प्र1.
क्या जंतुओं की गति उनके परिवेश पर निर्भर करती है?
उत्तर
हाँ — बहुत अधिक। जंतु किस प्रकार चलता है और किस अंग का उपयोग करता है, दोनों उसके परिवेश से मेल खाते हैं।
| जंतु | परिवेश | शरीर का अंग | गति |
|---|---|---|---|
| मछली | जल | धारारेखित शरीर और पख [चित्र 2.8 (क)] | तैरती है |
| बकरी | थल पर घास वाले क्षेत्र | खुरों वाली चार टाँगें [चित्र 2.8 (ख)] | चलती, दौड़ती, कूदती है |
| पक्षी | वायु और वृक्ष | पंख और हल्की अस्थियाँ | उड़ता है |
| केंचुआ | मिट्टी के भीतर | शूकयुक्त कोमल शरीर, कोई पाद नहीं | बिल बनाता और रेंगता है |
| ऊँट | रेतीला मरुस्थल | चौड़े खुरों वाले लंबे पैर | रेत में बिना धँसे चलता है |
ऐसा क्यों होता है: जल हर चलती वस्तु को पीछे धकेलता है, इसलिए तैरने वाले को चिकना धारारेखित आकार और चपटे पख चाहिए। वायु सहारा नहीं देती, इसलिए उड़ने वाले को पंख और हल्का शरीर चाहिए। ढीली रेत पैर के नीचे धँस जाती है, इसलिए मरुस्थली जंतु को चौड़े खुर चाहिए जो भार फैला दें। कठोर भूमि पकड़ देती है, इसलिए वहाँ टाँगें और खुर पर्याप्त हैं। शरीर परिवेश के अनुरूप होता है — और ऐसी विशेषताएँ अनुकूलन कहलाती हैं।
स्वयं देखिए: मछली का शरीर दोनों सिरों पर पतला और बीच में चौड़ा होता है — ठीक नाव के अगले भाग की तरह। नाव बनाने वालों ने प्रकृति की नकल की; यही आकार दोनों को कम प्रयास में जल चीरने देता है।