इसका कोई एक उत्तर नहीं है — अध्याय दिखाता है कि भारत को तीन अलग-अलग तरीकों से परिभाषित किया जा सकता है, और तीनों एक साथ सही हैं।
| परिभाषित करने का तरीका | वह क्या कहता है | अध्याय में कहाँ |
|---|---|---|
| 1. आधुनिक राष्ट्र के रूप में | आज भारत की परिभाषित सीमाएँ, परिभाषित राज्य और ज्ञात जनसंख्या है। संविधान का आरंभ ही है — “भारत, अर्थात् इण्डिया, राज्यों का संघ होगा।” | पृष्ठ 77; ध्यान रखें एवं चित्र 5.5, पृष्ठ 81–82 |
| 2. भौगोलिक क्षेत्र के रूप में | वह भूमि जिसे हम भारतीय उपमहाद्वीप कहते हैं, जो प्राकृतिक सीमाओं से घिरी है — उत्तर में हिमालय एवं हिंदुकुश, शेष तीन ओर अरब सागर, बंगाल की खाड़ी एवं हिंद महासागर। | चित्र 5.2, पृष्ठ 76; आइए विचार करें, पृष्ठ 77 |
| 3. समय के साथ विकसित एक विचार के रूप में | प्राचीन भारतीयों ने भी इसे मानचित्र की ही भाँति परिभाषित किया — “समुद्र के उत्तर में और हिमाच्छादित पर्वतों के दक्षिण में”, तथा “दक्षिण में केप कुमारी से उत्तर में महान पर्वत तक”। नाम और सीमाएँ बार-बार बदलती रही हैं। | विष्णु पुराण एवं तमिल कविता, पृष्ठ 80 |
केवल आधुनिक परिभाषा पर्याप्त क्यों नहीं है। अध्याय का पहला ही अनुच्छेद सचेत करता है — भारत “500, 2000 या 5000 वर्ष पूर्व बहुत अलग था”। अशोक के समय, लगभग 250 सा.सं.पू., जिस भूमि को वे जम्बूद्वीप कहते थे उसमें आज के बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान के भाग सम्मिलित थे। अत: आज की सीमाओं से बनी परिभाषा अतीत के भारत का वर्णन नहीं कर सकती।
सबसे लंबे समय तक टिकी परिभाषा भौगोलिक है। विष्णु पुराण की एक पंक्ति की परिभाषा वास्तव में यह वर्णन करती है —