दीपकम् अध्याय 10 दशमः पाठः

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
एकस्मिन् दिने सायङ्काले तेषां शशकानां सभा भवति । सर्वे शशकाः स्वमतं प्रकाशयन्ति । परं ते समाधानं न प्राप्नुवन्ति । अन्ते शशकराजः वदति– “अहमेव उपायं चिन्तयामि । अधुना वयं सर्वे स्वगृहं गच्छामः ।” — अस्य गद्यांशस्य हिन्दी-अनुवादं कुर्वन्तु ।
उत्तर

यह कथा का मोड़ है — सामूहिक बहस से हल नहीं निकलता, नेतृत्व से निकलता है।

संस्कृतम्हिन्दी अनुवादः
एकस्मिन् दिने सायङ्काले तेषां शशकानां सभा भवति ।एक दिन सायंकाल में उन खरगोशों की सभा होती है।
सर्वे शशकाः स्वमतं प्रकाशयन्ति ।सब खरगोश अपना-अपना मत प्रकट करते हैं।
परं ते समाधानं न प्राप्नुवन्ति ।परन्तु उन्हें कोई समाधान नहीं मिलता।
अन्ते शशकराजः वदति– “अहमेव उपायं चिन्तयामि ।”अन्त में खरगोशों का राजा कहता है — ‘उपाय मैं ही सोचूँगा।’
“अधुना वयं सर्वे स्वगृहं गच्छामः ।”‘अभी हम सब अपने-अपने घर चलते हैं।’
‘अहमेव’ में क्या छिपा है: अहम् + एव = अहमेव — ‘मैं ही’। ‘एव’ अवधारण का अव्यय है, जो शब्द पर ज़ोर डालता है। शशकराज घबराए हुए झुंड को यह भरोसा दे रहा है कि ज़िम्मेदारी वह स्वयं लेता है। ध्यान दीजिए — चिन्तयामि और गच्छामः उत्तमपुरुष के रूप हैं (मैं / हम), जबकि बाकी पूरा पाठ प्रथमपुरुष में चल रहा है।
प्र2.
अन्यस्मिन् दिवसे रात्रौ सः शशकराजः यूथाधिपस्य गजराजस्य समीपं गच्छति । सः गजराजं कथयति– “हे गजराज ! एषः सरोवरः चन्द्रस्य वासस्थानम् अस्ति । वयं शशकाः तस्य प्रजाः स्मः, अत एव सः शशाङ्कः इति नाम्ना प्रसिद्धः । यदा शशकाः जीवन्ति तदा एव चन्द्रः प्रसन्नः भवति ।” — अस्य गद्यांशस्य हिन्दी-अनुवादं कुर्वन्तु ।
उत्तर

यह शशकराज की पूरी योजना है — और वह केवल शब्दों से चलाई जा रही है।

संस्कृतम्हिन्दी अनुवादः
अन्यस्मिन् दिवसे रात्रौ सः शशकराजः यूथाधिपस्य गजराजस्य समीपं गच्छति ।दूसरे दिन रात में वह खरगोशराज झुंड के मुखिया गजराज के पास जाता है।
सः गजराजं कथयति– “हे गजराज ! एषः सरोवरः चन्द्रस्य वासस्थानम् अस्ति ।”वह गजराज से कहता है — ‘हे गजराज! यह तालाब चन्द्रमा का निवास-स्थान है।’
“वयं शशकाः तस्य प्रजाः स्मः, अत एव सः शशाङ्कः इति नाम्ना प्रसिद्धः ।”‘हम खरगोश उसकी प्रजा हैं, इसीलिए वह ‘शशाङ्क’ नाम से प्रसिद्ध है।’
“यदा शशकाः जीवन्ति तदा एव चन्द्रः प्रसन्नः भवति ।”‘जब तक खरगोश जीवित रहते हैं, तभी चन्द्रमा प्रसन्न रहता है।’
तर्क की चाल देखिए: शशकराज झूठ नहीं गढ़ता, वह एक सर्वविदित नाम उठाकर उसका मनचाहा अर्थ लगा देता है। शश + अङ्कः = शशाङ्कः — ‘जिसके शरीर पर शश (खरगोश) का चिह्न हो’, यह चन्द्रमा का प्रसिद्ध नाम है (चाँद के धब्बों में लोग खरगोश की आकृति देखते हैं)। इसी नाम से वह सिद्ध कर देता है कि खरगोश चन्द्रमा की प्रजा हैं। यही बुद्धि का बल है — सामने पड़े तथ्य का उपयोग।
व्याकरण: ‘स्मः’ = अस् धातु, लट्लकार, उत्तमपुरुष बहुवचन (हम हैं)। ‘नाम्ना’ = नामन् शब्द, तृतीया विभक्ति एकवचन, नपुंसकलिङ्ग — ‘नाम से’। ‘रात्रौ’ = सप्तमी एकवचन, स्त्रीलिङ्ग — ‘रात में’।
प्र3.
गजराजः पृच्छति– “कथम् अहं विश्वासं करोमि ? किं सत्यमेव चन्द्रः सरोवरे तिष्ठति ?” यदि सरोवरः चन्द्रदेवस्य वासस्थानं तर्हि तत् प्रदर्शयतु । शशकः कथयति- “आम्, चन्द्रस्य दर्शनाय आवाम् अधुना एव सरोवरं प्रति चलावः ।” — अस्य गद्यांशस्य हिन्दी-अनुवादं कुर्वन्तु ।
उत्तर

