वेद भारत के सबसे प्राचीन ग्रंथ हैं — और वस्तुत: विश्व के सबसे प्राचीन ग्रंथों में से एक। 'वेद' शब्द संस्कृत के विद् से आया है जिसका अर्थ है 'ज्ञान' (इसी मूल से विद्या भी बना है)। वेद चार हैं।
| चार वेद | नाम का अर्थ |
|---|---|
| ऋग्वेद | ऋच् अर्थात स्तुति की ऋचा से — चारों में प्राचीनतम, जिसे अध्याय दो बार उद्धृत करता है |
| यजुर्वेद | यजुस् अर्थात यज्ञ का मंत्र-सूत्र से |
| सामवेद | सामन् अर्थात गान या स्वर से — यह वेद गाया जाता है |
| अथर्ववेद | अथर्वन् नामक ऋषि के नाम पर |
वेदों में हजारों ऋचाएँ हैं — कविताओं और गीतों के रूप में प्रार्थनाएँ — जिनकी रचना ऋषियों (कवि) और ऋषिकाओं (कवयित्रियाँ) ने संस्कृत भाषा के एक प्रारंभिक रूप में सप्तसिंधु क्षेत्र में की। ये लिखित रूप में नहीं थीं, इनका मौखिक पाठ किया जाता था। विशेषज्ञों ने ऋग्वेद की रचना पाँचवीं से दूसरी सहस्राब्दी सा.सं.पू. के बीच किए जाने का प्रस्ताव किया है, अर्थात 100 से 200 पीढ़ियों तक ये ग्रंथ केवल स्मृति में सुरक्षित रहे और “बिना किसी विशेष परिवर्तन के” आगे संप्रेषित होते रहे।
संदेश — चार विचार जो इसे बाँधे रखते हैं।
| विचार | अध्याय क्या कहता है |
|---|---|
| 1. अनेक के पीछे एक | ऋचाएँ अनेक देवों — इंद्र, अग्नि, वरुण, मित्र, सरस्वती, उषा — को संबोधित हैं, फिर भी आद्य ऋषियों और ऋषिकाओं ने इन्हें “अलग नहीं, बल्कि एक ही माना”: एकं सत् विप्रा बहुधा वदन्ति, “परम सत्य एक ही है, किंतु मनीषी इसे अनेक नाम देते हैं।” |
| 2. ऋत — सत्य और क्रम | दृष्टाओं के साथ मिलकर देवों ने मानव जीवन और ब्रह्मांड में ऋत, अर्थात सत्य और क्रम, को बनाए रखा। एक ही शब्द दोनों को समेटता है — जगत की व्यवस्था और व्यक्ति की सच्चाई |
| 3. सर्वोपरि मूल्य — सत्य | “कुछ मान्यताएँ विशेष रूप से महत्वपूर्ण थीं जो 'सत्य' से आरंभ हुईं, जो ईश्वर का दूसरा नाम था” |
| 4. लोगों के बीच एकता | ऋग्वेद के अंतिम मंत्रों में इसका सीधा आह्वान है — “साथ मिलकर चलें, साथ मिलकर बोलें, एक हो हमारा मन, हमारे विचार मिलें... एक हो हमारा उद्देश्य, एक हो हमारा हृदय... हमारे विचार एक हों, अत: सभी सहमत हों।” |