प्र1.
बौद्ध मत और जैन मत दोनों में ही अहिंसा का अर्थ व्यक्ति या जीव के प्रति शारीरिक हिंसा न करने से भी कहीं अधिक है। इसमें विचारों की हिंसा से भी संयम रखने के लिए कहा गया है, जैसे कि किसी के बारे में बुरी भावना नहीं रखना। यदि हम अपने आप को ध्यान से देखें तो हमें ऐसे नकारात्मक विचार स्वयं में अनुभव होते हैं और हमें इन्हें सकारात्मक विचारों में बदलना सीखना चाहिए। कभी-कभार ये नकारात्मक विचार स्वयं हमारी ओर भी निर्देशित होते हैं।
उत्तर
शब्द से आरंभ कीजिए। पृष्ठ 113 पर पुस्तक बता चुकी है कि अहिंसा का “मूल अर्थ है — चोट नहीं पहुँचाना या नुकसान नहीं पहुँचाना”। यही अंतर इस पूरे बॉक्स का आधार है। 'हिंसा' सुनकर हमें प्रहार याद आता है; 'चोट पहुँचाना' में वह सब आ जाता है जिससे किसी पर निशान पड़े — और विचार भी निशान छोड़ता है।
| स्तर | यह कैसा दिखता है | किसे पता चलता है |
|---|---|---|
| कर्म की हिंसा | मारना, धक्का देना, किसी जीव को कष्ट देना, दूसरे की वस्तु बिगाड़ना | सबको |
| वाणी की हिंसा | चिढ़ाना, नाम बिगाड़ना, अफवाह फैलाना, कठोर मजाक, जान-बूझकर किसी को अलग कर देना | जिस पर पड़ती है, उसे |
| विचारों की हिंसा | बुरी भावना, तिरस्कार, किसी के असफल होने की कामना, वैर पाल लेना, पहले से ही किसी पूरे समूह को बुरा मान लेना | केवल आपको — इसीलिए बॉक्स कहता है “अपने आप को ध्यान से देखें” |
| स्वयं के प्रति हिंसा | “मैं किसी काम का नहीं”, “मुझसे तो सब बिगड़ जाता है”, अपनी भूल के लिए स्वयं को क्षमा न करना | प्राय: किसी को नहीं |
विचार को जड़ क्यों माना गया। जिसके प्रति मन में अच्छा भाव है, उसे कोई नहीं मारता। पहले बुरी भावना आती है, फिर वाणी, फिर कर्म। यदि अहिंसा केवल हाथ का नियम हो, तो वह अंतिम क्षण में लागू होगी, जब क्रोध पूरे वेग पर है। विचार पर लागू हो तो वह तब काम करती है जब बात अभी छोटी है।
बॉक्स के अनुसार अभ्यास के तीन क्रमिक चरण:
- देखिए। लड़िए नहीं, नकारिए नहीं — देखिए। “यदि हम अपने आप को ध्यान से देखें तो हमें ऐसे नकारात्मक विचार स्वयं में अनुभव होते हैं।” अधिकांश समय ये बिना देखे ही निकल जाते हैं।
- बदलिए। बॉक्स दबाने को नहीं कहता, “इन्हें सकारात्मक विचारों में बदलना सीखना चाहिए” कहता है। “वह तो बस दिखावा करता है” के स्थान पर “वह जल्दी उत्तर देता है, यह मुझे भी सीखना चाहिए”। ऊर्जा वही है, दिशा बदल जाती है।
- स्वयं को भी सम्मिलित कीजिए। “कभी-कभार ये नकारात्मक विचार स्वयं हमारी ओर भी निर्देशित होते हैं।” सबके प्रति कोमल होना सरल है, कठिन है उस एक व्यक्ति के प्रति जिससे बचकर कहीं जाया नहीं जा सकता।
इसी बात का बौद्ध पक्ष: “युद्ध के मैदान में हजारों व्यक्तियों पर हजारों बार विजय पाने की तुलना में स्वयं पर विजय पाना अधिक बड़ी उपलब्धि है।” यह कथन पृष्ठ 113 पर है और यह बॉक्स उसी का व्यावहारिक अर्थ है। बुद्ध जिस युद्धभूमि की बात कर रहे हैं, वह बाहर नहीं है।
एक सप्ताह यह कीजिए: एक पृष्ठ पर दो स्तंभ बनाइए। बाएँ में — वह नकारात्मक विचार जो आपने स्वयं में पकड़ा। दाएँ में — वही स्थिति, बुरी भावना के बिना लिखी हुई। किसी का नाम मत लिखिए। सप्ताह के अंत में गिनिए कि कितनी पंक्तियाँ दूसरों के बारे में हैं और कितनी स्वयं के बारे में। अधिकांश विद्यार्थी उत्तर देखकर चौंक जाते हैं।