स्थलरूपों के प्रमुख प्रकार कौन-से हैं और जीवन तथा संस्कृति के लिए इनका क्या महत्व है?
उत्तर
स्थलरूप पृथ्वी की सतह का एक भौतिक स्वरूप है। अध्याय में इन्हें तीन प्रमुख प्रकारों — पर्वत, पठार और मैदान में बाँटा गया है (चित्र 3.1)। विशेषज्ञ कुछ और स्थलरूप भी बताते हैं, जैसे मरुस्थल।
एक ही समुद्र-तल रेखा पर तीनों स्थलरूपों का पार्श्व दृश्य। यह चित्र पैमाने पर आधारित नहीं है — वास्तविक पर्वत शिखर मैदान से कहीं अधिक ऊँचा होता है।
स्थलरूप
पहचान
भारतीय उदाहरण
वहाँ का जीवन
पर्वत
आस-पास से बहुत ऊँचा; चौड़ा आधार, खड़ी ढलान, सँकरा शिखर; प्राय: हिम से ढँका
हिमालय, अरावली श्रृंखला, पश्चिमी घाट (अनाईमुडी, 2695 मी.)
ऊबड़-खाबड़ भूभाग, इसलिए कृषि केवल घाटियों और वेदिका (सीढ़ीदार) खेतों में; पशुपालन, पर्यटन, तीर्थयात्रा; चीड़, फर, स्प्रूस और देवदार के पर्वतीय वन
पठार
आस-पास की भूमि से उठा हुआ, ऊपर से प्राय: चपटा, कुछ पार्श्व सीधी ढलान वाले
दक्कन का पठार, छोटा नागपुर का पठार, चेरापूंजी (मेघालय) का पठार
खनन — पठार 'खनिजों का भंडार-गृह' कहलाते हैं; चट्टानी मिट्टी के कारण कृषि कम, किंतु लावा पठारों में उपजाऊ काली मिट्टी; जल प्रपात
मैदान
विस्तृत, सपाट या हल्का तरंगित; ऊँची पहाड़ियाँ या गहरी घाटियाँ नहीं; प्राय: 300 मीटर से कम ऊँचा
गंगा का मैदान, सिंधु और ब्रह्मपुत्र के मैदान
नदियों की तलछट से अत्यंत उपजाऊ मिट्टी; कृषि और मत्स्य पालन; सड़क और नौका से सुगम आवागमन; सर्वाधिक जनसंख्या यहीं
मरुस्थल (विशेषज्ञों द्वारा बताया गया चौथा प्रकार)
व्यापक शुष्क विस्तार, बहुत कम वर्षण, विलक्षण वनस्पति और प्राणि जगत
उत्तर-पश्चिम का थार मरुस्थल
कठिन परिस्थितियाँ, फिर भी समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा — लोक गीत और किंवदंतियाँ
जीवन के लिए महत्व:
जलवायु तय करते हैं। एक ही देश में हिमालय की चोटी पर स्थायी हिम है और थार में तपती रेत।
जल तय करते हैं। पर्वतों की पिघलती हिम नदियों को जल देती है और वही नदियाँ तलछट लाकर उपजाऊ मैदान बनाती हैं।
व्यवसाय तय करते हैं — पर्वतों में पशुपालन और पर्यटन, पठारों में खनन, मैदानों में कृषि और मत्स्य पालन।
बसावट तय करते हैं। मानव ने हर स्थलरूप में स्वयं को ढाला है, किंतु संख्या बहुत असमान है — अकेले गंगा के मैदान में लगभग 40 करोड़ लोग रहते हैं।
संस्कृति के लिए महत्व:
अध्याय के आरंभ में दिया अथर्ववेद का भूमि सूक्त "अनेक प्रकार की ऊँचाइयों, ढलानों तथा विशाल समतल भूमि" वाली पृथ्वी की स्तुति करता है।
कालिदास का कुमारसंभव हिमालय को "पर्वतों का राजा" कहकर आरंभ होता है, जो पश्चिमी से पूर्वी समुद्र तक फैला है।
पर्वतों की पूजा होती है — तिब्बती एवरेस्ट को 'चोमोलुंगमा' (जगत जननी) और नेपाली 'सागरमाथा' (आकाश की देवी) कहते हैं; कैलाश पर्वत को हिंदू, बौद्ध, जैन और बॉन अनुयायी पवित्र मानते हैं।
नदियों के स्रोत और संगम पवित्र माने जाते हैं; वहाँ अनेक त्योहार, समारोह और धार्मिक कृत्य होते हैं।
तमिल संगम काव्य की पाँच टिनै पाँच दृश्यभूमियों को अलग-अलग भावों और व्यवसायों से जोड़ती हैं — कुरिंजी (पर्वत), मुल्लै (वन और घास के मैदान), मरूदम (उपजाऊ मैदान), नेयदल (तट) और पालै (शुष्क प्रदेश)।
प्र2.
