प्र1.
द्वयोः बहूनां वा व्यञ्जन-वर्णानां मेलनेन संयुक्त-व्यञ्जनानि भवन्ति — क्ष, कक्षा, त्र, पत्रम्, ज्ञ, ज्ञानम्, द्य, विद्या । एतेषां वर्ण-वियोगं पश्यन्तु, संयुक्त-व्यञ्जनस्य निर्माणं च वदन्तु ।
उत्तर
उत्तरम् (संस्कृतम्): यदा एकं व्यञ्जनं स्वर-रहितं सत् अपरेण व्यञ्जनेन सह मिलति, तदा संयुक्त-व्यञ्जनं भवति। (हिन्दी: जब एक व्यञ्जन बिना स्वर के — यानी हलन्त के साथ — दूसरे व्यञ्जन से जुड़ जाता है, तब संयुक्त-व्यञ्जन बनता है।)
पाठ के चारों उदाहरणों का नियम एक ही है —
क् + ष = क्ष
त् + र = त्र
ज् + ञ = ज्ञ
द् + य = द्य
त् + र = त्र
ज् + ञ = ज्ञ
द् + य = द्य
पूरा वर्ण-वियोग इस प्रकार है —
| पदम् / वर्णः | वर्ण-वियोगः | संयुक्त-व्यञ्जनम् | अर्थः |
|---|---|---|---|
| क्ष | क् + ष् + अ | क् + ष = क्ष | ‘क्ष’ ध्वनि |
| कक्षा | क् + अ + क् + ष् + आ | क् + ष = क्ष | कक्षा, class |
| त्र | त् + र् + अ | त् + र = त्र | ‘त्र’ ध्वनि |
| पत्रम् | प् + अ + त् + र् + अ + म् | त् + र = त्र | पत्ता / पत्र |
| ज्ञ | ज् + ञ् + अ | ज् + ञ = ज्ञ | ‘ज्ञ’ ध्वनि |
| ज्ञानम् | ज् + ञ् + आ + न् + अ + म् | ज् + ञ = ज्ञ | ज्ञान |
| द्य | द् + य् + अ | द् + य = द्य | ‘द्य’ ध्वनि |
| विद्या | व् + इ + द् + य् + आ | द् + य = द्य | विद्या |
ऐसा क्यों होता है: ‘क’ में ‘क् + अ’ छिपा है। जब ‘अ’ हटा दिया जाए तो बचता है केवल क् — और तब उसे अगले व्यञ्जन का सहारा लेना पड़ता है। इसी सहारे से क् + ष् मिलकर क्ष् बनता है, और उसके बाद जो स्वर आता है (अ, आ, इ …) वह पूरे जोड़े को बोलने योग्य बना देता है — क्ष् + अ = क्ष, क्ष् + आ = क्षा।
ध्यान दीजिए: ‘कक्षा’ में दो बार ‘क्’ आया है — पहला ‘क् + अ’ (यानी ‘क’) और दूसरा संयुक्त-व्यञ्जन का ‘क्’। इसी तरह ‘विद्या’ में ‘व् + इ’ से ‘वि’ बना और फिर ‘द् + य् + आ’ से ‘द्या’। वर्ण-वियोग करते समय हर मात्रा को अलग स्वर के रूप में लिखना है।