प्र1.
व्यञ्जनैः सह सर्वेषाम् अपि स्वराणां संयोजनं भवति । व्यञ्जनैः सह स्वराणां संयोजनेन गुणिताक्षराणि भवन्ति — क-वर्गस्य च-वर्गस्य च रिक्तकोष्ठकानि पूरयन्तु (पृष्ठ 4, 5)।
उत्तर
व्यञ्जन के साथ स्वर की मात्रा जोड़ने से गुणिताक्षर बनता है। नियम एक ही है —
क् + अ = क
क् + आ (ा) = का
क् + इ (ि) = कि
क् + ऋ (ृ) = कृ
क् + औ (ौ) = कौ
क् + आ (ा) = का
क् + इ (ि) = कि
क् + ऋ (ृ) = कृ
क् + औ (ौ) = कौ
इसी नियम से क-वर्गः और च-वर्गः की पूरी तालिका इस प्रकार बनेगी —
| व्यञ्जनम् | अ | आ | इ | ई | उ | ऊ | ऋ | ॠ | ऌ | ए | ऐ | ओ | औ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| क् | क | का | कि | की | कु | कू | कृ | कॄ | कॢ | के | कै | को | कौ |
| ख् | ख | खा | खि | खी | खु | खू | खृ | खॄ | खॢ | खे | खै | खो | खौ |
| ग् | ग | गा | गि | गी | गु | गू | गृ | गॄ | गॢ | गे | गै | गो | गौ |
| घ् | घ | घा | घि | घी | घु | घू | घृ | घॄ | घॢ | घे | घै | घो | घौ |
| ङ् | ङ | ङा | ङि | ङी | ङु | ङू | ङृ | ङॄ | ङॢ | ङे | ङै | ङो | ङौ |
| च् | च | चा | चि | ची | चु | चू | चृ | चॄ | चॢ | चे | चै | चो | चौ |
| छ् | छ | छा | छि | छी | छु | छू | छृ | छॄ | छॢ | छे | छै | छो | छौ |
| ज् | ज | जा | जि | जी | जु | जू | जृ | जॄ | जॢ | जे | जै | जो | जौ |
| झ् | झ | झा | झि | झी | झु | झू | झृ | झॄ | झॢ | झे | झै | झो | झौ |
| ञ् | ञ | ञा | ञि | ञी | ञु | ञू | ञृ | ञॄ | ञॢ | ञे | ञै | ञो | ञौ |
ऐसा क्यों होता है: ‘क्’ अकेला व्यञ्जन है — उसे बोलने के लिए साँस को कहीं रोकना पड़ता है और छोड़ने के लिए स्वर चाहिए। इसीलिए पुस्तक कहती है — “व्यञ्जनानाम् उच्चारणे कस्यचित् स्वरस्य सहायतायाः अपेक्षा अवश्यं भवति।” वर्णमाला में हम ‘क’ लिखते हैं, पर असली व्यञ्जन तो केवल क् है; ‘अ’ केवल बोलने के लिए जोड़ा गया है।
ध्यान दें: ‘अ’ की कोई मात्रा नहीं होती — इसीलिए पृष्ठ 4 की तालिका में ‘अ’ के नीचे का मात्रा-कोष्ठक खाली छोड़ा गया है।