उत्तर देने से पहले पृष्ठ 114 की कृति को ध्यान से देखिए — मूर्तिकार ने कई संकेत जान-बूझकर गढ़े हैं और हर संकेत कुछ कह रहा है।
| जो दिखाई देता है | वह क्या कह रहा है |
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| वे बीच में खड़े हैं और सबसे लंबे हैं | प्राचीन कला में आकार महत्व का सूचक है। दृष्टि पहले उन्हीं पर जाती है |
| सिर के पीछे सादा गोल प्रभामंडल | यह प्रभावलय ज्ञान-प्राप्त व्यक्ति का प्रचलित चिह्न है। कृति में किसी और के पीछे यह नहीं है |
| दाहिना हाथ उठा हुआ, हथेली सामने | उपदेश और अभय की मुद्रा। वे आशीर्वाद या आदेश नहीं दे रहे — वे समझा रहे हैं |
| दोनों कंधों को ढकता, गहरी सिलवटों वाला लंबा चीवर | यह भिक्षु का वस्त्र है, राजसी वेश नहीं। राजकुमार होते हुए भी वे उसे त्यागने वाले के रूप में दिखाए गए हैं |
| न मुकुट, न आभूषण, न कोई शस्त्र | तुलना कीजिए — आस-पास खड़े कई श्रोताओं ने भारी पगड़ियाँ और आभूषण पहन रखे हैं। बुद्ध का अधिकार उनके ज्ञान से है, वैभव से नहीं |
| सिर पर बँधा हुआ जूड़ा | यह उष्णीष है, जो भारतीय मूर्तिकला में महापुरुष का पारंपरिक चिह्न है |
| शांत मुख, झुकी हुई दृष्टि | वही 'शांत' भाव जिसे देखकर युवा सिद्धार्थ रथ से संन्यासी की ओर आकृष्ट हुए थे |
| दोनों ओर श्रोताओं की भीड़, हाथ जोड़े या उठाए हुए | वे बुद्ध की ओर और एक-दूसरे की ओर मुड़े हैं। बुद्ध किसी सिंहासन पर अकेले नहीं — वे समूह के बीच में हैं |
| ऊपर वृक्ष, पीछे वेदिका और स्तंभ | उद्यान या विहार का परिवेश — वही साधारण स्थान जहाँ बुद्ध वास्तव में उपदेश देते थे |
कृति स्वयं क्या है। यह लगभग 1800 वर्ष पुरानी पत्थर की कृति है, अर्थात लगभग दूसरी–तीसरी शताब्दी सा.सं. की — बुद्ध के काल के छह-सात शताब्दी बाद की। हरे रंग का पत्थर और वस्त्र की अत्यंत सजीव, गहरी सिलवटें उत्तर-पश्चिम की गांधार शैली की विशेषताएँ मानी जाती हैं।