इस अध्याय के प्रारंभ में दिए गए भारतीय उपमहाद्वीप के भौतिक मानचित्र का अध्ययन कीजिए। वे कौन-कौन सी प्राकृतिक सीमाएँ हैं जिसे आप समझ सकते हैं?
उत्तर
पृष्ठ 76 का चित्र 5.2 एक ऐसी भूमि दिखाता है जो प्रकृति द्वारा लगभग पूरी तरह घिरी हुई है — स्थल की ओर पर्वत और शेष तीन ओर समुद्र। इसीलिए इसे उपमहाद्वीप कहा जाता है — एक बड़े महाद्वीप का स्पष्ट रूप से अलग दिखने वाला विशाल भाग।
दिशा
प्राकृतिक सीमा
मानचित्र में कैसे पहचानें
उत्तर
हिमालय
ऊपर भूरे-सफेद रंग का लंबा चाप, जिस पर हि मा ल य लिखा है — कश्मीर से पूर्व में असम तक। इसके आगे मानचित्र बैंगनी हो जाता है — वह तिब्बत का ऊँचा पठार है।
उत्तर-पश्चिम
हिंदुकुश
ऊपर बाईं ओर सफेद अक्षरों में लिखा है। इसके दक्षिण की अनाम श्रेणियों के साथ मिलकर यह मध्य एशिया और ईरान का स्थल-मार्ग बंद करता है।
उत्तर-पूर्व
ब्रह्मपुत्र के पूर्व की पहाड़ियाँ
ब्रह्मपुत्र के आगे म्यांमार की ओर बनी भूरी श्रेणियाँ। मानचित्र इन्हें दिखाता तो है, पर नाम नहीं देता।
पश्चिम
अरब सागर
गुजरात और कोंकण तट के पश्चिम के नीले भाग में नाम लिखा है।
पूर्व
बंगाल की खाड़ी
ओडिशा और आंध्र के पूर्व के नीले भाग में नाम लिखा है।
दक्षिण
हिंद महासागर
मानचित्र के नीचे, प्रायद्वीप के छोर से आगे, जहाँ पास ही श्रीलंका दिखता है।
उपमहाद्वीप की प्राकृतिक सीमाएँ, एक चौखट के रूप में। इनमें से प्रत्येक पृष्ठ 76 के चित्र 5.2 में दिखाई देती है; केवल उत्तर-पूर्वी पहाड़ियों का नाम नहीं दिया गया है।
इन सीमाओं का इतिहास में इतना महत्व क्यों रहा: पर्वतों और समुद्रों ने इस क्षेत्र में प्रवेश कठिन और इसकी पहचान सरल बना दी, अत: यहाँ रहने वाले लोग बहुत पहले से इसे एक भूमि मानने लगे — देश बनने से भी बहुत पहले। इसीलिए विष्णु पुराण भारत को एक ही पंक्ति में परिभाषित कर सका (पृष्ठ 80), और इसीलिए 2000 वर्ष पूर्व एक तमिल कवि ने भी वही चार छोर गिनाए — उत्तर में पर्वत, दक्षिण में केप कुमारी, पूर्व और पश्चिम में महासागर। इस दीवार के जो द्वार हैं — उत्तर-पश्चिम के दर्रे — ठीक वहीं से फारसी और बाद में अनेक अन्य लोग भीतर आए।
फिर से देखिए: मानचित्र उन नदियों के नाम भी देता है जो इन्हीं सीमाओं से निकलती हैं। हिमालय एवं हिंदुकुश से सिंधु (झेलम, चेनाब, रावी, ब्यास एवं सतलुज के साथ), सरस्वती, गंगा, यमुना एवं ब्रह्मपुत्र आती हैं। प्रायद्वीप की अपनी पहाड़ियों से नर्मदा एवं ताप्ती निकलती हैं — जो पश्चिम की ओर अरब सागर में गिरती हैं — तथा महानदी, गोदावरी, कृष्णा एवं कावेरी, जो पूर्व की ओर बंगाल की खाड़ी में गिरती हैं।
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