दीपकम् अध्याय 8 योग्यताविस्तरः

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
शुक्लशुभ्रशुचिश्वेतविशदश्येतपाण्डराः । अवदातः सितो गौरो वलक्षो धवलोऽर्जुनः ॥ — अस्य श्लोकस्य अर्थं लिखन्तु । अत्र के वर्णपर्यायाः प्रदत्ताः ?
उत्तर

यह अमरकोश का श्लोक है। अमरकोश संस्कृत का सबसे प्रसिद्ध पर्यायवाची-कोश है, जिसके रचयिता हैं अमरसिंहः। इसका ‘धीवर्गः’ नामक भाग रंगों के नाम गिनाता है।

अर्थः — यह श्लोक श्वेत (सफ़ेद) वर्ण के तेरह पर्यायवाची देता है।

श्वेतवर्णस्य पर्यायाः (१३) —
शुक्लः, शुभ्रः, शुचिः, श्वेतः, विशदः, श्येतः, पाण्डरः,
अवदातः, सितः, गौरः, वलक्षः, धवलः, अर्जुनः ।

(हिन्दी: इन सब शब्दों का अर्थ ‘सफ़ेद’ है।)

Did you know? ‘अर्जुनः’ भी सफ़ेद रंग का ही नाम है — इसीलिए महाभारत के अर्जुन का एक अर्थ ‘गौरवर्ण वाला’ माना जाता है, और अर्जुन वृक्ष का नाम भी उसकी सफ़ेद छाल के कारण पड़ा। इसी तरह ‘शुचिः’ का अर्थ ‘पवित्र’ भी है — सफ़ेद और पवित्रता का सम्बन्ध संस्कृत में शब्द के भीतर ही बैठा है।
पर्यायवाची इतने क्यों ? संस्कृत काव्य में छन्द निभाना पड़ता है। किसी पंक्ति में दो अक्षर चाहिए तो ‘सितः’, चार चाहिए तो ‘पाण्डरः’ या ‘अवदातः’ — अर्थ वही रहता है, पर छन्द बन जाता है। इसीलिए अमरकोश ने एक ही अर्थ के इतने शब्द एक साथ संग्रहीत कर दिए।
प्र2.
हरिणः पाण्डुरः पाण्डुरीषत्पाण्डुस्तु धूसरः । कृष्णे नीलासितश्यामकालश्यामलमेचकाः ॥ — अस्य श्लोकस्य अर्थं लिखन्तु ।
उत्तर

यह श्लोक दो वर्गों के नाम देता है — पहले धूसर/पीलापन लिए हल्के रंग, फिर कृष्ण (काले) रंग।

वर्गःपर्यायाःहिन्दी
धूसरवर्णःहरिणः, पाण्डुरः, पाण्डुः, ईषत्पाण्डुः, धूसरःभूरा, पाण्डु (हल्का पीला-सफ़ेद), धूल जैसा रंग
कृष्णवर्णःकृष्णः, नीलः, असितः, श्यामः, कालः, श्यामलः, मेचकःकाला, साँवला

अर्थः — हरिण, पाण्डुर, पाण्डु, ईषत्पाण्डु और धूसर — ये धूसर (भूरे/फीके) रंग के नाम हैं। तथा कृष्ण, नील, असित, श्याम, काल, श्यामल और मेचक — ये सब काले रंग के नाम हैं।

Tip: ‘ईषत्पाण्डुः’ को टुकड़ों में देखिए — ईषत् (थोड़ा-सा) + पाण्डु (पीलापन लिए सफ़ेद) = ‘हल्का पाण्डु’। संस्कृत में ‘ईषत्’ जोड़ते ही रंग हल्का हो जाता है, जैसे ‘ईषद्रक्तः’ = हल्का लाल (अगले श्लोक में आएगा)।
ध्यान दीजिए — यहाँ ‘नीलः’ काले वर्ग में है! संस्कृत में गहरा नीला और काला बहुत पास-पास माने जाते हैं। इसीलिए श्रीकृष्ण को कभी ‘कृष्ण’, कभी ‘श्याम’ और कभी ‘नीलमेघश्याम’ कहा जाता है। पाठ में मयूर का रंग भी इसी कारण ‘नीलः’ भी कहा जा सकता है और गहरा साँवला भी।
प्र3.
पीतो गौरो हरिद्राभः पलाशो हरितो हरित् । लोहितो रोहितो रक्तः शोणः कोकनदच्छविः ॥ — अस्य श्लोकस्य अर्थं लिखन्तु ।
उत्तर

इस श्लोक की पहली पंक्ति पीत (पीले) तथा हरे रंग के नाम देती है, दूसरी पंक्ति रक्त (लाल) के।

वर्गःपर्यायाःहिन्दी
पीतवर्णःपीतः, गौरः, हरिद्राभः, पालाशःपीला (हल्दी जैसा, पलाश-पुष्प जैसा)
हरितवर्णःहरितः, हरित्हरा
रक्तवर्णःलोहितः, रोहितः, रक्तः, शोणः, कोकनदच्छविःलाल

अर्थः — पीत, गौर, हरिद्राभ और पालाश — ये पीले रंग के नाम हैं; हरित तथा हरित् — हरे रंग के। लोहित, रोहित, रक्त, शोण और कोकनदच्छवि — ये लाल रंग के नाम हैं।

