कुतूहल अध्याय 2 पाठ्य प्रश्न

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
अलग-अलग क्षेत्रों में पाए जाने वाले ये दोनों प्रकार के पौधे एक-दूसरे से भिन्न होते हैं। आइए, पता लगाते हैं कि ऐसा क्यों है? एक क्षेत्र की जैव विविधता अन्य क्षेत्रों की जैव विविधता से अलग क्यों होती है?
उत्तर

क्योंकि दोनों क्षेत्रों की परिस्थितियाँ पूर्णत: भिन्न हैं, और वहाँ केवल वही पौधे रह पाते हैं जो उन विशेष परिस्थितियों में जीवित रह सकें।

 राजस्थान का मरुस्थल — नागफनी (चित्र 2.9)हिमाचल का हिमालयी क्षेत्र — देवदार (चित्र 2.10)
परिस्थितियाँबहुत कम जल; दिन में अत्यधिक गरम, रात में अत्यधिक ठंडाअत्यधिक ठंड, बार-बार हिमपात
पौधा कैसा दिखता हैमोटे और मांसल तनेशंक्वाकार आकृति, लचीली और झुकी हुई शाखाएँ
कैसे सहायता करता हैमांसल तना जल संगृहित करता है और गरम परिस्थितियों को सहने में सहायक हैआकृति के कारण बर्फ आसानी से फिसल जाती है, इसलिए शाखाएँ भार से टूटती नहीं
एक पंक्ति में तर्क: थार में लगाया गया देवदार सूख जाएगा क्योंकि उसके पास जल संचित करने का उपाय नहीं; हिमालय की ढलान पर नागफनी जमा देने वाली बर्फ के भार से नष्ट हो जाएगी। दोनों एक ही प्रकार की परिस्थितियों के लिए बने हैं। भिन्न परिस्थितियों के कारण ही विभिन्न स्थानों की जैव विविधता एक-दूसरे से बहुत अलग होती है।
क्या आप जानते हैं? नागफनी की पत्तियाँ काँटों में बदल जाती हैं। चौड़ी पत्तियाँ गरम शुष्क हवा में बहुत जल उड़ा देतीं — और काँटे संचित जल को प्यासे जंतुओं से भी बचाते हैं।
प्र2.
राजस्थान के गरम मरुस्थल के ऊँट (चित्र 2.11) और लद्दाख के ठंडे मरुस्थल के ऊँट (चित्र 2.12) देखिए। इन दोनों जंतुओं में आपको क्या अंतर दिखाई देते हैं? इन अंतरों के कारण ऊँटों को क्या लाभ होते हैं?
उत्तर

दोनों ऊँट हैं, परंतु उनके शरीर दो बिलकुल भिन्न मरुस्थलों के लिए बने हैं।

विशेषतागरम मरुस्थल का ऊँट (राजस्थान)ठंडे मरुस्थल का ऊँट (लद्दाख)लाभ
पैरलंबे पैर, अधिक ऊँचाईतुलनात्मक रूप से छोटे पैर और कम ऊँचाईलंबे पैर शरीर को तपती रेत से दूर रखते हैं; छोटे पैर पहाड़ी मरुस्थलीय क्षेत्रों में आसानी से चलने में सक्षम बनाते हैं
खुरचौड़े खुरछोटे, अधिक कठोर खुरचौड़े खुर भार फैला देते हैं, जिससे ऊँट रेत में बिना धँसे चलता है
कूबड़एक कूबड़दो कूबड़कूबड़ में भोजन संचित रहता है; ठंडे मरुस्थल के ऊँट के दोनों कूबड़ सर्दियों के अंत में छोटे हो जाते हैं क्योंकि संचित भोजन प्रयोग हो जाता है
बालछोटे बालसिर से गर्दन के निचले भाग तक लंबे बाललंबे बाल गरमी रोक लेते हैं और लद्दाख के बर्फीले मौसम में जीवित रहने में सहायक होते हैं
फिर भी दोनों ऊँट ही क्यों हैं: मरुस्थल — गरम हो या ठंडा — वह स्थान है जहाँ जल और भोजन दोनों बहुत कम हैं। इसलिए दोनों जंतुओं की मूल बनावट एक ही रहती है: भोजन संचित करने के लिए कूबड़ और बिना जल के कई दिन निकाल देने वाला शरीर। भिन्न केवल चलने की सतह और तापमान हैं — राजस्थान में रेत और गरमी, लद्दाख में पथरीली ढलान और बर्फ — और इन्हीं दो बातों के अनुसार पैर, खुर और बाल बदले हैं।
प्र3.
मरुस्थल में ऊँटों को जीवित रहने में कौन-सी अन्य विशेषताएँ सहायक हो सकती हैं?
उत्तर

अध्याय में राजस्थान की काशी तीन और विशेषताएँ बताती है, तथा कुछ आप स्वयं जोड़ सकते हैं।

  • वे कम मात्रा में मूत्र विसर्जन करते हैं।
  • उनका गोबर सूखा होता है — उसके साथ बहुत कम जल जाता है।
  • उन्हें पसीना नहीं आता।
कम मूत्र + सूखा गोबर + पसीना नहीं
= शरीर से बहुत कम जल बाहर जाता है
= ऊँट बिना जल पिए भी कई दिनों तक जीवित रह सकता है

अन्य सहायक विशेषताएँ जिनका आप अवलोकन कर सकते हैं या पता लगा सकते हैं:

  • लंबी पलकें और बंद हो सकने वाले नथुने उड़ती रेत को आँख और नाक से दूर रखते हैं।
  • घुटनों और छाती पर मोटी चमड़ी की गद्दियाँ उसे तपती रेत पर बैठने देती हैं।
  • वह खेजड़ी और बबूल जैसे काँटेदार मरुस्थलीय पौधे भी खा लेता है, जिन्हें बहुत कम जंतु चबा सकते हैं।
  • जल मिलने पर वह एक ही बार में बहुत अधिक जल पी सकता है।
मरुस्थल में जल बचाना ही सारी समस्या क्यों है: पौधे और जंतु श्वसन, पसीने और मल-मूत्र के साथ लगातार जल खोते रहते हैं। जहाँ उसे भरने के लिए जल लगभग है ही नहीं, वहाँ जीवित रहना पूरी तरह कम खोने पर निर्भर है। ऊपर लिखा ऊँट का हर अनुकूलन एक ही काम करता है — जल बचाना। इसीलिए ऊँट को मरुस्थल का जहाज़ कहा जाता है।
क्या यह उपयोगी रहा? त्रुटि बताएँ