पूरे पद्य का विषय एक ही है — सन्ध्या का आकाश। कवि कहता है कि हर शाम आकाश पर प्रकृति स्वयं चित्र बनाती है। पद्य के ऊपर पुस्तक ने उसका भाव भी लिख दिया है — ‘सर्वेषां वर्णानां रचयिता भगवान् परमेश्वरः एव’।
पदच्छेदः — सायङ्काले तु अम्बरकोणे विलिखति प्रकृतिः वर्णचयम् । रक्तं पीतं श्वेतं चित्रं नीलं शबलित-दृक्-विभवम् ।
अन्वयः — सायङ्काले तु प्रकृतिः अम्बरकोणे रक्तं पीतं श्वेतं चित्रं नीलं शबलितदृग्विभवं वर्णचयं विलिखति ।
| पदम् | अर्थः (संस्कृते) | हिन्दी |
|---|---|---|
| सायङ्काले | सन्ध्यासमये | सायंकाल में |
| अम्बरकोणे | आकाशस्य कोणे | आकाश के कोने में |
| वर्णचयम् | वर्णानां समूहम् | रंगों का समूह |
| विलिखति | चित्रयति, आलिखति | चित्रित कर देती है |
| शबलितदृग्विभवम् | शबलितं दृशः विभवं येन तत् | जो देखने वालों की दृष्टि के वैभव को रंग-बिरंगा कर दे |
हिन्दी अर्थ — सायंकाल के समय प्रकृति आकाश के एक कोने में रंगों का ढेर चित्रित कर देती है — लाल, पीला, सफ़ेद, चितकबरा और नीला; ऐसा रंग-समूह जो देखने वाली आँखों के वैभव को ही रंगीन बना देता है।