शब्दों की जड़ें देखिए: हरिद्राभः = हरिद्रा (हल्दी) + आभा — ‘हल्दी जैसी आभा वाला’। पालाशः = पलाश (ढाक/टेसू) के फूल जैसा। कोकनदच्छविः = कोकनद (लाल कमल) की छवि वाला। संस्कृत के रंग-नाम अक्सर किसी वस्तु के नाम से बने हैं — ठीक वैसे ही जैसे हिन्दी में ‘सिन्दूरी’, ‘गुलाबी’ और ‘केसरिया’।
एक भ्रम दूर कीजिए: ‘गौरः’ पिछले श्लोक में सफ़ेद के अर्थ में आया था और यहाँ पीले के अर्थ में। संस्कृत में कुछ शब्द अनेकार्थी हैं — गौर का अर्थ ‘उजला’ भी है और ‘हल्का पीलापन लिए उजला’ भी। ऐसे शब्दों का ठीक अर्थ प्रसंग (context) से ही तय होता है।
प्र4.
अव्यक्तरागस्त्वरुणः श्वेतरक्तस्तु पाटलः । श्यावः स्यात्कपिशो धूम्रधूमलौ कृष्णलोहिते ॥ — अस्य श्लोकस्य अर्थं लिखन्तु ।
उत्तर

यह श्लोक मिश्रित रंगों के नाम देता है — गुलाबी, अरुण और धुएँ जैसे रंग।

पुस्तके प्रदत्ताः पर्यायाः —
रक्तोत्पलाभः, शोणः, अव्यक्तरागः, ईषद्रक्तः, अरुणः,
श्वेतरक्तः, पाटलः, श्यावः, कपिशः, धूम्रः, धूमलः, कृष्णलोहितः ।
पदम्पदच्छेदः / व्युत्पत्तिःअर्थः
अव्यक्तरागःन व्यक्तः रागः यस्यजिसका रंग स्पष्ट न हो — हल्का लाल
ईषद्रक्तःईषत् + रक्तःथोड़ा-सा लाल
अरुणःलालिमा लिए हुए, उषा जैसा रंग
श्वेतरक्तः / पाटलःश्वेतः + रक्तःगुलाबी (सफ़ेद और लाल का मेल)
श्यावः, कपिशःकत्थई, भूरा-काला
धूम्रः, धूमलःधूमस्य वर्णःधुएँ जैसा रंग
कृष्णलोहितःकृष्णः + लोहितःकाला-लाल, गहरा मटमैला लाल
यह श्लोक पाठ से सीधे जुड़ता है: अभ्यास के प्रश्न ३ में ‘पाटलवर्णः’ (गुलाबी) मिलाना था — और यहाँ अमरकोश स्वयं उसकी परिभाषा दे देता है: ‘श्वेतरक्तस्तु पाटलः’ — सफ़ेद और लाल मिलकर पाटल (गुलाबी) बनता है। इसी तरह प्रश्न ३ का ‘नीललोहितः’ = नीला + लाल = जामुनी। संस्कृत के रंग-नाम अपनी बनावट में ही रंग-मिश्रण का नियम बता देते हैं।
व्याकरण-संकेतः: ‘अव्यक्तरागस्त्वरुणः’ = अव्यक्तरागः + तु + अरुणः, ‘श्वेतरक्तस्तु’ = श्वेतरक्तः + तु (विसर्ग-सन्धिः — ः + त् = स्त्) । ‘धूम्रधूमलौ’ तथा ‘कृष्णलोहिते’ इति द्विवचन-रूपे — यतः क्रमशः द्वौ शब्दौ द्वे च रूपे निर्दिष्टे ।
प्र5.
कडारः कपिलः पिङ्गपिशङ्गौ कद्रुपिङ्गलौ । चित्रं किर्मीरकल्माषशबलैताश्च कर्बुरे ॥ — अस्य श्लोकस्य अर्थं लिखन्तु ।
उत्तर

यह अन्तिम श्लोक भूरे/पिंगल रंग तथा कर्बुर (रंग-बिरंगे) के नाम गिनाता है।

वर्गःपर्यायाःहिन्दी
पिङ्गलवर्णःकडारः, कपिलः, पिङ्गः, पिशङ्गः, कद्रुः, पिङ्गलःभूरा, कपिश, सुनहरा-भूरा
कर्बुरवर्णः (विचित्रवर्णः)चित्रम्, किर्मीरः, कल्माषः, शबलः, कर्बुरःरंग-बिरंगा, चितकबरा

अर्थः — कडार, कपिल, पिङ्ग, पिशङ्ग, कद्रु और पिङ्गल — ये भूरे रंग के नाम हैं। तथा चित्र, किर्मीर, कल्माष, शबल और कर्बुर — ये विचित्रवर्ण अर्थात् अनेक रंगों वाले के नाम हैं।

अब पाठ का एक शब्द पूरी तरह खुल जाता है: संवाद में शिक्षक ने कहा था — ‘चित्रवर्णाः शुकाः अपि अत्र सन्ति’। यहाँ ‘चित्र’ का अर्थ तस्वीर नहीं, अनेकरंगी है — और वही बात यह श्लोक प्रमाण के साथ बता देता है, क्योंकि यहाँ ‘चित्रम्’ को ‘कर्बुरः’ (रंग-बिरंगा) का पर्यायवाची कहा गया है। इसी तरह पद्य में आया ‘शबलितदृग्विभवम्’ भी ‘शबल’ (चितकबरा) से ही बना है।
अमरकोश के बारे में: पूरा नाम है नामलिङ्गानुशासनम्, पर लोकप्रिय नाम ‘अमरकोशः’ है। यह तीन काण्डों में बँटा है और इसके श्लोक कण्ठस्थ करने की परम्परा रही है — क्योंकि छन्द में होने से हज़ारों पर्यायवाची सरलता से याद रह जाते हैं। ‘धीवर्गः’ प्रथम काण्ड का वह भाग है जिसमें बुद्धि, गुण, वाणी और वर्ण (रंग) सम्बन्धी शब्द संगृहीत हैं।
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