यह अमरकोश का श्लोक है। अमरकोश संस्कृत का सबसे प्रसिद्ध पर्यायवाची-कोश है, जिसके रचयिता हैं अमरसिंहः। इसका ‘धीवर्गः’ नामक भाग रंगों के नाम गिनाता है।
अर्थः — यह श्लोक श्वेत (सफ़ेद) वर्ण के तेरह पर्यायवाची देता है।
श्वेतवर्णस्य पर्यायाः (१३) —
शुक्लः, शुभ्रः, शुचिः, श्वेतः, विशदः, श्येतः, पाण्डरः,
अवदातः, सितः, गौरः, वलक्षः, धवलः, अर्जुनः ।
(हिन्दी: इन सब शब्दों का अर्थ ‘सफ़ेद’ है।)
Did you know? ‘अर्जुनः’ भी सफ़ेद रंग का ही नाम है — इसीलिए महाभारत के अर्जुन का एक अर्थ ‘गौरवर्ण वाला’ माना जाता है, और अर्जुन वृक्ष का नाम भी उसकी सफ़ेद छाल के कारण पड़ा। इसी तरह ‘शुचिः’ का अर्थ ‘पवित्र’ भी है — सफ़ेद और पवित्रता का सम्बन्ध संस्कृत में शब्द के भीतर ही बैठा है।
पर्यायवाची इतने क्यों ? संस्कृत काव्य में छन्द निभाना पड़ता है। किसी पंक्ति में दो अक्षर चाहिए तो ‘सितः’, चार चाहिए तो ‘पाण्डरः’ या ‘अवदातः’ — अर्थ वही रहता है, पर छन्द बन जाता है। इसीलिए अमरकोश ने एक ही अर्थ के इतने शब्द एक साथ संग्रहीत कर दिए।