दीपकम् अध्याय 10 वयं शब्दार्थान् जानीमः

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
वयं शब्दार्थान् जानीमः — शब्दः / अर्थः / हिन्दी / English / मातृभाषया अर्थं लिखन्तु — (सरोवरः, गजः, शशकः, मृताः, भीताः, प्रतिबिम्बम्, चिन्तामग्नः, शशाङ्कः, नाम्ना) ।
उत्तर

पुस्तक की पूरी शब्दार्थ-तालिका, अन्तिम स्तम्भ (मातृभाषया अर्थः) हिन्दी में भरा हुआ —

शब्दःअर्थः (संस्कृतम्)हिन्दीEnglishमातृभाषया अर्थः
सरोवरःजलाशयःतालाबPond / Lakeतालाब, सरोवर
गजःहस्तीहाथीElephantहाथी
शशकःशशःखरगोशRabbitखरगोश
मृताःहताःमरे हुएDeadमरे हुए
भीताःभययुक्ताःडरे हुएScaredडरे हुए, भयभीत
प्रतिबिम्बम्प्रतिबिम्बम्प्रतिबिम्बReflectionपरछाईं, प्रतिबिम्ब
चिन्तामग्नःचिन्ताकुलःचिन्तितWorriedचिन्ता में डूबा हुआ
शशाङ्कःचन्द्रःचन्द्रमाMoonचाँद, चन्द्रमा
नाम्नानामधेयेननाम सेBy nameनाम से
पाठ के कुछ और उपयोगी शब्द: पिपासाकुलम् = प्यास से व्याकुल · वनान्तरात् = दूसरे वन से · समन्तात् = चारों ओर · क्षतविक्षताः = घायल · यूथाधिपः = झुंड का मुखिया · स्वरक्षार्थम् = अपनी रक्षा के लिए · चकितः = चकित, हैरान · कदापि न = कभी नहीं।
शब्द-रचना समझिए: चिन्तामग्नः = चिन्तायाम् मग्नः — चिन्ता में डूबा हुआ (जैसे जल में डूबना, वैसे ही चिन्ता में डूबना)। क्षतविक्षताः = क्षत (घाव) + विक्षत (गहरा घाव) — बुरी तरह घायल। संस्कृत में ऐसे समस्त पद तोड़कर देखने से अर्थ अपने-आप खुल जाता है।
प्र2.
अवधेयांशः — क्रियापदानां मूलं धातुः अस्ति । यथा – पठति इति क्रियापदस्य मूलं – ‘पठ्’ इति धातुः अस्ति । निवसन्ति, भवन्ति, गच्छति, प्रकाशयन्ति, नमति, तिष्ठन्ति — एतेषां धातून् लिखन्तु ।
उत्तर

पुस्तक का ‘अवधेयांशः’ एक ही बात कहता है — हर क्रियापद के पीछे एक मूल शब्द होता है, उसे ‘धातु’ कहते हैं।

पठति → मूलम् = पठ् (धातुः)
पठ् + ति = पठति, पठ् + अन्ति = पठन्ति
क्रियापदम्धातुःअर्थः
निवसन्तिनि + वस्रहते हैं
भवन्तिभू (भव्)होते हैं
गच्छतिगम् (गच्छ्)जाता है
प्रकाशयन्तिप्र + काश् (काशि)प्रकट करते हैं
नमतिनम्प्रणाम करता है
तिष्ठन्तिस्था (तिष्ठ्)ठहरते हैं / रहते हैं
कोष्ठक में दूसरा रूप क्यों: कुछ धातुओं का रूप चलते समय बदल जाता है — गम् लट्लकार में गच्छ् बन जाता है, भू बनता है भव्, और स्था बनता है तिष्ठ्। इसे अङ्ग-परिवर्तन कहते हैं। इसीलिए पुस्तक धातु के आगे कोष्ठक में चलता हुआ रूप भी दे देती है।
Tip — उपसर्ग अलग कीजिए: ‘नि + वस्’, ‘प्र + काश्’, ‘निर् + गम्’, ‘आ + गम्’, ‘अनु + भू’ — यहाँ पहला भाग उपसर्ग है, जो धातु का अर्थ बदल देता है। जैसे — गम् (जाना) → आगम् (आना) → निर्गम् (निकलना)। एक ही धातु, तीन अर्थ।
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