कुतूहल अध्याय 12 क्रियाकलाप 12.2: आइए, स्थिति का पता लगाने का प्रयास करें

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
सप्तर्षि को देखने के लिए ग्रीष्म-ऋतु के दौरान, रात्रि के लगभग 9 बजे आकाश का अवलोकन करें। इसके लिए आकाश के उत्तरी भाग में देखें और सप्तर्षि को पहचानें।
उत्तर

प्रेक्षण: ग्रीष्म ऋतु की किसी साफ रात को लगभग 9 बजे उत्तर की ओर मुँह करके देखिए। आकाश में ऊपर की ओर सात अपेक्षाकृत चमकीले तारे करछी के आकार में दिखाई देंगे— चार तारे कप बनाते हैं और तीन तारे थोड़ा मुड़ा हुआ हत्था।

  • यही बिग डिपर है, जिसे भारत में सप्तर्षि (सात ऋषि) कहा जाता है।
  • यह अर्सा मेजर तारा-मंडल के अंदर स्थित है।
  • हत्थे के बीच वाले तारे के ठीक पास एक धुँधला साथी तारा है— यदि आप उसे बिना यंत्र के अलग देख पाएँ तो आपकी दृष्टि और आपका आकाश, दोनों उत्तम हैं।
सुझाव: ऐसी रात चुनिए जब आकाश में चंद्रमा न हो। चाँदनी धुँधले तारों को ढक देती है, और अगले चरण में आपको धुँधले तारे ही चाहिए।
प्र2.
सप्तर्षि पहचान में आ जाए तो ध्रुव तारे की स्थिति जानने का प्रयास कीजिए। बिग डिपर के कप के अंतिम दो तारों को देखिए और इन्हें जोड़ने वाली एक सरल रेखा की कल्पना कीजिए। इस काल्पनिक रेखा को उत्तर की ओर आगे बढ़ाइए। इन तारों के बीच की दूरी के लगभग पाँच गुनी दूरी पर इस काल्पनिक रेखा पर एक तारा दिखेगा जो बहुत चमकीला नहीं है। यही ध्रुव तारा है।
उत्तर

विधि— "संकेतक तारों" की युक्ति:

  1. सप्तर्षि के कप के बाहरी सिरे के दो तारे पहचानिए (वह किनारा जो हत्थे से दूर है)। ये संकेतक तारे हैं।
  2. आँख से इन दोनों के बीच की दूरी नापिए। अब इनसे होकर जाती एक सरल रेखा की कल्पना कीजिए जो कप से दूर, उत्तर की ओर जा रही हो।
  3. उस रेखा पर लगभग पाँच गुनी दूरी तक आगे बढ़िए।
  4. वहाँ एक अकेला, बहुत चमकीला नहीं तारा मिलेगा, जिसके आस-पास कोई तारा नहीं है। यही ध्रुव तारा (पोल स्टार) है।
  5. पुष्टि: ध्रुव तारा लिटिल डिपर (अर्सा माइनर तारा-मंडल) के हत्थे का अंतिम तारा है।
— सदैव उत्तर दिशा में ध्रुव तारा (पोल स्टार) दोनों संकेतक तारे इस दूरी का लगभग 5 गुना सप्तर्षि (बिग डिपर) लिटिल डिपर
सप्तर्षि से ध्रुव तारे तक पहुँचने की विधि। कप के खुले सिरे के दो तारे रास्ता दिखाते हैं; उनके बीच की दूरी का लगभग पाँच गुना आगे जाइए। ये रेखाएँ काल्पनिक हैं और आकाश में दिखाई नहीं देतीं।
ध्रुव तारा क्यों नहीं हिलता: पृथ्वी अपने अक्ष पर घूमती है और ध्रुव तारा लगभग ठीक उसी अक्ष की सीध में, उत्तरी ध्रुव के ऊपर स्थित है। अक्ष पर स्थित बिंदु पृथ्वी के घूमने से इधर-उधर नहीं होता, इसलिए यह एक तारा अपनी जगह बना रहता है और शेष सभी तारे उसके चारों ओर घूमते प्रतीत होते हैं।
स्वयं जाँचिए: अपने साथ एक चुंबकीय दिक्सूचक ले जाइए। ध्रुव तारा मिल जाने पर दिक्सूचक देखिए— तारा और सुई, दोनों उत्तर दिशा बताएँगे।
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