दीपकम् अध्याय 2 संयुक्त-व्यञ्जनानि

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
द्वयोः बहूनां वा व्यञ्जन-वर्णानां मेलनेन संयुक्त-व्यञ्जनानि भवन्ति — क्ष, कक्षा, त्र, पत्रम्, ज्ञ, ज्ञानम्, द्य, विद्या । एतेषां वर्ण-वियोगं पश्यन्तु, संयुक्त-व्यञ्जनस्य निर्माणं च वदन्तु ।
उत्तर

उत्तरम् (संस्कृतम्): यदा एकं व्यञ्जनं स्वर-रहितं सत् अपरेण व्यञ्जनेन सह मिलति, तदा संयुक्त-व्यञ्जनं भवति। (हिन्दी: जब एक व्यञ्जन बिना स्वर के — यानी हलन्त के साथ — दूसरे व्यञ्जन से जुड़ जाता है, तब संयुक्त-व्यञ्जन बनता है।)

पाठ के चारों उदाहरणों का नियम एक ही है —

क् + ष = क्ष
त् + र = त्र
ज् + ञ = ज्ञ
द् + य = द्य

पूरा वर्ण-वियोग इस प्रकार है —

पदम् / वर्णःवर्ण-वियोगःसंयुक्त-व्यञ्जनम्अर्थः
क्षक् + ष् + अक् + ष = क्ष‘क्ष’ ध्वनि
कक्षाक् + अ + क् + ष् + आक् + ष = क्षकक्षा, class
त्रत् + र् + अत् + र = त्र‘त्र’ ध्वनि
पत्रम्प् + अ + त् + र् + अ + म्त् + र = त्रपत्ता / पत्र
ज्ञज् + ञ् + अज् + ञ = ज्ञ‘ज्ञ’ ध्वनि
ज्ञानम्ज् + ञ् + आ + न् + अ + म्ज् + ञ = ज्ञज्ञान
द्यद् + य् + अद् + य = द्य‘द्य’ ध्वनि
विद्याव् + इ + द् + य् + आद् + य = द्यविद्या
ऐसा क्यों होता है: ‘क’ में ‘क् + अ’ छिपा है। जब ‘अ’ हटा दिया जाए तो बचता है केवल क् — और तब उसे अगले व्यञ्जन का सहारा लेना पड़ता है। इसी सहारे से क् + ष् मिलकर क्ष् बनता है, और उसके बाद जो स्वर आता है (अ, आ, इ …) वह पूरे जोड़े को बोलने योग्य बना देता है — क्ष् + अ = क्ष, क्ष् + आ = क्षा
ध्यान दीजिए: ‘कक्षा’ में दो बार ‘क्’ आया है — पहला ‘क् + अ’ (यानी ‘क’) और दूसरा संयुक्त-व्यञ्जन का ‘क्’। इसी तरह ‘विद्या’ में ‘व् + इ’ से ‘वि’ बना और फिर ‘द् + य् + आ’ से ‘द्या’। वर्ण-वियोग करते समय हर मात्रा को अलग स्वर के रूप में लिखना है।
प्र2.
एवं सर्वेषां व्यञ्जनानां — सर्वैः व्यञ्जनैः सह मेलनं सम्भवति । तेन बहुविधानि संयुक्त-व्यञ्जनानि भवन्ति — क्य, क्र, द्म, र्ण, न्द्र, ष्ट्र, न्त्र, ष्ठ्य, न्ध्य । एतेषां पदानि लिखन्तु ।
उत्तर

