दीपकम् अध्याय 1 वदामः लिखामः च

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
व्यञ्जनैः सह सर्वेषाम् अपि स्वराणां संयोजनं भवति । व्यञ्जनैः सह स्वराणां संयोजनेन गुणिताक्षराणि भवन्ति — क-वर्गस्य च-वर्गस्य च रिक्तकोष्ठकानि पूरयन्तु (पृष्ठ 4, 5)।
उत्तर

व्यञ्जन के साथ स्वर की मात्रा जोड़ने से गुणिताक्षर बनता है। नियम एक ही है —

क् + अ =
क् + आ (ा) = का
क् + इ (ि) = कि
क् + ऋ (ृ) = कृ
क् + औ (ौ) = कौ

इसी नियम से क-वर्गः और च-वर्गः की पूरी तालिका इस प्रकार बनेगी —

व्यञ्जनम्
क्काकिकीकुकूकृकॄकॢकेकैकोकौ
ख्खाखिखीखुखूखृखॄखॢखेखैखोखौ
ग्गागिगीगुगूगृगॄगॢगेगैगोगौ
घ्घाघिघीघुघूघृघॄघॢघेघैघोघौ
ङ्ङाङिङीङुङूङृङॄङॢङेङैङोङौ
च्चाचिचीचुचूचृचॄचॢचेचैचोचौ
छ्छाछिछीछुछूछृछॄछॢछेछैछोछौ
ज्जाजिजीजुजूजृजॄजॢजेजैजोजौ
झ्झाझिझीझुझूझृझॄझॢझेझैझोझौ
ञ्ञाञिञीञुञूञृञॄञॢञेञैञोञौ
ऐसा क्यों होता है: ‘क्’ अकेला व्यञ्जन है — उसे बोलने के लिए साँस को कहीं रोकना पड़ता है और छोड़ने के लिए स्वर चाहिए। इसीलिए पुस्तक कहती है — “व्यञ्जनानाम् उच्चारणे कस्यचित् स्वरस्य सहायतायाः अपेक्षा अवश्यं भवति।” वर्णमाला में हम ‘क’ लिखते हैं, पर असली व्यञ्जन तो केवल क् है; ‘अ’ केवल बोलने के लिए जोड़ा गया है।
ध्यान दें: ‘अ’ की कोई मात्रा नहीं होती — इसीलिए पृष्ठ 4 की तालिका में ‘अ’ के नीचे का मात्रा-कोष्ठक खाली छोड़ा गया है।
प्र2.
ट-वर्गस्य त-वर्गस्य प-वर्गस्य च गुणिताक्षराणि लिखन्तु (पृष्ठ 6, 7)।
उत्तर

वही नियम — व्यञ्जन + स्वर-मात्रा। तीनों वर्गों की पूरी तालिका —

व्यञ्जनम्
ट्टाटिटीटुटूटृटॄटॢटेटैटोटौ
ठ्ठाठिठीठुठूठृठॄठॢठेठैठोठौ
ड्डाडिडीडुडूडृडॄडॢडेडैडोडौ
ढ्ढाढिढीढुढूढृढॄढॢढेढैढोढौ
ण्णाणिणीणुणूणृणॄणॢणेणैणोणौ
त्तातितीतुतूतृतॄतॢतेतैतोतौ
थ्थाथिथीथुथूथृथॄथॢथेथैथोथौ
द्दादिदीदुदूदृदॄदॢदेदैदोदौ
ध्धाधिधीधुधूधृधॄधॢधेधैधोधौ
न्नानिनीनुनूनृनॄनॢनेनैनोनौ
प्पापिपीपुपूपृपॄपॢपेपैपोपौ
फ्फाफिफीफुफूफृफॄफॢफेफैफोफौ
ब्बाबिबीबुबूबृबॄबॢबेबैबोबौ
भ्भाभिभीभुभूभृभॄभॢभेभैभोभौ
म्मामिमीमुमूमृमॄमॢमेमैमोमौ
लिखते समय सावधानी: ‘ि’ की मात्रा अक्षर के पहले लिखी जाती है पर बोली बाद में जाती है — इसलिए ‘टि’ को ‘इट्’ नहीं, टि ही पढ़िए। इसी तरह ‘ु’ और ‘ू’ अक्षर के नीचे तथा ‘े ै ो ौ’ ऊपर लगती हैं।
प्र3.
अन्तःस्थानाम् (य र ल व) ऊष्मणां (श ष स ह) च वर्णानां गुणिताक्षराणि लिखन्तु (पृष्ठ 8, 9)।
उत्तर

