अन्वेषण अध्याय 7 आइए पता लगाएँ

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
उपरोक्त भित्तिचित्र (नई दिल्ली के एक जैन मंदिर से) का अवलोकन कीजिए। इसमें क्या विशेष दिखाई दे रहा है? इसमें क्या संदेश निहित है?
उत्तर

विशेष यह है कि पशु क्या कर रहे हैं — या यों कहिए, क्या नहीं कर रहे। पृष्ठ 117 की कृति को ध्यान से देखिए:

  • बाईं ओर एक सिंह, पूरी अयाल के साथ, कमल के आकार के बड़े जल-पात्र में सिर डाले हुए है।
  • दाईं ओर एक गाय ने उसी पात्र में सिर डाल रखा है — दोनों के सिर लगभग छू रहे हैं।
  • सिंह के नीचे एक शावक शांत खड़ा है; गाय के पास एक बछड़ा दूध पी रहा है।
  • पीछे वृक्ष, पथरीली पहाड़ियाँ और आकाश में पक्षी हैं — यह एक साधारण वन है, मंदिर का प्रांगण नहीं।
  • कोई भी पशु न दुबका है, न भाग रहा है, न दूसरे को ताक रहा है। चित्र में कहीं भय नहीं है।

प्रकृति में सिंह और गाय शिकारी और शिकार हैं। सिंह के इतने पास खड़ा बछड़ा जीवित नहीं रहता। मूर्तिकार ने पशु-जगत की सबसे निश्चित हिंसा को उठाकर बंद कर दिया है।

संदेशकृति यह कैसे कहती है
1. अहिंसा प्रत्येक जीव तक पहुँचती हैकेवल मनुष्यों तक नहीं। पृष्ठ 115 पर महावीर के शब्द: “सभी सांस लेने वाले, उपस्थित, जीवित, संवेदनशील जीवों को मारा न जाए, न ही उनके साथ हिंसा की जाए, न दुर्व्यवहार किया जाए, न ही सताया जाए तथा न ही दूर हटाया जाए”
2. अहिंसा से निर्भयता आती हैबछड़ा ही इसका प्रमाण है। जहाँ किसी का हानि पहुँचाने का भाव नहीं, वहाँ किसी को डरने की आवश्यकता नहीं — संदेश जितना हिंसा के विषय में है, उतना ही भय के विषय में
3. सभी जीव परस्पर निर्भर हैंदोनों एक ही पात्र से पी रहे हैं। जैन मत “सभी जीवों, मानवों से लेकर अदृश्य जीवों तक आपसी संबद्धता और आपसी निर्भरता पर बल देता है”
4. वैर छोड़ा जा सकता हैसिंह को न बाँधा गया है, न हराया गया है; उसने बस रुकना चुना है। जिन अर्थात 'विजेता' का जैन अर्थ यही है — विजय अपनी अविद्या और मोह पर, शत्रु पर नहीं
5. यह हम पर लागू होता हैमंदिर का भित्तिचित्र वहाँ लगाया जाता है जहाँ लोग उसे प्रतिदिन देखें। सिंह से यह नहीं कहा जा रहा कि वह गाय बन जाए — केवल यह कि वह चोट न पहुँचाए
यह चित्र आया कहाँ से: जैन परंपरा में समवसरण की कल्पना है — वह विशाल गोलाकार सभा जिसमें तीर्थंकर उपदेश देते हैं और जिसमें स्वभाव से शत्रु पशु भी शांत होकर साथ बैठकर सुनते हैं। एक ही पात्र से पानी पीते सिंह और गाय इसी विचार का प्रचलित संक्षेप हैं, और भारत भर के जैन मंदिरों में इसका कोई-न-कोई रूप उकेरा मिलता है। अत: यह केवल एक सुंदर पशु-दृश्य नहीं — यह पूरे उपदेश का एक चित्र में सार है।
यह कीजिए: यही विचार इसी पृष्ठ के अगले बॉक्स में लौटता है। यदि अहिंसा का अर्थ विचारों की हिंसा से भी बचना है, तो सोचिए कि आपकी कक्षा में वह सिंह और गाय कौन हैं — वह व्यक्ति जिसके साथ आप निश्चय कर चुके हैं कि निभ नहीं सकती। यह भित्तिचित्र कहता है कि वह जोड़ी भी एक ही पात्र से पानी पी सकती है।
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