दीपकम् अध्याय 2 वर्ण-वियोगः

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
वर्ण-वियोगं कुर्वन्तु — अजः = अ + ज् + अ + ः । (रामः, हरिः, सीता, गुरुः, वधूः, ऋषिः तथा मातॄणम् = म् + आ + त् + ॠ + ण् + अ + म्, कॢप्तम् = क् + ऌ + प् + त् + अ + म्, ऌकारः, देवाः, एकैकः, ओम्, औषधम्)
उत्तर

वर्ण-वियोग का अर्थ है — पद को उसके अलग-अलग वर्णों में तोड़ना। नियम यही है: हर व्यञ्जन हलन्त के साथ लिखिए और हर मात्रा को उसका पूरा स्वर बनाकर अलग लिखिए।

वाम-भागः (बायाँ खाना) —

पदम्वर्ण-वियोगःवर्ण-सङ्ख्याअर्थः
अजःअ + ज् + अ + ः (पुस्तके दत्तम्)4बकरा
रामःर् + आ + म् + अ + ः5राम
हरिःह् + अ + र् + इ + ः5विष्णु / हरि
सीतास् + ई + त् + आ4सीता
गुरुःग् + उ + र् + उ + ः5गुरु, शिक्षक
वधूःव् + अ + ध् + ऊ + ः5विवाहिता नारी
ऋषिःऋ + ष् + इ + ः4तपस्वी, मन्त्रद्रष्टा

दक्षिण-भागः (दायाँ खाना) —

पदम्वर्ण-वियोगःवर्ण-सङ्ख्याअर्थः
मातॄणम्म् + आ + त् + ॠ + ण् + अ + म् (पुस्तके दत्तम्)7माता का ऋण
कॢप्तम्क् + ऌ + प् + त् + अ + म् (पुस्तके दत्तम्)6कल्पित, माना हुआ
ऌकारःऌ + क् + आ + र् + अ + ः6‘ऌ’ वर्ण
देवाःद् + ए + व् + आ + ः5देवगण
एकैकःए + क् + ऐ + क् + अ + ः6प्रत्येक, हर एक
ओम्ओ + म्2प्रणव
औषधम्औ + ष् + अ + ध् + अ + म्6दवा
तीन बातें ध्यान से: (1) ‘सीता’ में ‘सी’ = स् + है, ‘इ’ नहीं — मात्रा ‘ी’ दीर्घ है। (2) ‘ओम्’ में केवल दो वर्ण हैं — ओ और म् — क्योंकि ‘ओ’ स्वयं एक पूरा स्वर है, कोई मात्रा उसके साथ नहीं। (3) ‘एकैकः’ में पहला ‘ए’ अकेला स्वर है और बीच का ‘कै’ = क् +
विसर्ग और अनुस्वार भी वर्ण हैं: ‘अजः’ के अन्त का ‘ः’ अलग गिना जाता है, इसीलिए अजः के चार वर्ण हैं। इसी तरह ‘हंसः’ में ‘ं’ भी एक अलग वर्ण होगा (देखिए पृष्ठ 27)।
प्र2.
क्य – वाक्यम् = व् + आ + क् + य् + अ + म् । एवमेव — न्य – मूर्धन्यः, व्य – तालव्यः, ह्य – बाह्यम् — एतेषां वर्ण-वियोगं कुर्वन्तु ।
उत्तर

चारों पदों में ‘य्’ अन्तिम व्यञ्जन के रूप में जुड़ा है — यही ‘य’ वाले संयुक्त-व्यञ्जनों की पहचान है।

संयुक्त-व्यञ्जनम्पदम्वर्ण-वियोगःअर्थः
क्य
क् + य = क्य
वाक्यम्व् + आ + क् + य् + अ + म् (पुस्तके दत्तम्)वाक्य
न्य
न् + य = न्य
मूर्धन्यःम् + ऊ + र् + ध् + अ + न् + य् + अ + ःमूर्धा से बोला जाने वाला
व्य
व् + य = व्य
तालव्यःत् + आ + ल् + अ + व् + य् + अ + ःतालु से बोला जाने वाला
ह्य
ह् + य = ह्य
बाह्यम्ब् + आ + ह् + य् + अ + म् (पुस्तके दत्तम्)बाहरी
‘मूर्धन्यः’ में नौ वर्ण क्यों: इसमें दो संयुक्त-व्यञ्जन हैं — पहला र्ध (र् + ध) और दूसरा न्य (न् + य)। बीच में ‘ध’ का अपना ‘अ’ भी गिनना है, वरना ‘मूर्ध्न्यः’ बन जाएगा जो ग़लत है। इसीलिए — म् + ऊ + र् + ध् + + न् + य् + अ + ः।
अर्थ की बात: ये तीनों — मूर्धन्यः, तालव्यः, ओष्ठ्यः — उच्चारण-स्थान बताने वाले शब्द हैं, जो पहले पाठ में पढ़े थे। ‘बाह्यम्’ का अर्थ है ‘बहिः स्थितम्’ यानी बाहरी।
प्र3.
क्र – क्रीडा = क् + र् + ई + ड् + आ । एवमेव — ग्र – ग्रहणम्, ज्र – वज्रः, द्र – द्रष्टा, प्र – प्रगतिः, ब्र – ब्रह्म — एतेषां वर्ण-वियोगं कुर्वन्तु ।
उत्तर

