मेवाड़ शैली का एक भरा-पूरा लघुचित्र, जो लाल, पीले, हरे और नीले सपाट खंडों में बँटा है और जिसके चारों ओर सुनहरी-नारंगी किनारी है। खंड-दर-खंड इस प्रकार है —
- नीचे बाईं ओर, हरे मैदान पर: युद्ध के बाद का दृश्य। सोने के मुकुट पहने दो नीले वर्ण के राजकुमार भूमि पर पड़े हैं, उनके शरीर पर हल्के रंग के कुंडल लिपटे हैं और लंबे बाण आर-पार पड़े हैं। उनके चारों ओर दर्जनों वानर और भालू — कुछ धूसर, कुछ भूरे — गिरे हुए हैं या सिर पकड़े बैठे हैं। बीच-बीच में कुछ मुकुटधारी योद्धा खड़े होकर नीचे देख रहे हैं।
- ऊपर बाईं ओर, नीले आकाश में: छोटी-छोटी आकृतियाँ सुनहरी छतरीदार सवारियों में तथा श्वेत अश्व के रथ में आकाश-मार्ग से जाती हुई नीचे का दृश्य देख रही हैं।
- बीच में, पीले महल में: शिरस्त्राण पहने सैनिकों की पंक्तियाँ आँगनों और सीढ़ियों पर भरी हैं; कुछ घोड़ों पर सवार हैं, एक गहरे भूरे अश्व पर है और एक धनुष उठाए हुए है।
- ऊपर दाईं ओर, लाल पृष्ठभूमि पर: एक दरबार का दृश्य। मुकुट की तरह ऊपर-नीचे सजे अनेक सिरों तथा अस्त्र थामे अनेक भुजाओं वाली एक बड़ी आकृति सिंहासन पर बैठी है और उसके सामने हाथ जोड़े तथा धनुष ताने दरबारी व योद्धा खड़े हैं।
- दाईं ओर बीच में, गुलाबी-पीली पृष्ठभूमि पर: वही अनेक सिरों और अनेक भुजाओं वाली आकृति फिर से, अब एक कक्ष के भीतर सिंहासन पर, पास में एक सेवक खड़ा है।
- नीचे दाईं ओर, उपवन में: लाल वस्त्र पहने एक स्त्री फूलों से लदे वृक्षों के नीचे बैठी है और दो सहचरियाँ उसकी सेवा में हैं — सारे युद्ध से दूर।
पहले शीर्षक पढ़िए। उसी में लगभग सब कुछ है — रामायण का युद्धकांड, साहिबदीन, मेवाड़, 1652, इंडिया ऑफिस लाइब्रेरी, लंदन। अर्थात यह पन्ना रामायण के छठे कांड युद्धकांड का है, इसे मेवाड़ (राजस्थान) के चित्रकार साहिबदीन ने 1652 में बनाया, और यह आज लंदन में सुरक्षित है।
अब चित्र पढ़िए। मेवाड़ी शैली में एक ही पृष्ठ पर कथा के कई क्षण अलग-अलग रंगों के खंडों में दिखाए जाते हैं, जिन्हें एक-एक करके पढ़ा जाता है।
| कहाँ देखिए | वहाँ क्या बना है | वह क्या बताता है |
|---|---|---|
| बाईं ओर का बड़ा हरा मैदान | योद्धा तथा वानरों और भालुओं की पूरी सेना भूमि पर पड़ी है, लंबी सफेद कुंडलियों से बँधी हुई; उनके बीच दो नीले वर्ण के राजकुमार; शेष वानर शोक में बैठे हैं | पराजय के बाद का रणक्षेत्र। सफेद कुंडलियाँ सर्प हैं — वे बाण जो साँप बनकर पूरी सेना को बाँध गए |
| ऊपर का नीला आकाश | सुनहरे आकाश-रथों में बैठे पात्र, और श्वेत अश्वों के रथ से बाण चलाता एक योद्धा | युद्ध भूमि पर ही नहीं, आकाश में भी लड़ा जा रहा है — राक्षस योद्धाओं की मायावी शक्ति का संकेत |
| ऊपर दाईं ओर का लाल कक्ष | महल में सिंहासन पर बैठा दस सिरों और अनेक भुजाओं वाला मुकुटधारी पात्र, जिसके सामने योद्धा और दूत खड़े हैं | लंकाधिपति रावण अपनी सभा में, रणक्षेत्र का समाचार सुनते हुए |
| नीचे दाईं ओर का गुलाबी खंड | वही दस सिरों वाला पात्र फिर से सिंहासन पर, सामने हाथ जोड़े खड़ा एक योद्धा | उसी सभा का दूसरा क्षण — चित्रकार एक ही पात्र को दोहराकर समय का बीतना दिखाता है |
| नीचे दाईं ओर का पीला उपवन | चारदीवारी के भीतर फूलों-पेड़ों के बीच बैठी दो स्त्रियाँ | अशोक वाटिका में सीता, पहरे में, पर एक संगिनी के साथ |
सब मिलाकर। सबसे संभावित पहचान — और प्राय: कक्षा इसी पर पहुँचती है — युद्धकांड का प्रसिद्ध नागपाश प्रसंग है : रावण-पुत्र मेघनाद (इंद्रजित) आकाश से अदृश्य रहकर राम, लक्ष्मण और वानर सेना पर ऐसे बाण चलाता है जो सर्प बनकर उन्हें जकड़ लेते हैं; इसका समाचार रावण की सभा में पहुँचता है, और उधर सीता अशोक वाटिका में प्रतीक्षा करती हैं। कथा में आगे बंधन कट जाता है और युद्ध चलता रहता है।
चर्चा में लाने योग्य महत्वपूर्ण बातें :
- पात्रों की पहचान के संकेत — राम और लक्ष्मण नीले वर्ण में; रावण के दस सिर; हनुमान तथा वानर सेना बंदर के रूप में; जांबवान का समुदाय भालुओं के रूप में।
- चित्रण की शैली — एक ही पृष्ठ पर कई दृश्य, रंगों की पट्टियों से अलग किए हुए, और एक ही पात्र अलग-अलग खंडों में दोहराया हुआ। इसे छायाचित्र की तरह बाएँ से दाएँ नहीं, बल्कि खंड-दर-खंड कथा की तरह पढ़ा जाता है।
- समय और स्थान — 1652, मेवाड़। यह एक संस्कृत महाकाव्य का राजस्थानी चित्रांकन है, जो अब लंदन में है। यह चित्र स्वयं अध्याय का उदाहरण है — एक ही कथा, एक और भाषा में कही गई; वह भाषा है चित्रकला।