पुस्तक की नौ-खानों वाली तालिका इस प्रकार भरी जाएगी —

संयुक्त-व्यञ्जनम्वर्ण-विच्छेदःपदम्अर्थः
क्यक् + य = क्यचाणक्यःआचार्य चाणक्य
क्रक् + र = क्रक्रमःक्रम, सिलसिला
द्मद् + म = द्मपद्मम्कमल
र्णर् + ण = र्णअर्णवःसमुद्र
न्द्रन् + द् + र = न्द्रइन्द्रःदेवराज इन्द्र
ष्ट्रष् + ट् + र = ष्ट्रउष्ट्रःऊँट
न्त्रन् + त् + र = न्त्रमन्त्रःमन्त्र
ष्ठ्यष् + ठ् + य = ष्ठ्यओष्ठ्यःओष्ठ से बोला जाने वाला वर्ण
न्ध्यन् + ध् + य = न्ध्यसन्ध्यासन्ध्या-वेला
तीन-तीन व्यञ्जन भी जुड़ सकते हैं: ऊपर के नौ में से छह तो दो व्यञ्जनों के जोड़े हैं (क्य, क्र, द्म, र्ण), पर न्द्र, ष्ट्र, न्त्र, ष्ठ्य, न्ध्य — इनमें तीन-तीन व्यञ्जन जुड़े हैं। संस्कृत में चार और पाँच व्यञ्जनों के जोड़ भी मिलते हैं — जैसे र्ष्ट्य (धार्ष्ट्यम्) और र्त्स्न्य (कार्त्स्न्यम्), जो आगे पृष्ठ 28 पर आएँगे।
‘र्’ की दो शैलियाँ: ‘र्’ जब पहले आता है तो ऊपर छोटा-सा चिह्न बन जाता है — इसे रेफ कहते हैं: अ + र् + ण = अर्णवः। और जब ‘र्’ बाद में आता है तो अक्षर के नीचे तिरछी लकीर बन जाती है — इसे रकार कहते हैं: क् + र = क्र, ष् + ट् + र = ष्ट्र
प्र3.
* एतानि संयुक्त-व्यञ्जनानि नवीनाः वर्णाः न सन्ति, अपितु पृथक्-पृथक् संयुक्त-व्यञ्जन-वर्णानां विशिष्टा लेखन-शैली एव । एतैः सह आगतः स्वरः संयुक्त-व्यञ्जनेषु अन्तर्भूतः नास्ति । — अस्याः टिप्पण्याः आशयं स्पष्टीकुर्वन्तु ।
उत्तर

उत्तरम् (संस्कृतम्): संयुक्त-व्यञ्जनानि नवीनाः वर्णाः न सन्ति। वर्णमालायां ये एव व्यञ्जनाः पठिताः, तेषाम् एव मेलनस्य विशिष्टा लेखन-शैली संयुक्त-व्यञ्जनम् उच्यते। स्वरः तु तेषु अन्तर्भूतः न भवति; सः पृथक् एव योज्यते।

(हिन्दी: इस टिप्पणी की दो बातें हैं —)

  1. ‘क्ष’, ‘त्र’, ‘ज्ञ’ कोई नए अक्षर नहीं हैं। ये वर्णमाला के पुराने अक्षरों — क्, ष्, त्, र्, ज्, ञ् — के जुड़ने का लिखने का तरीका भर हैं। इसलिए संस्कृत वर्णमाला में व्यञ्जन 33 ही हैं, 36 नहीं।
  2. जोड़ में स्वर शामिल नहीं है। ‘क्ष’ लिखने पर जो ‘अ’ सुनाई देता है, वह संयुक्त-व्यञ्जन का हिस्सा नहीं — वह बाद में जोड़ा गया अलग स्वर है। असली संयुक्त-व्यञ्जन तो क्ष् है। इसीलिए वर्ण-वियोग में हम लिखते हैं — क्ष = क् + ष् + , जहाँ ‘अ’ अलग गिना जाता है।
यह बात ज़रूरी क्यों है: यदि ‘क्ष’ को एक नया वर्ण मान लें, तो वर्ण गिनना ही गड़बड़ा जाएगा। ‘वृक्षः’ में तब 5 वर्ण गिने जाएँगे, जबकि सही गिनती 6 है — व् + ऋ + क् + ष् + अ + ः। इसी गिनती पर आगे चलकर सन्धि, समास और छन्द का सारा नियम टिका है।
याद रखने का सूत्र: व्यञ्जन + व्यञ्जन = संयुक्त-व्यञ्जन, और संयुक्त-व्यञ्जन + स्वर = बोलने योग्य अक्षर। दोनों चरण अलग-अलग हैं।
क्या यह उपयोगी रहा? त्रुटि बताएँ