जब पृथ्वी पर जल प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है, फिर भी 'जल की कमी' अथवा 'जल संकट' की इतनी चर्चा क्यों सुनाई देती है?
उत्तर
क्योंकि उस जल का लगभग कुछ भी हमारे काम का नहीं है। जल बहुत है, पर उपयोगी अलवणीय जल बहुत कम।
पृथ्वी का सारा जल = 100 भाग
लगभग 97 भाग महासागरों में → लवणीय (खारा), पीने, खेती और अधिकांश स्थलीय जीवों के लिए अनुपयोगी
केवल लगभग 3 भाग अलवणीय
और इन 3 भागों में भी लगभग दो-तिहाई हिमनदों एवं ध्रुवीय हिम में जमा है, शेष अधिकांश भूमिगत
नदियों, झीलों और तालाबों में बचा जल पृथ्वी के कुल जल का 1% से भी कम है
वह 3% अलवणीय जल खोलकर देखिए। उसका भी लगभग सारा हिस्सा या तो हिम में जमा है या गहरे भूमिगत।
इसके अतिरिक्त चार बातें संकट को और बढ़ाती हैं —
असमान वितरण। चेरापूँजी में वर्ष में कई मीटर वर्षा होती है और जैसलमेर में कुछ सेंटीमीटर। जल वहाँ नहीं है जहाँ लोग हैं।
समय का असमान वितरण। भारत की अधिकांश वर्षा मानसून के चार महीनों में होती है; शेष आठ महीने इस पर निर्भर हैं कि हमने कितना संचित किया।
बढ़ती माँग। सिंचाई, कारखानों और नगरों की खपत बढ़ती जा रही है और हम भूमिगत जल वर्षा की पुनर्भरण गति से कहीं तेज़ी से खींच रहे हैं।
प्रदूषण। मल-जल, कारखानों का कचरा और कीटनाशक नदियों तथा कुओं के जल को पीने योग्य नहीं रहने देते, जिससे उपयोगी हिस्सा और घट जाता है।
एक पंक्ति में उत्तर: पृथ्वी पर जल की कमी नहीं है — कमी सही समय पर सही स्थान पर उपलब्ध स्वच्छ अलवणीय जल की है।
प्र2.
जल संरक्षण के कौन-कौन से उपायों से आप अवगत हैं? इनमें से किसका उपयोग आपने अपने घर, विद्यालय, गाँव, उपनगरों एवं नगरों में होते देखा है?
उत्तर
जल तीन तरीकों से बचाया जाता है — कम उपयोग, पुन: उपयोग और वर्षा जल का संग्रहण।
कहाँ
क्या किया जा सकता है
घर में
दाँत साफ करते या साबुन लगाते समय नल बंद रखना; शॉवर के स्थान पर बाल्टी से स्नान; टपकते नल और फ्लश की तुरंत मरम्मत; चावल-सब्ज़ी धोया जल पौधों में डालना; आर.ओ. का बचा जल पोंछा लगाने में; कपड़े पूरी मशीन भरकर धोना।
विद्यालय में
हाथ धोने के स्थान पर दबाकर चलने वाले नल; छत से वर्षा जल संचयन की पाइप और भूजल पुनर्भरण गड्ढा; हाथ धोने के बचे जल से क्यारियों की सिंचाई; टपकते नलों की सूचना देने वाला मॉनीटर।
गाँव में
तालाबों और पोखरों का पुनरुद्धार — तालाब, जोहड़, बावड़ी, केरे एवं एरी; बहते जल को रोकने के लिए चेक डैम और मेड़बंदी; बाढ़ सिंचाई के स्थान पर टपक (ड्रिप) एवं फव्वारा सिंचाई; धान-गन्ने के स्थान पर कम जल माँगने वाले मोटे अनाज (मिलेट) उगाना।
नगर/उपनगर में
नए भवनों में अनिवार्य वर्षा जल संचयन; रिसती जल-पाइपों की मरम्मत; उपचारित जल का उद्यानों और निर्माण कार्य में पुन: उपयोग; नगर की झीलों का पुनरुद्धार; जल-मीटर लगाना ताकि जल व्यर्थ न बहे।
नमूना उत्तर: "हमारे घर में नल का पानी गर्म होने तक बाल्टी रख दी जाती है और वही पानी पौधों में डाला जाता है। हमारे विद्यालय में छत से एक पाइप कार्यालय के पीछे बनी टंकी में जाती है। पिछले वर्ष हमारे गाँव की पंचायत ने पुराना तालाब गहरा करवाया, जिससे अब पास के कुएँ मई में भी नहीं सूखते।"
बचाना ढूँढ़ने से आसान क्यों है: एक सेकंड में एक बूँद टपकाता नल दिन-भर में लगभग 15–20 लीटर जल बहा देता है — अर्थात् एक ही नल से वर्ष में 5,000 लीटर से अधिक। उसकी मरम्मत में लगभग कुछ भी खर्च नहीं होता; 5,000 लीटर नया जल जुटाने में बहुत कुछ।
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