इन सब में दूसरा व्यञ्जन ‘र्’ है। लिखते समय वह अक्षर के नीचे तिरछी लकीर बन जाता है — इसे रकारः कहते हैं।

संयुक्त-व्यञ्जनम्पदम्वर्ण-वियोगःअर्थः
क्र
क् + र = क्र
क्रीडाक् + र् + ई + ड् + आ (पुस्तके दत्तम्)खेल
ग्र
ग् + र = ग्र
ग्रहणम्ग् + र् + अ + ह् + अ + ण् + अ + म्स्वीकार करना / पकड़ना
ज्र
ज् + र = ज्र
वज्रःव् + अ + ज् + र् + अ + ःइन्द्र का शस्त्र / हीरा
द्र
द् + र = द्र
द्रष्टाद् + र् + अ + ष् + ट् + आ (पुस्तके दत्तम्)देखने वाला
प्र
प् + र = प्र
प्रगतिःप् + र् + अ + ग् + अ + त् + इ + ःउन्नति, विकास
ब्र
ब् + र = ब्र
ब्रह्मब् + र् + अ + ह् + म् + अ (पुस्तके दत्तम्)परमात्मा
‘ग्रहणम्’ में आठ वर्ण क्यों: ग्र के बाद ‘ह’ का ‘अ’ और ‘ण’ का ‘अ’ — दोनों गिनने हैं। ग् + र् + + ह् + + ण् + + म्। जितने ‘अ’ दिखाई नहीं देते, उतने ही वर्ण छात्र भूल जाते हैं — यही इस अभ्यास की असली परीक्षा है।
‘ब्रह्म’ के अन्त में ‘म्’ नहीं, ‘अ’ है: ब् + र् + अ + ह् + म् + — यह नपुंसकलिङ्ग का प्रथमा-एकवचन रूप है (ब्रह्म, अर्थ — परमात्मा)। यदि अन्त में हलन्त ‘म्’ होता तो शब्द ‘ब्रह्म्’ बन जाता, जो कोई पद नहीं।
प्र4.
ध्व – ध्वनिः = ध् + व् + अ + न् + इ + ः । एवमेव — ह्म – ब्रह्मचारी, ह्न – जाह्नवी, स्व – सरस्वती — एतेषां वर्ण-वियोगं कुर्वन्तु ।
उत्तर

यहाँ ‘ह्’ और ‘स्’, ‘ध्’ पहले आकर अगले व्यञ्जन से जुड़ते हैं।

संयुक्त-व्यञ्जनम्पदम्वर्ण-वियोगःअर्थः
ह्म
ह् + म = ह्म
ब्रह्मचारीब् + र् + अ + ह् + म् + अ + च् + आ + र् + ईविद्या-संयम-व्रती
ह्न
ह् + न = ह्न
जाह्नवीज् + आ + ह् + न् + अ + व् + ईजह्नु ऋषि की पुत्री — गङ्गा
ध्व
ध् + व = ध्व
ध्वनिःध् + व् + अ + न् + इ + ः (पुस्तके दत्तम्)आवाज़
स्व
स् + व = स्व
सरस्वतीस् + अ + र् + अ + स् + व् + अ + त् + ईविद्या की देवी
‘ह्म’ और ‘ह्न’ पहचानना: ‘ब्रह्मचारी’ में ह् + म् जुड़े हैं और ‘जाह्नवी’ में ह् + न्। दोनों लिखने में लगभग एक-से दिखते हैं, पर नीचे लगे व्यञ्जन को ध्यान से देखिए — ‘ह्म’ में ‘म’ का पेट गोल है, ‘ह्न’ में ‘न’ की खड़ी लकीर है।
शब्द-कथा: जाह्नवी = जह्नोः ऋषेः पुत्री। कथा है कि जह्नु ऋषि ने गङ्गा को पी लिया था, फिर भगीरथ की प्रार्थना पर कान से छोड़ दिया — तभी से गङ्गा उनकी पुत्री ‘जाह्नवी’ कहलाईं। सरस्वती = सरस् (जल/वाणी) + वती, यानी ‘जिसमें प्रवाह हो’ — विद्या और वाणी की देवी।
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