अन्तःस्थ और ऊष्म वर्णों की पूरी तालिका —

व्यञ्जनम्
य्यायियीयुयूयृयॄयॢयेयैयोयौ
र्रारिरीरुरूरृरॄरॢरेरैरोरौ
ल्लालिलीलुलूलृलॄलॢलेलैलोलौ
व्वाविवीवुवूवृवॄवॢवेवैवोवौ
श्शाशिशीशुशूशृशॄशॢशेशैशोशौ
ष्षाषिषीषुषूषृषॄषॢषेषैषोषौ
स्सासिसीसुसूसृसॄसॢसेसैसोसौ
ह्हाहिहीहुहूहृहॄहॢहेहैहोहौ
पुस्तक की टिप्पणी (पृष्ठ 9): “रृ, रॄ, रॢ — एतानि त्रीणि गुणिताक्षराणि क्रमेण इत्येवमपि प्रकारान्तरेण लिख्यन्ते।” अर्थात् ‘र्’ में ऋ, ॠ और ऌ जोड़ने पर बने ये तीन अक्षर छपाई में दूसरे ढंग से भी लिखे जाते हैं — ‘ऋ’ के ऊपर रेफ (र् का चिह्न) लगाकर। दोनों रूप शुद्ध हैं।
‘अन्तःस्थ’ नाम क्यों: ये वर्ण स्वर और व्यञ्जन के बीच में पड़ते हैं, इसलिए इन्हें ‘अर्ध-स्वराः’ भी कहा जाता है। ये अकसर स्वरों की जगह ले लेते हैं — इ→य्, ऋ→र्, ऌ→ल्, उ→व्। इसी से बनता है: यदि + अपि = यद्यपि, पितृ + आज्ञा = पित्राज्ञा, ऌ + आकृतिः = लाकृतिः, सु + आगतम् = स्वागतम्
प्र4.
अयोगवाहानाम् — अनुस्वारेण (ं) विसर्गेण (ः) च सह स्वराणां तथा ‘क् + स्वरः + ं’, ‘ख् + स्वरः + ः’ इत्येतयोः रिक्तकोष्ठकानि पूरयन्तु (पृष्ठ 8)।
उत्तर

पहले स्वरों के साथ —

अयोगवाहः
ं (अनुस्वारः)अंआंइंईंउंऊंऋंॠंऌंएंऐंओंऔं
ः (विसर्गः)अःआःइःईःउःऊःऋःॠःऌःएःऐःओःऔः

अब पृष्ठ 8 की नीचे वाली दो पंक्तियाँ, जिनमें व्यञ्जन + स्वर + अयोगवाह जुड़ता है। पुस्तक में हर पंक्ति के पहले दो खाने भरे हुए हैं, शेष चार आपको भरने हैं —

पङ्क्तिः
क् + स्वरः + ंकंकांकिंकींकुंकूं
ख् + स्वरः + ःखःखाःखिःखीःखुःखूः
अयोगवाह की खूबी: बाकी व्यञ्जनों में उच्चारण के लिए ‘अ’ बाद में जोड़ा जाता है (क् + अ = क), पर अनुस्वार और विसर्ग में ‘अ’ पहले जुड़ता है — अ + ं = अं और अ + ः = अः। असली वर्ण तो केवल ‘ं’ और ‘ः’ ही हैं। पुस्तक के शब्दों में — “अत्र उच्चारणार्थं अ स्वरस्य संयोजनं पूर्वं भवति, न तु पश्चात्।”
नाम का अर्थ: ‘अयोगवाह’ = जो किसी वर्ग के योग में नहीं आता, फिर भी अर्थ को वहन करता है। ये न स्वर हैं, न स्पर्श-अन्तःस्थ-ऊष्म में गिने जाते हैं।
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