पृष्ठ 125 के दोनों उद्धरण एक ही बात दो बिल्कुल अलग स्वरों में कहते हैं — एक कवि की प्रार्थना, दूसरा दार्शनिक का कथन। चर्चा से पहले दोनों को धीरे-धीरे पढ़िए।
| उद्धरण | वह क्या कह रहा है |
|---|---|
| रवींद्रनाथ टैगोर: “हे ईश्वर! मेरी यह प्रार्थना स्वीकार करें कि मैं अनेकता में एकता के स्पर्श का आनंद कभी न गवाँ सकूँ।” | यह प्रार्थना है, कथन नहीं — कवि किसी वस्तु के खोने से बचना चाहता है। वह जो खोना नहीं चाहता, वह है अनेकता के बीच एकता को अनुभव करने की क्षमता। ‘स्पर्श’ शब्द बताता है कि यह सिद्ध करने की नहीं, महसूस करने की बात है, और ‘आनंद’ बताता है कि विविधता उलझन नहीं, रस है |
| श्री अरविंद: “...विविधता में एकता का सिद्धांत सदैव से भारत के लिए स्वाभाविक रहा है और यह उसकी प्रकृति एवं अस्तित्व के लिए आवश्यक है। एक में अनेक का यह भाव भारत को उसके स्वभाव व स्वधर्म की सुनिश्चित नींव पर स्थापित करेगा।” | वे विविधता में एकता को भारत के लिए ‘स्वाभाविक’ कहते हैं — कोई उपलब्धि या नारा नहीं, बल्कि उसकी सामान्य दशा। स्वभाव अर्थात अपनी प्रकृति, स्वधर्म अर्थात अपना कर्तव्य या अपना मार्ग। उनका कथन यह है कि भारत तभी दृढ़ भूमि पर है जब वह स्वयं हो, अर्थात एक-में-अनेक |
चर्चा को आगे बढ़ाने वाले प्रश्न :
- टैगोर अनेकता को ‘आनंद’ कहते हैं, श्री अरविंद एक-में-अनेक को भारत का ‘स्वभाव’। आपके अपने अनुभव से कौन-सा शब्द अधिक मेल खाता है, और क्यों?
- टैगोर प्रार्थना करते हैं कि यह भाव ‘कभी न गवाँ सकूँ’। ऐसा क्या है जिससे कोई इसे खो सकता है? (केवल अपने जैसे लोगों के बीच रहना; अपने ही ढंग को एकमात्र सही मानना; न घूमना, न सुनना।)
- श्री अरविंद कहते हैं कि देश तब सबसे बलवान होता है जब वह अपने स्वभाव पर चले। क्या यही बात व्यक्ति पर भी लागू होती है — विद्यार्थी तब अधिक सशक्त है जब दूसरों की नकल करे, या जब कक्षा का अंग रहते हुए पूरी तरह स्वयं हो?
- दोनों ने यह पुस्तक लिखे जाने से बहुत पहले लिखा था। क्या अध्याय की कोई बात — अनाज का मानचित्र, साड़ी, जनवरी का पर्व, जनजातीय रामायण — इनमें से किसी को सही सिद्ध करती है?