अन्वेषण अध्याय 7 आइए पता लगाएँ

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
क्या आप जानते हैं कि उस समाज को क्या कहते हैं, जहाँ लोग अपने नेता का चयन करते हैं? आपके विचार से लोगों को ऐसी स्थिति से कैसे लाभ होता है? यदि वे अपने द्वारा नहीं चुने गए नेता के अधीन रहते हैं तो क्या हो सकता है? (संकेत – ‘शासन और लोकतंत्र’ विषय में आपने जो पहले पढ़ा है, उस पर विचार कीजिए) अपने विचार 100–150 शब्दों में लिखिए।
उत्तर

ऐसे समाज को लोकतंत्र कहते हैं — यूनानी डेमोस (जनता) और क्रेटोस (शासन) से: जनता का शासन। भारत में हम अपने नेताओं को चुनाव से चुनते हैं, इसीलिए भारत एक लोकतांत्रिक गणराज्य है।

जब लोग अपने नेता चुनते हैंजब लोग अपने नेता नहीं चुनते
जवाबदेही। जिस नेता को फिर चुनाव में जाना है, उसे बीते वर्षों का हिसाब देना पड़ता हैजिस शासक को हटाया नहीं जा सकता, उसे किसी को हिसाब नहीं देना पड़ता
शांतिपूर्ण परिवर्तन। सरकार वोट गिनकर बदली जा सकती है, लड़कर नहींशासक बदलने के लिए विद्रोह के अतिरिक्त कोई मार्ग नहीं बचता
सबकी समस्याएँ सुनी जाती हैं। हर वोट का मूल्य समान है, इसलिए नेता सबसे छोटे गाँव की भी उपेक्षा नहीं कर सकतानिर्णय प्राय: उन्हीं के पक्ष में होते हैं जो शासक के निकट हैं
असहमति की स्वतंत्रता। आलोचना वैध है, इसलिए भूलें जल्दी पकड़ में आती हैंआलोचना जोखिम भरी हो जाती है, भूलें छिपती और बढ़ती हैं
नागरिकों में उत्तरदायित्व। जब नेता आपने चुना है तो परिणाम में आपका भी भाग हैलोगों को लगता है कि शासन उन पर हो रहा है, उनका नहीं है

इस अध्याय से जोड़। वेद हमें जनों के शासन के विषय में केवल कुछ संकेत देते हैं — राजा (राजा या शासक), तथा सभा और समिति, जो दोनों सामूहिकता को इंगित करते हैं। जिस समाज के पास सभाओं के लिए शब्द हैं, वहाँ मिल-बैठकर निर्णय लेने की कोई परंपरा अवश्य रही होगी। किंतु पुस्तक ईमानदार है: “इसके बारे में बहुत अधिक ज्ञात नहीं है कि ये जन अपने समाज का शासन कैसे चलाते थे।” अत: यह नहीं कहना चाहिए कि वैदिक समाज लोकतंत्र था — केवल इतना कि सामूहिक विचार-विमर्श की शब्दावली भारत में बहुत पुरानी है।

नमूना उत्तर (लगभग 130 शब्द):
“जिस समाज में लोग अपने नेता स्वयं चुनते हैं, उसे लोकतंत्र कहते हैं। भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और हम चुनाव के माध्यम से अपने प्रतिनिधि चुनते हैं। इससे कई लाभ होते हैं। नेताओं को अपने निर्णयों का कारण बताना पड़ता है, क्योंकि उन्हें फिर मतदाताओं के सामने जाना है। जो सरकार काम न कर रही हो, उसे लड़ाई से नहीं, मतदान से बदला जा सकता है। हर वोट बराबर होने के कारण सड़क, विद्यालय, पानी और रोजगार जैसी आम लोगों की चिंताओं की उपेक्षा नहीं की जा सकती। असहमति की स्वतंत्रता होने से भूलें बताई और सुधारी जाती हैं।
यदि लोग अपने द्वारा न चुने गए नेता के अधीन रहें तो अन्यायी शासक को हटाने का कोई उपाय नहीं रहता। निर्णय केवल एक छोटे समूह के हित में हो सकते हैं, आलोचना कठिन हो सकती है, और लोगों में यह भाव समाप्त हो जाता है कि देश उनका अपना है।”
वेदों के अध्याय में यह प्रश्न क्यों: आपकी सामाजिक विज्ञान की पुस्तक का एक सूत्र यह है कि विचारों का भी इतिहास होता है। सभा और समिति जैसे शब्द तीन हजार वर्ष से अधिक पुराने हैं, और आज भी दिल्ली में राज्य सभा तथा लोक सभा उसी 'सभा' शब्द को धारण किए हुए हैं। मिल-बैठकर निर्णय लेने की प्रथा इस उपमहाद्वीप की सबसे पुरानी निरंतर आदतों में से एक है।
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