गजराज मूर्ख नहीं है — वह प्रमाण माँगता है। और शशकराज को यही चाहिए था।

संस्कृतम्हिन्दी अनुवादः
गजराजः पृच्छति– “कथम् अहं विश्वासं करोमि ?”गजराज पूछता है — ‘मैं कैसे विश्वास करूँ?’
“किं सत्यमेव चन्द्रः सरोवरे तिष्ठति ?”‘क्या सचमुच चन्द्रमा तालाब में रहता है?’
“यदि सरोवरः चन्द्रदेवस्य वासस्थानं तर्हि तत् प्रदर्शयतु ।”‘यदि तालाब चन्द्रदेव का निवास-स्थान है, तो वह मुझे दिखाइए।’
शशकः कथयति- “आम्, चन्द्रस्य दर्शनाय आवाम् अधुना एव सरोवरं प्रति चलावः ।”खरगोश कहता है — ‘हाँ, चन्द्रमा के दर्शन के लिए हम दोनों अभी ही तालाब की ओर चलते हैं।’
‘आवाम्’ और ‘चलावः’ यहाँ क्यों: दो ही जा रहे हैं — गजराज और शशकराज। इसलिए द्विवचन प्रयुक्त हुआ है। आवाम् = ‘हम दोनों’ (अस्मद् शब्द, प्रथमा द्विवचन), चलावः = चल् धातु, लट्लकार, उत्तमपुरुष द्विवचन। हिन्दी में द्विवचन नहीं होता, इसीलिए इसे ‘हम दोनों चलते हैं’ कहकर अनुवाद करना पड़ता है।
Tip: ‘प्रदर्शयतु’ लोट्लकार (आज्ञा/प्रार्थना) का रूप है, लट्लकार का नहीं — ‘दिखाइए’। ‘किम्’ वाक्य के आरम्भ में आए तो प्रश्नवाचक बन जाता है — ‘क्या...?’
प्र4.
गजराजः शशकराजेन सह सरोवरस्य समीपं गच्छति । सः जले चन्द्रस्य प्रतिबिम्बं पश्यति, चकितः च भवति । सः भयेन चन्द्रं नमति । ततः सः गजयूथेन सह अन्यत्र गच्छति । सः गजयूथः पुनः कदापि तस्य सरोवरस्य समीपं न आगच्छति । शशकाः तत्र सुखेन तिष्ठन्ति । सत्यम् एव उक्तम् – ‘बुद्धिः सर्वार्थसाधिका’ । — अस्य गद्यांशस्य हिन्दी-अनुवादं कुर्वन्तु, सारवाक्यस्य भावं च लिखन्तु ।
उत्तर

कथा का अन्त और सार-वाक्य — दोनों यहीं हैं।

संस्कृतम्हिन्दी अनुवादः
गजराजः शशकराजेन सह सरोवरस्य समीपं गच्छति ।गजराज खरगोशराज के साथ तालाब के पास जाता है।
सः जले चन्द्रस्य प्रतिबिम्बं पश्यति, चकितः च भवति ।वह जल में चन्द्रमा का प्रतिबिम्ब देखता है और चकित हो जाता है।
सः भयेन चन्द्रं नमति ।वह डर से चन्द्रमा को प्रणाम करता है।
ततः सः गजयूथेन सह अन्यत्र गच्छति ।उसके बाद वह हाथियों के झुंड के साथ कहीं और चला जाता है।
सः गजयूथः पुनः कदापि तस्य सरोवरस्य समीपं न आगच्छति ।वह हाथियों का झुंड फिर कभी उस तालाब के पास नहीं आता।
शशकाः तत्र सुखेन तिष्ठन्ति ।खरगोश वहाँ सुख से रहते हैं।
सत्यम् एव उक्तम् – ‘बुद्धिः सर्वार्थसाधिका’ ।सच ही कहा गया है — ‘बुद्धि ही सब कार्यों को सिद्ध करने वाली है’।

सारवाक्यस्य अर्थः — बुद्धिः सर्वार्थसाधिका (बुद्धि सब प्रयोजनों को साध देने वाली है)।

भावः: गजराज शशक से हज़ारों गुना बलवान् है। यदि लड़ाई होती तो शशक एक क्षण भी नहीं टिकते। पर शशकराज ने लड़ाई की ही नहीं — उसने जल में पड़ते चन्द्रमा के प्रतिबिम्ब को ‘चन्द्रदेव का दर्शन’ बना दिया। बल का उत्तर बल से देना ही आवश्यक नहीं; जहाँ शरीरबल हार जाता है वहाँ बुद्धिबल जीत जाता है। यही पाठ-प्रवेश में कहा गया था — ‘बुद्धिबलेन वयं तं जेतुं शक्नुमः’।
Did you know? यह कथा पञ्चतन्त्र के काकोलूकीयम् तन्त्र की प्रसिद्ध कथा ‘शशक और गजराज’ का सरल संस्कृत रूप है। वहाँ चतुर शशक का नाम विजयः है और वह स्वयं को चन्द्रमा का दूत बताता है। पञ्चतन्त्र के रचयिता आचार्य विष्णुशर्मा माने जाते हैं।
Try This: कथा को अपने शब्दों में पाँच संस्कृत वाक्यों में लिखिए — ‘वने सरोवरः अस्ति । गजाः तत्र आगच्छन्ति । शशकाः दुःखिताः भवन्ति । शशकराजः उपायं चिन्तयति । गजाः अन्यत्र गच्छन्ति ।’
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