है — पूर्व की ओर प्रत्येक 15° पर एक घंटा आगे।
  • देश इन्हें समय क्षेत्रों में बाँट लेते हैं (लगभग 15° चौड़ी पट्टियाँ) और प्रत्येक क्षेत्र में एक मानक समय रखते हैं।
  • विश्व मानचित्र (चित्र 1.8) में समय क्षेत्रों की रेखाएँ सीधी नहीं हैं — वे अंतर्राष्ट्रीय सीमाओं का पालन करती हैं ताकि कोई देश दो समयों में न बँट जाए।
  • भारत में एक ही मानक समय है — आई.एस.टी. = जी.एम.टी. + 5:30। बड़े देशों में ऐसा संभव नहीं; अमेरिका में 6 और रूस में 11 समय क्षेत्र हैं।
क्या आप जानते हैं? कुछ देशों का अंतर आधे या पौन घंटे का भी है — भारत +5:30, म्यांमार +6:30, नेपाल +5:45। इसीलिए चित्र 1.9 के ग्लोब पर भारत पर +5.5 लिखा है।
प्र4.
अंतर्राष्ट्रीय तिथि रेखा मुख्य याम्योत्तर के विपरीत लगभग 180° के देशांतर पर अवस्थित है। अंतर्राष्ट्रीय तिथि रेखा को पार करने पर तिथि में एक दिन का परिवर्तन होता है।
उत्तर

अंतर्राष्ट्रीय तिथि रेखा प्रशांत महासागर के बीचोंबीच, ग्रिनिच से ठीक विपरीत ओर से गुजरती है। यहीं +12 और −12 समय क्षेत्र एक-दूसरे को छूते हैं, इसलिए तिथि को एक दिन बदलना पड़ता है।

पूर्व की ओर पार करने पर → एक दिन घटाएँ (सोमवार से रविवार)
पश्चिम की ओर पार करने पर → एक दिन जोड़ें (रविवार से सोमवार)

“लगभग” 180° क्यों: यह रेखा जान-बूझकर टेढ़ी-मेढ़ी बनाई गई है — रूस के चुकोटका, अमेरिका के अल्यूशियन द्वीपों तथा किरिबाती, फिजी और समोआ के द्वीप-समूहों के चारों ओर घूमकर — ताकि किसी देश में एक ही समय दो भिन्न तिथियाँ न चलें।

ऐसी रेखा आवश्यक क्यों है: यदि आप पूर्व की ओर विश्व का चक्कर लगाएँ और प्रत्येक 15° पर एक घंटा जोड़ते जाएँ, तो लौटने तक आप पूरे 24 घंटे जोड़ चुके होंगे। यह अतिरिक्त दिन कहीं न कहीं लौटाना पड़ेगा — वही स्थान अंतर्राष्ट्रीय तिथि रेखा है।
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