प्र1.
क्या आपने इस महत्वपूर्ण संदेश को प्रदान करने वाली कोई अन्य कहानी सुनी या पढ़ी है? उनसे आपको किन मूल्यों की शिक्षा मिली?
उत्तर
यह उत्तर आपको स्वयं देना है — किंतु अच्छे उत्तर के तीन भाग होते हैं: कहानी का नाम और वह आपको कहाँ मिली; दो-तीन वाक्यों में कहानी; और फिर स्पष्ट रूप से वह मूल्य जो उसने सिखाया।
पहले देखिए कि अध्याय की अपनी तीन कथाएँ क्या करती हैं — यही आदर्श हैं:
| कथा | क्या होता है | कौन-सा मूल्य |
|---|---|---|
| श्वेतकेतु (छांदोग्य उपनिषद्) | बारह वर्ष अध्ययन के बाद पुत्र अहंकारी होकर लौटता है; पिता उद्दालक के ब्रह्म संबंधी प्रश्नों का उत्तर वह नहीं दे पाता, और पिता उसे बरगद के बीज तथा मिट्टी के उदाहरण से समझाते हैं | विनम्रता — और यह कि सूचना और वास्तविक समझ एक नहीं हैं |
| नचिकेता (कठोपनिषद्) | क्रोध में यम को दे दिया गया बालक लंबी प्रतीक्षा करता है, टाले जाने पर भी नहीं टलता और एक ही प्रश्न पूछता रहता है — शरीर की मृत्यु के बाद क्या होता है? | दृढ़ता और कठिन प्रश्न पूछते रहने का साहस |
| गार्गी और याज्ञवल्क्य (बृहदारण्यक उपनिषद्) | एक ऋषिका राजदरबार के सबसे बड़े विद्वान से प्रश्न करती है, मना किए जाने पर रुकती है — और फिर पुन: प्रश्न पूछती है | साहस, और यह कि स्त्री के प्रश्न का महत्व पुरुष के प्रश्न से कम नहीं |
ध्यान दीजिए, इनसे ठीक पहले पुस्तक कहती है: “उपनिषदों की कई कथाओं से हमें प्रश्न पूछने के महत्व का पता चलता है। फिर चाहे ये प्रश्न किसी महिला, पुरुष या बच्चे ने पूछे हों।” तीनों नायक सत्ता से बाहर के हैं — दो बालक और एक स्त्री।
नमूना उत्तर 1: “मैंने पंचतंत्र की वह कथा पढ़ी है जिसमें कबूतरों का झुंड बहेलिए के जाल में फँस जाता है। अलग-अलग छटपटाने के बजाय सभी कबूतर एक साथ उड़कर जाल सहित अपने मित्र चूहे के पास पहुँचते हैं, जो जाल कुतरकर उन्हें मुक्त कर देता है। इससे मैंने सीखा कि मिलकर काम करने वाले उस संकट से भी निकल आते हैं जो अकेले सबको हरा देता — और यह भी कि मित्रता निभाना व्यर्थ नहीं जाता।”
नमूना उत्तर 2: “मेरी दादी ने मुझे वानर-राज की वही कथा सुनाई थी जो इसी अध्याय में है। वानर-राज ने अपने शरीर का पुल बनाकर अपने समूह को नदी पार कराया और स्वयं घायल होकर मर गए। इससे मैंने सीखा कि नेता का पहला कर्तव्य अपने लोगों के प्रति होता है, अपने प्रति नहीं। यह देखकर राजा ने भी अपनी प्रजा के प्रति अपनी भूमिका पर सोचना आरंभ किया — कथा का यही उद्देश्य है।”
कथा को ही शिक्षण की विधि क्यों बनाया गया: इस अध्याय के विचार — ब्रह्म, आत्मन्, कर्म, अहिंसा — बहुत अमूर्त हैं, और अमूर्त विचार की परिभाषा जितनी सरलता से याद होती है उतनी ही सरलता से भूल भी जाती है। किंतु अहंकारी बालक, क्रुद्ध पिता या घायल वानर की कथा टिक जाती है। इसीलिए उपनिषद्, जातक कथाएँ और रोहिनेय की जैन कथा — तीनों तर्क से नहीं, कथा से सिखाते हैं।