प्र1.
वर्ण-वियोगं कुर्वन्तु — अजः = अ + ज् + अ + ः । (रामः, हरिः, सीता, गुरुः, वधूः, ऋषिः तथा मातॄणम् = म् + आ + त् + ॠ + ण् + अ + म्, कॢप्तम् = क् + ऌ + प् + त् + अ + म्, ऌकारः, देवाः, एकैकः, ओम्, औषधम्)
उत्तर
वर्ण-वियोग का अर्थ है — पद को उसके अलग-अलग वर्णों में तोड़ना। नियम यही है: हर व्यञ्जन हलन्त के साथ लिखिए और हर मात्रा को उसका पूरा स्वर बनाकर अलग लिखिए।
वाम-भागः (बायाँ खाना) —
| पदम् | वर्ण-वियोगः | वर्ण-सङ्ख्या | अर्थः |
|---|---|---|---|
| अजः | अ + ज् + अ + ः (पुस्तके दत्तम्) | 4 | बकरा |
| रामः | र् + आ + म् + अ + ः | 5 | राम |
| हरिः | ह् + अ + र् + इ + ः | 5 | विष्णु / हरि |
| सीता | स् + ई + त् + आ | 4 | सीता |
| गुरुः | ग् + उ + र् + उ + ः | 5 | गुरु, शिक्षक |
| वधूः | व् + अ + ध् + ऊ + ः | 5 | विवाहिता नारी |
| ऋषिः | ऋ + ष् + इ + ः | 4 | तपस्वी, मन्त्रद्रष्टा |
दक्षिण-भागः (दायाँ खाना) —
| पदम् | वर्ण-वियोगः | वर्ण-सङ्ख्या | अर्थः |
|---|---|---|---|
| मातॄणम् | म् + आ + त् + ॠ + ण् + अ + म् (पुस्तके दत्तम्) | 7 | माता का ऋण |
| कॢप्तम् | क् + ऌ + प् + त् + अ + म् (पुस्तके दत्तम्) | 6 | कल्पित, माना हुआ |
| ऌकारः | ऌ + क् + आ + र् + अ + ः | 6 | ‘ऌ’ वर्ण |
| देवाः | द् + ए + व् + आ + ः | 5 | देवगण |
| एकैकः | ए + क् + ऐ + क् + अ + ः | 6 | प्रत्येक, हर एक |
| ओम् | ओ + म् | 2 | प्रणव |
| औषधम् | औ + ष् + अ + ध् + अ + म् | 6 | दवा |
तीन बातें ध्यान से: (1) ‘सीता’ में ‘सी’ = स् + ई है, ‘इ’ नहीं — मात्रा ‘ी’ दीर्घ है। (2) ‘ओम्’ में केवल दो वर्ण हैं — ओ और म् — क्योंकि ‘ओ’ स्वयं एक पूरा स्वर है, कोई मात्रा उसके साथ नहीं। (3) ‘एकैकः’ में पहला ‘ए’ अकेला स्वर है और बीच का ‘कै’ = क् + ऐ।
विसर्ग और अनुस्वार भी वर्ण हैं: ‘अजः’ के अन्त का ‘ः’ अलग गिना जाता है, इसीलिए अजः के चार वर्ण हैं। इसी तरह ‘हंसः’ में ‘ं’ भी एक अलग वर्ण होगा (देखिए पृष्ठ 27)।