प्रत्येक स्थलरूप के साथ संबंधित जीवन की क्या चुनौतियाँ एवं अवसर हैं?
उत्तर
कोई भी स्थलरूप केवल उदार या केवल कठोर नहीं होता। हर स्थलरूप एक ही समय पर समस्या भी देता है और उपहार भी, और मनुष्य अपनी सूझ-बूझ से उसका उत्तर देता है।
स्थलरूप
चुनौतियाँ
अवसर
पर्वत
ऊबड़-खाबड़ भूभाग और खड़ी ढलानें, इसलिए कृषि योग्य समतल भूमि बहुत कम; भूस्खलन, हिमस्खलन, आकस्मिक बाढ़ और बादल फटना; भारी हिमपात और ठंडा मौसम; रास्ते दिनों तक बंद; पर्यटकों के अनियंत्रित आगमन से नाजुक पर्यावरण पर दबाव
स्वच्छ हवा और मनोरम दृश्य, इसलिए पर्यटन आय का बड़ा साधन; स्कीइंग, हाइकिंग, पर्वतारोहण और पैरा ग्लाइडिंग; सदियों पुरानी तीर्थयात्राएँ; वन उपज; पशुपालन; हिम से पोषित नदियाँ जो नीचे पूरे देश को जल देती हैं
पठार
प्राय: चट्टानी मिट्टी, मैदानों की तुलना में कम उपजाऊ और कृषि के लिए कम अनुकूल; उठी और कठोर सतह के कारण जल की कमी; खनन से भूमि और वन की क्षति
खनिज — 'खनिजों का भंडार-गृह'; छोटा नागपुर के पठार में लौह, कोयला और मैगनीज, पूर्वी अफ्रीका के पठार में सोना और हीरा; लावा पठारों में समृद्ध काली मिट्टी; जल प्रपात जो पर्यटन और विद्युत उत्पादन के अवसर देते हैं
मैदान
बढ़ती जनसंख्या और प्रदूषण; नदियों के उफनने से बाढ़; पंप से अत्यधिक सिंचाई के कारण भूमिगत जलस्तर में गिरावट — कृषि के भविष्य के लिए वास्तविक चुनौती
नदियों की तलछट से बनी सबसे उपजाऊ मिट्टी — चावल, गेहूँ, मक्का, जौ, मोटे अनाज, कपास, जूट और सन; नदी में मत्स्य पालन; हल्की ढलान, इसलिए नौका-संचालन और सड़क निर्माण सुगम; आरंभिक सभ्यताओं का जन्मस्थल
मरुस्थल
बहुत कम वर्षण, अत्यधिक गर्मी या अत्यधिक ठंड, जल की कमी और कम वनस्पति
विलक्षण वनस्पति और प्राणि जगत; ऊँट जैसे सहनशील पशु; लोक गीतों और किंवदंतियों की समृद्ध संस्कृति; आज सौर ऊर्जा और मरु पर्यटन भी
एक अनुकूलन ध्यान से देखिए — वेदिका (सीढ़ीदार) कृषि। पर्वतीय ढलान इतनी खड़ी होती है कि हल नहीं चल सकता, इसलिए लोग ढलान को काटकर समतल सीढ़ियाँ बना लेते हैं (चित्र 3.5) —
वेदिका कृषि। बिंदुदार रेखा नंगी ढलान है; हरी सीढ़ियाँ उसी ढलान को काटकर बनाई गई हैं।
सीढ़ियाँ काम कैसे करती हैं: नंगी ढलान पर वर्षा का जल सीधे नीचे भागता है और ऊपरी उपजाऊ मिट्टी बहा ले जाता है — यही अपरदन है। समतल सीढ़ी पर जल को बहने की जगह ही नहीं मिलती, इसलिए वह भीतर रिस जाता है और मिट्टी टिकी रहती है। आकृति के एक छोटे-से परिवर्तन से बेकार ढलान धान का खेत बन जाती है।
ध्यान रखें:बछेंद्री पाल 1984 में एवरेस्ट पर चढ़ने वाली प्रथम भारतीय महिला बनीं (उसी वर्ष पद्मश्री, 2019 में पद्मभूषण)। अरूणिमा सिन्हा ने 22 वर्ष की आयु में दुर्घटना में एक पैर गँवाने के बाद, बछेंद्री पाल के प्रशिक्षण से 2013 में एवरेस्ट पर चढ़ाई की और फिर अंटार्कटिका के विंसन गिरिशृंग सहित सभी महाद्वीपों की सबसे ऊँची चोटियाँ जीतीं (2015 में पद्मश्री)। पर्वत चुनौती देते हैं — और मनुष्य उत्तर देता है।
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